|| दश धर्म स्कंद ||

संसार के समस्त प्राणियों में मानव श्रेष्ष्ठ है। मनुष्य ज्ञान के साथ आचार का पालन कर सकता है। आचार से सभी सद्गुणों की प्राप्ति होती है। कीर्ति की अभिवृद्धि के साथ विद्या की भी उपलब्धि आचार से ही होती है। आचार को ही शास्त्रों में चारित्र शब्द से वर्णित किया है - ’’चारितं खलु धम्मो’’ अर्थात् चारित्र ही वास्तविक धर्म है। धर्म की महिमा अपार है क्योंकि धर्म ही एक मात्र दुखों से छुडाकर सुख में पहुंचाता है जैसा कि कहा है -

संसारसागरनिमग्नशरीरिवृन्दमुद्धत्य यो धरित मोक्षनिकेतनात्नः।
सज्ज्ञानभनुविदिताखिलवस्सतुतत्वैः प्रोक्तो जिनैरखिलसौख्यकरः स धर्मः।।

अर्थात- जो संसार सागर में डूबे हुए जीवों को उससे निकालकर मुक्ति निकेतन में पहुंचता है। सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्य के द्वारा सम्पूर्ण तत्वों को जानने वाले वीतरागी सर्वज्ञदेव ने उसी को सर्वसुखकारी धर्म कहा है।

पर्वों की चर्चा जब भीचलती है, तब-तब उनका संबंध प्रायः खाने-पीने और खेलने से जोड़ा जाता है, जैसे-रक्षाबंधन के दिन खीर और लड्डू खोय जाते हैं, भौंरे खेले जाते हैं, राखी बांधी जाती है; होली के दिन अमुक पकवान खाये जाते हैं, रंग डाला जाता है, होली जलाई जाती है; दीपावली के दिन पटाखे चलाये जाते हैं; आदि-आदि।

पर अष्टाहिन्का और दशलक्षण जैसे जैनपर्वों का संबंध खाने और खेलने से न होकर खाना और खेलना त्यागने से है। ये भोग के नहीं, त्याग के पर्व हैं; इसलिए महपर्व हैं। इनका महत्व त्याग के कारण है, आमोद-प्रमोद के कारण नहीं।

पर किसी भी जैन से पूछिये क दशलक्षण महापर्व कैसे बनाया जाता है तो वह यही उत्तर देगा कि इन दिनों लोग संयम से रहते हैं, पूजन-पाठ करते हैं, व्रत-नियम-उपवास रखते हैं, हरित पदार्थों का सेवन नहीं करते। स्वाध्याय और तत्व-चर्चा में ही अधिकांश समय बिताते हैं। सर्वत्र बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा शास्त्र सभाएं होती हैं, उनमें उत्तमक्षमादि दशधर्मों का स्परूप समझाया जाता है। सभी लोग कुछ न कुछ विरक्ति धारण करते हैं, दान देते हैं आदि अनेक प्रकार के धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। सर्वत्र एक प्रकार से धार्मिक वातावरण बन जाता है।

पर्व दो प्रकार के होते हैं -

1. शाश्वत और

2. सामयिक

जिन्हें हम त्रैकालिक और तात्कालिक भी कह सकते हैं।

तात्कालिक पर्व भी दो प्रकार के होते हैं -

1. व्यक्ति विशेष से संबंधित और

2. घटना विशेष से संबंधित।

दीपावली, महावीर जयन्ती, रामनवमी, जन्माष्टमी आदि पर्व व्यक्ति विशेष से संबंध रखने वाले पर्व हैं, क्योंकि दीपावली और महावीर जयनती क्रमशः महावीर के निर्वाण और जन्म से संबंध रखती हैं और रामनवमी ओर जन्माष्टमी राम और कृष्ण के जन्म से संबंधित हैं।

घटना विशेष से संबंधित पर्वों में रक्षाबंधन, अक्षयतृतीया, होली आदि पर्व आते हैं, क्योंकि ये प्रसिद्ध पौराणिक घटनाओं से संबंध रखने वाले पर्व हैं। ऐतिहासिक घटनाओं से संबंधित आज के राष्ट्रीय पर्व - स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस कहे जा सकते हैं।

