।। समवरसण ।।

    श्रमण माहवीर केवल ज्ञानी हो गये, इस बात की सूचना क्षण भर मे सर्वत्र प्रसारित हो गयी। ‘केवल ज्ञान’ शब्द हमारे लिए परिचित हो सकता है , किंतु इसकी जो स्थिति है, उस तक पहुंचने के लिए साधना की आवश्यकता है विशुद्ध चित्त दशा की। केवल ज्ञानी हो जाने का अर्थ है-मात्र ज्ञान के धनी होना। अर्थात जहां केवल जानना रहा जाता है, करना नहीं। उस स्थिति में की जाने वाली क्रियाएं आकांक्षा रहित होती हैं। अतः उनसे कर्म बंधन की परम्परा अवरूद्ध हो जाती है।

तपस्वी महावीर अपनी साधना के काल मे निरंतर पर्वत पर, जंगल में, वर्षा मे , धूप मे, शीत मे रहे हैं। न कोई घर, न कोई द्वार। न बैठने के लिए कोई आसन और न सोने को शैया। परम्परा से ज्ञात होता है कि साधक महावीर ने पद्मासन अथवा गोदोहन आसन मे ध्यान लगाकर केवल ज्ञान प्राप्त किया था। हो सकता है कि जंगल में या निर्जन स्थान मे वे हमेशा उकडूं (गोदोहन आसन) ही बैठते रहे हो और इस आसन के अभ्यास ने उन्हें ध्यान मे बड़ी सहजता प्रदान की हो दूसरी बात यह कि महावीर की यह निरंतर चेष्टा रहती थी कि उनके माध्यम से किसी जीव की हिंसा न हो। इसी लिए वे एक ही करवट लेटते थे और इसी धारणा के कारण पृथ्वी पर कम से कम दबाव डालने के लिए उन्हो ने गोदोहन आसन को ध्यान के लिए चुना होगा। अद्भुत है उस आदमी की संवेदना। धरती से उसका मात्र दो पंचो का सम्बंध रह गया, इतना ऊपर उठ गया था वह। तीसरा कारण इस आसन मे ध्यान करने का यह था कि इसमे तन्द्रा या निद्रा आने का प्रश्न ही नही हे। उकडू बैठ कर कौन सोयेगा ? अतः महावीर ध्यान मे जो पूर्ण सजगता बनाये रखने की बात कहते हैं उसका फल उन्होंने इस आसन मे ध्यान करके प्रगट कर दिया। पूर्णजागृति के कारण ही वे आत्मनिष्ठ हो सके और परम ज्ञान के धारक।’

महावीर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई है, यह समाचार चहुं दिशा फैलता हुआ जब इन्द्र को ज्ञात हुआ तो उसके हर्ष की सीमा न रही। उसने अपने कोषाध्यक्ष कुबेर को बुलाया। ऋजुकूला के तट पर विशाल सभामण्डप बनाने का आदेश दिया। इन्द्र की अभिलाषा थी कि तीर्थंकर महावीर की वाणी का प्रसार अधिक से अधिक हो सके। संसार के सभी प्राणी उनकी देशना से आत्मकल्याण की ओर अग्रसर हो सकें। इसलिए इन्द्र ने कुबेर को एक ऐसी योजना सभामण्डप की रचना के सम्बंध मे प्रस्तावित की, जिसमे सभी प्रकार के प्राणियों के बैठने की व्यवस्था हो। कुबरे ने इन्द्र की कल्पना के अनुरूप ऋजुकूला के तट पर जाकर एक विशाल, मनोरम सभामण्डप की रचना कर दी, उसकी समृद्धि और शोभा के आगे स्वयं उसे अपना वैभव अकिंचन लग रहा था, किंतु वह स्वय सार्थक हो गया था, इतने प्राणियो को भगवान महावीर की वाणी सुनने का अवसर प्रदान करें।

 samasarm

इन्द्र ने जिस सभा मण्डप बनाने की आज्ञा दी थी उसे जैन आगमग्रन्थो में ‘समवसरण’ कहा गया है। आत्म कल्याण का सबको अवसर प्रदान करने वाला स्थान। समस्त प्राणियो पर तीर्थंकर की समानदृष्टि एवं वाणी का प्रसार।

देवों के दुन्दुभि नाद ने समवसरण के शुभ संवाद को सब ओर फैला दिया। देखते-देखते ऋजु कूला का तट तीर्थंकर महावीर की दिव्यध्वनि का परमतीर्थ बन गया। उनका उपदेश सुनने के लिए समव सरण के उस समुद्र मे जन समूह की सरिताए आ-आ कर मिलने लगीं। इन्द्र भी अपने विशाल परिवार के साथ वहां आ पहुंचा। उसने महावीर के कैवल्य का अपूर्व हर्ष मनाया तथा उनकी वन्दना कर समवसरण की अनरूप व्यवस्थाओ मे व्यस्त हो गया। तत्कालीन अन्य प्रमुख राजा, सामंत एव महामात्य भी अपने परिवारों के साथ वहां एकत्र हो गए। ऐसे अनेक पशु-पक्षी भी वहा आ मिले जिनकी जीवन-यात्रा का मोड़ अब अध्यात्म की ओर हो गया था। उनके हृदय से वैर, द्वेष, घृणा, क्रोध, हिंसा आदि असद वृत्तिया तिरोहित हो चुकी थीं। अंत र्विरोध शांत हो गया था। चीता-हिरण, गाय-सिंह, बिडाल - मूषक आदि बड़े निर्मल भाव से पास - पास बैठे महावीर की दिव्य वाणी की उत्कण्ठा पूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे। उस अमृत की, जिससे अनेक सोये हुए प्राण जागते थे। तीर्थंकर महावीर की सौम्य मुख-मुद्रा सबको दिखलाई दे रही थी। उस पर इतनी ताजगी और निर्मलता थी कि लगता ही नही था कि इन्होंने कठोर तपस्या की हैं इनके ज्ञान की उज्ज्वलता से वह सम्पूर्ण समवसरण प्रकाशमान था।