राग की चाहे जितनी मन्दता का शुभपरिणाम क्यों न हो, तद्यपि वह मैल है, अशुचि है, जहररूप है। शास्त्र में पुण्यभाव को किसी जगह व्यवहार से अम1तरूप भी कहा है, तथापि वह वास्वत में तो जहर ही है। अमृत का सागर तो एकमात्र भगवान आत्मा है- जिनको अन्दर में ऐसा भान हुआ हो, स्वाद आया हो; उन धर्मी जीवों को आत्मा के भानपूर्वक जो राग की मन्दता का परिणाम होता है, उस आत्मभाव का आरोप करके साथ में होनेवाले शुभराग को व्यवहार से अमृत कह दिया गया है; तथापि निश्चय से तो जहर ही है, अशुचि है, अपवित्र है।1’’
आस्त्रवभावना से आस्त्रवों के भेद-प्रभेदों के विस्तार में जाने की अपेक्षा आस्त्रवों के हेयत्व का चिन्तन अधि आवश्यक है, अधिक उपयोगी है और आस्त्रवों से भिन्न भगवान आत्मा के उपादेयत्व का चिंतन उससे भी अधिक आवश्यक है, उससे भी अधिक उपयोगी है।
उपलब्ध बारह भावनाओं में लगभग सर्वत्र ही उक्त भाव उपलब्ध होते है। उक्त संदर्भ में पंडित श्री जयचन्दजी छाबड कृत बारह भावना का निम्नांकित छंद द्रष्टव्य है -
निश्चयदृष्टि से देखें तो भगवान आत्मा तो मात्र ज्ञानमय है, विभावपरिणामरूप समस्त आस्त्रवभाव उसें हैं ही नहीं। ज्ञानमय आत्मस्वभाव के अज्ञान के कारण पर्याय में जो विभावपरिणामरूप आस्त्रवभाव उत्पन्न हो रहे हैं, वे सब विडारने योग्य हैं, हेय है।’’
ब्र. चुन्नीभाई देसाई कृत बारह भावना में समागत आस्त्रवभावना संबंधी निम्नांकित छनद भी द्रष्टव्य हैं-
इसीप्रकार का भाव श्री नथमलजी बिलाला कृत बारह भावना में उपलब्ध होता है, जो इस प्रकार है -
जिसप्रकार सागर की हिलोरों में डोलता काठ का टुकड़ा स्थिरता प्राप्त नहीं कर पाता है; उसीप्रकार यह प्राणी आस्त्रवों के कारण भवसागर में घूमता ही रहता है, कहीं भी स्थिरता प्राप्त नहीं कर पाता है; अतः संपूर्ण शुभाशुभ आस्त्रवां को पूर्णतः त्याग दीजिए और चैतन्यस्वरूप अविनाशी निज आत्मा को भज लीजिए अर्थात चैतन्यस्वरूप अविनाशी निज आत्मा का ही ध्यान कीजिए - इसी में सार है।’’
आस्त्रवभावना सम्बंधी उक्त कथन यद्यपि अति संक्षेप में हैं, एक-एक छनद में ही हैं; तथापित उनमें आस्त्रवभावों की हेयता और आत्मस्वभाव की उपादेयता का निर्देश आवश्य है।
आत्मस्वभाव के आश्रयपूर्वक शुभाशुभभावरूप आस्त्रवभावों से मुक्त होना ही आस्त्रवानुप्रेक्षा के चिन्तन का वास्तविक फल है।
स्वामी कार्तिकेय कार्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखते हैं -
जो पुरूष उपशम परिणामों में लीन होकर पूर्वकथित मिथ्यात्वादिभावों को हेय मानता हुआ छोड़ता है, उसके ही आस्त्रवभावना होती है।
इसप्रकार जानता हुआ भी जो त्यागने योग्य परिणामों को नहीं छोड़ता है, उसका आस्त्रभावना संबंधी सम्पूर्ण चिंतन निरर्थक है।’’
उक्त कथन से अत्यनत स्पष्ट है कि आस्त्रवभावना के चिंतन की सार्थकता आस्त्रवभावों को हेय जानकर, हेय मानकर त्याग देने में ही है।
अशुभास्त्रवरूप पापास्त्रवों पुण्यास्त्रव भी हेय हैं - यह बात सामान्यजनों को आसानी से गले नहीं उतरती। उन्हें यह विकल्प बना ही रहता है कि शुभ और अशुभ अथवा पुण्य और पाप समानरूप से हेय कैसे हो सकते हैं? उनका अंतरंग शुभस्त्रव को सहजरूप से हेय स्वीकार नहीं कर पाता हैं।
ऐसे जीवों को समझते हुए कविवर पंडित बनारसीदासजी लिखते हैं -
उक्त छंद में अत्यंत स्पष्टरूप में कहा गया है कि चाहे शील, तप, संयम, व्रत, दान और पूजन आदि का शुीाराग हो अथवा असंयम, कषाय, और विषयभोग आदि का अशुभराग हो; मूलवस्तु के विचार करने पर शुभ और अशुभ-दोनों ही प्रकार के भाव कर्मरूपी रोग ही हैं, कर्मबंध के कारण ही हैं, मोक्ष के कारण नहीं।
वीतरागी सर्वज्ञ भगवान ने कर्मों के आस्त्रव और बंध की पद्धऋति इसीप्रकार बताई है;अतः आत्महितकारी धर्म में शुभ और अशुभ सभी कर्म समानरूप से त्यागने योग्य ही हैं।
संसारसागर से पार उतारनेवाला, राग-द्वेष को हरनेवाला और अनन्तसुखमय महान मोक्ष का करनेवाला तो एकमात्र शुद्धोपयोग ही है, शुभ और अशुभभावरूप अशुद्धोपयोग नहीं।
उक्त सन्दर्भ में आचार्यकल्प पंडित टोरमलजी का निम्नांकित कथन द्रष्टव्य है -
’’ आस्त्रवतत्व में जो हिंसादिरूप पापास्त्रव हैं, उन्हें हेय जानता है; अहिंसादिरूप पुण्यास्त्रव हैं, उन्हें उपादेय मानता है; परंतु यह तो दोनों ही कर्मबन्ध के कारण हैं, इनमें उपादेयपना मानना वही मिथ्यादृष्टि है। वही समयसार के बंधाधिकार में कहा है -