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त्रैकालिक अर्थात् शाश्वत पर्व न तो किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित होते हैं, औन न घटना विशेषसे; वे तो आध्यात्मिक भावों से संबंधित होते हैं। दशलक्षण महापर्व एक ऐसा ही त्रैकालिक शाश्वत पर्व है, जो आम के क्रोधादि विकारों के अभाव के फलस्वरूप प्रकट होने वाले उत्तमक्षमादि भावों से संबंध रखता है।

घटनाओं और व्यक्ति विशेष से संबंधित पर्व निश्चित रूप से अनादि नहीं हो सकते; क्योंकि वे संबंधित घटना या व्यक्ति से पूर्व संभव नहीं हैं। वे अनन्त भी नहीं हो सकते; क्योंकि जब भविष्य में कोई इनसे भी महत्वपूर्ण व्यक्ति उत्पन्न हो जायगा या घटना घट जायेगी तो जगत उसे याद रखने लगेगा, उससे संबंधित पर्व मानने लगेगा, इन्हें भूल जायगा। अगले तीर्थंकर उत्पन्न होने पर भविष्य में उनकी जयन्ती और निर्वाण-दिवस मनाया जायगा, इनका नहीं। जिसप्रकार हम भूतकाल की चैबीसी को भूल-से बैठे हैं, उसीप्रकार भविष्य इन्हें भी याद नहीं रख पावेगा।

घटनाएं और व्यक्ति कितने ही महत्वपूर्ण क्यों न हों, वे सार्वभौम और सार्वकालिक नहीं हो सकते। उन सबकी अपने-अपने क्षेत्र और काल संबंधी सीमाएं हैं, वे असीम नहीं हो सकते। अतः वे ही पर्व सार्वभौम और सार्वकालिक हो सकते हैं, जो किसी व्यक्ति या घटना विशेष से संबंधित न होकर सभी जीवों से, उनके भावों से, समानरूप से संबंधित हों। दशलक्षण महापर्व एक ऐसा ही महान पर्व है जो सब जीवों के भावों से समानरूप से संबंधित है। यही कारण है कि वह शाश्वत है, सबका है, और सदा रहेगा। उसकी उपयोगिता सार्वभौमिक और सार्वकालिक है।

दशलक्षण महापर्व सम्प्रदायविशेष का नहीं, सबका है। भले ही उसे मात्र सम्प्रदायविशेष के लोग ही क्यों न मानते हों, पर वह साम्प्रदायिक पर्व नहीं है; क्योंकि वह साम्प्रदायिक भावनाओं पर आधारित पर्व नहीं है, उसका आधार सार्वजनिक है। विकारी भावों का परित्याग एवं उदात्तभावों का ग्रहण ही उसका आधार है, जो सभी को समानरूप से हितकारी है। अतः यह पर्व मात्र जैनों का नहीं, जन-जन का पर्व है। इसे सम्प्रदायविशेष का पर्व मानना स्वयं साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है।

यह सब का पर्व है, इसका एक कारण यह भी है कि सभी प्राणी सुखी होना चाहते हैं और दुःख से डरते हैं। क्रोधादि भाव दुःख के कारण हैं और स्वयं दुखस्वरूप हैं एवं उत्तमक्षमादि भाव सुख के कारण हैं और स्वयं सुखस्वरूप हैं। अतः दुख से डरने वाले सभी सुखार्थी जीवों को क्रोधादि के त्यागरूप उत्तमक्षमादि दश धर्म परम आराध्य हैं।

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इसप्रकार सभी को सुखकर और सन्मार्गदर्शक होने से यह दशलक्षण महापर्व सभी का पर्व है।

क्रोधादि विभावभावों के अभवरूप उत्तमक्षमादि दशधर्मों का विकास ही जिसका मूल है, ऐसे दशलक्षण महापर्व की सार्वभौमिकता का आधार यह है कि सर्वत्र ही क्रोधादिक को बुरा, अहितकारी और क्षमादि भावों को भला और हितकारी माना जाता है। ऐसा कौनसा क्षेत्र है, जहां क्रोधादि को बुरा और क्षमादि को अच्छा न माना जाता हो?

वह सर्वकालिक भी इसी कारण है; क्योंकि कोई काल ऐसा नहीं कि जब क्रोधादि को हेय और उत्तमक्षमादि को उपादेय न माना जाता रहा हो, न माना जाता हो ओर न माना जाता रहेगा। अर्थात सर्वकालों में इसकी उपादेयता असंगिग्ध है। भूतकाल में भी क्रोधादि से दुःख व अशान्ति तथा क्षमादि से सुख व शान्ति की प्राप्ति होती देखी गई है, वर्तमान में भी देखी जाती है और भविष्य में भी देखी जायेगी।

उत्तमक्षमादि धर्मों की सार्वभौमिक त्रैकालिक उपयोगिता एवं सुखकरता के कारण ही दशलक्षण महापर्व शाश्वत पर्वों में गिना जाता है और इसी कारण यह महापर्व है।

यहां एक प्रश्न संभव है कि यह महापर्व त्रैकालिक है, अनादि-अनन्त है, तो फिर इनके आरंभ होने की कथा कहीं जाती है? कहा जाता है कि कालचक्र के परिवर्तन में कुछ स्वाभावितक उतार-चढ़ाव आते हैं जिन्हें जैन परिभाषा में अवसर्पिणी में कुछ उत्सर्पिणी के नाम से जाना जाता हे। अवसर्पिणी में क्रमशः ह्रास और उत्सर्पिणी में क्रमशः विकास होता है। प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी में छह-छह काल होते हैं।

प्रत्येक अवसर्पिणी काल के अंत में जब पंचम काल समाप्त और छठा काल आरंभ होता है, तब लोग अनार्यवृत्ति कर हिंसक हो जाते हैं। उसके बाद जब उत्सर्पिणी आरंभ होती है और धर्मोत्थान का काल पकता है, तब श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से सात सप्ताह (49 दिन) तक विभिन्न प्रकार की बरसात होती है, जिसके माध्यम से सुकाल पकता है और लोगों में पुनः अहिंसक आर्यवृत्ति का उदय होता है; एकप्रकार से धर्म का उदय होता है, आरंभ होता है और उसी वातावरण में दश दिन तक उत्तमक्षमादि दशधर्मों की विशेष आराधना की जाी है तथा इसी आधार पर हर उत्सर्पिणी में यह महापर्व चल पड़ता है।

यह कथा तो मात्र यह बताती है कि प्रत्येक उत्सर्पिणी काल में इस पर्व का पुनरारम्भ कैसे होता है। इस कथा से दशलक्षण महापर्व की अनादि-अनन्तता पर कोई आंच नहीं आती ।

यह कथा भी तो शश्वत कथा है, जो अनेक बार दुहराई गई है और दुहराई जायगी; क्योंकि अवसर्पिणी के पंचमकाल के अन्त में जब-जब लोग इन उत्तमक्षमादि धर्मों से अलग हो जायेंगे और उत्सर्पिणी के प्रारंभ काल में जब-जब इसकी पुनरावृत्ति होगी, तब-तब उस युग के दशलक्षण महापर्व का इस तरह आरंभ होगा। वस्तुतः यह युगारंभ की चचा्र है, पर्वारंभ की नहीं। यह अनादि से अनेक युगों तक इसीप्रकार आरंभ हो चुका है और भविष्य में भी होता रहेगा।

इसकी अनादि-अनन्तता शस्त्र-सम्मत तो है ही, युक्तिसंगत भी है; क्योंकि जब से यह जीव है तभी से यद्यपि क्षमादिस्वभावी है, तथापि प्रकटरूप (पर्याय) में क्रोधादि विकारों से युक्त भी तभी से है। इसीकारण ज्ञानानन्दस्वाभावी होकर भी अज्ञानी और दुखी है। जब से यह दुखी है; सुख की आवश्यकता भी तभीसे है। चूंकि सभी जीव अनादि से हैं; अतः सुख के कारण उत्तक्षमादि धर्मों की आवश्यकता भी अनादि से हो रही है।

इसीप्रकार यद्यपि अनन्त आत्माएं क्षमादिस्वभावी आत्मा का आश्रव लेकर क्रोधादि विकारो से युक्त हैं, दुःखी हैं; अतः आज भी इन धर्मों की आराधना की पूरी-पूरी आवश्रूकता है तथा सुदूरवर्ती भविष्य में भी क्रोधदि विकारों से युक्त दुःखी आत्माएं रहने वाली हैं; अतः भविष्य में भी इनकी उपयोगिता असंदिग्ध है।

तीनलोक में सर्वत्र ही क्रोधादि दुःख के और क्षमादि सुख के कारण हैं। यही कारण है कि यह महापर्व शाश्वत अर्थात त्रैकालिक ओर सार्वभौमिक है, सबका है। भले ही सब इसकी आराधना न करें, पर यह अपनी प्रकृति के कारण सबका है, सबका था और सबका रहेगा।

यद्यपि अष्टाहिन्का महापर्व के समान यह भी वर्ष तीन बार आता है -

1. भादों सुदी 5 से 14 तक

2. माघ सुदी 5 से 14 तक व

3. चैत्र सुदी 5 से 14 तक;

तथापि सारे देश में विशालरूप में बड़े उत्साह के साथ मात्र भादों सुदी 5 से 14 तक, ही मनाया जाता है। बाकी दो को तो बहुत से जैन लोग भी जानते तक नहीं है। प्राचीन काल में बरसात के दिनों में आवागमन की सुविधाओं के पर्याप्त न होने से व्यापारादि कार्य सहज ही कम हो जाते थे। तथा जीवों की उत्पत्ति भी बरसात में बहुत होती है। अहिंसक समाज होने से जैनियों के साधुगण तो चार माह तक गांव से गांव भ्रमण बंद कर एक स्थान पर ही रहते हैं, श्रावक भी बहुत कम भ्रमण करते थे। अतः सहज ही सत्समागम एवं समय की सहज उपलब्धि ही विशेष कारण प्रतीत होते हैं - भादों में ही इसके विशाल पैमाने पर मनाये जाने के।

वैसे तो प्रत्येक धार्मिक पर्व का प्रयोजन आत्मा में वीतरागभाव की वृद्धि करने का ही होता है, किंतु इस पर्व का संबंध विशेष रूप से आत्म-गुणों की आराधना से है। अतः यह वीतरागी पर्व संयम ओर साधना का पर्व है।

पर्व अर्थात मंगल काल, पवित्र अवसर। वास्तव में ते अपने आत्मा-स्वभाव की प्रतीतिपूर्वक वीतरागी दशा का प्रगट होना ही यथार्थ का पर्व है; क्योंकि वही आत्मा को मंगलाकरी है और पवित्र अवसर है।

धर्म तो आत्मा में प्रकट होता है, तिथि में नहीं; किन्तु जिस तिथि में आत्मा में क्षमादिरूप वीतरागी शांति प्रकट हो, वही तिथि पर्व कहीं जाने लगती है। धर्म का आधार तिथि नहीं, आत्मा है।

आत्मस्वरूप की प्रतीतिपूर्वक चारित्र (धर्म) की दश प्रकार से आराधना करना ही दशलक्षण धर्म है। आत्मा में दश प्रकार के सद्भावों (गुणों) के विकास से संबंधित होने से इसे दशलक्षण महापर्व कहा जाता है।

अनादिकाल से ही प्रत्येक आत्मा, आत्मा में ही उत्पन्न, आत्मा के ही विकार-क्रोध, मान, माया, लोभ, असत्य, असंयम आदि के कारण ही दुःखी और अशान्त रहता आया है। अशान्ति और दुख मेटने का एकमात्र उपाय आत्माराधना है। आत्म-स्वभाव को जानकर, मानकर, उसी में जम जान से, उसी में समा जाने से, अतीन्द्रिय आनन्द और सच्ची शान्ति की प्राप्ति होती है। ऐसे ही आत्माराधक व्यक्ति के हृदय में उत्तमक्षमादि गुणों का सहज विकास होता है। अतः यह स्पष्ट है कि उक्त पर्व का संबंध आत्माराधना से है, प्रकारान्तर से उत्तमक्षमादि दश गुणों की आराधना से है।

क्षमादि दश गुणों को दशधर्म भी कहते हैं। ये दशधर्म हैं -

1. उत्तमक्षमा

2. उत्तममार्दव

3. उत्तमआर्जव

4. उत्तमशौच

5. उत्तमसत्य

6. उत्तमसंयम

7. उत्तमतप

8. उत्तमत्याग

9. उत्तमआकिंचन्य और

10. उत्तमब्रह्मचर्य

ये दश धर्म नहीं, धर्म के दशलक्षण हैं; जिन्हें संक्षेप में दशधर्म शब्द से भी अभिहित कर दिया जाता है। जिस आत्मा-रूचि, आत्मा-ज्ञान और आत्म-लीनतारूप धर्म पर्याय प्रकट होती है, उसमें धर्म के वे दश लक्षण सहज प्रकट हो जाते हैं। ये आत्माराधन के फलस्वरूप प्रकट होने वाले धर्म हैं, लक्षण हैं, चिन्ह हैं।

यद्यपि उक्त दशधर्म चारित्रगुण की निर्मल पर्यायें हैं, तथापि प्रत्येक के साथ लगा हुआ ’उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की अनिवार्य सत्ता को सूचित करताहै। तात्पर्य यह है कि ये चरित्र गुण की निर्मल दशाएं सम्यग्दृष्टि ज्ञानी आत्मा को ही प्रकट होती हैं, अज्ञानी मिथ्यादृष्टि को नहीं।

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वस्तुतः चारित्र ही साक्षात् धर्म है। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान तो चारित्ररूप वृक्ष की जड़ें (मूल) हैं। जैसे वृक्ष जड़ के बिना खड़ा नहीं रह सकता, पनप नहीं सकता, अथवा जड़ के बिना जैसे वृक्ष की एक प्रकार से सत्ता ही संभव नहीं है; उसीप्रकार सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानरूपी जड़ के बना सम्यक्चारित्ररूपी वृक्ष खड़ा ही नहीं रह सकता, पनप नहीं सकता, अथवा इन दोनां के बिना सम्यक्चारित्र की सत्ता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

यद्यपि लोक में बहुत से लोग आत्म-श्रद्धान और आत्म-ज्ञान के बिना भी बंधन के भय एवं स्वर्ग-मोक्ष तथा मान-प्रतिष्ठा आदि के लोभ से क्रोधादि कम करते या नहीं करते-से देखे जाते हैं, तथापि वे उत्तमक्षमादि दशधमों के धारक नहीं माने जा सकते हैं।

इस संबंध में महापंडित टोडरमलजी के विचार द्रष्टव्य हैं -

’’तथा बंधादिक के भय से अथवा स्वर्ग-मोक्ष की इच्छा से क्रोधादि नहीं करते, परंतु वहां क्रोधादि करने का अभिप्राय तो मिटा नहीं है। जैसे - कोई राजादिक के भय से महंतपने के लोभ से परस्त्री का सेवन नहीं करता, तो उसे त्यागी नहीं कहते। वैसे ही यह क्रोधादिक का त्यागी नहीं है।

तो कैस त्यागी होता है? पदार्थ अनिष्ट-इष्ट भासित होने से क्रोधादिक होते हैं; जब तत्वज्ञान के अभ्या से कोई इष्ट-अनिष्ट भासित न हो, तब स्वयमेव ही क्रोधादि उत्पन्न नहीं होते; तब सच्च धर्म होता है।1’’

इसप्रकार सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानपूर्वक क्रोधादि का नहीं होना ही उत्तमक्षमादि धर्म है।

यद्यपि उक्त दशधर्मों का वर्णन शास्त्रों में जहां-तहां मुनिधर्म की अपेक्षा किया गया है, तथापि ये धर्म मात्र मुनियों को धारण करने के लिए नहीं हैं; गृहस्थों को भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार इनके अवश्य धारण करना चाहिए। धारण क्या करना चाहिए, वस्तुतः बात तो ऐसी है कि ज्ञानी गृहस्थ के भी अपनी-अपनी भूमिकानुसार ये होते ही हैं, इनका पालन सहज पाया जाता है।

तत्वार्थसूत्र में गुप्ति, समिति, अनुप्रेक्षा (बारह भावना) और परीषहजय के साथ ही उतमक्षमादि दशधर्मों की चर्चा की गई है।2 ये सब मुनिधर्म से संबंधित विषय हैं। यही कारण है कि जहां-जहां इनका वर्णन मिलता है, वहां-वहां उत्कृष्टरूप का ही वर्णन मिलता है। इससे आतंकित होकर सामान्य श्रावकों द्वारा इनकी उपेक्षा संगत नहीं है।

यदि मुनियों को अनन्तानुबंधी आदि तीन कषायों के अभावरूप अत्तमक्षमादि धर्म होंगे तो पंचम गुणस्थानवर्ती ज्ञानी श्रावकों के अनन्तानुबंधी आदि दो कषायों के अभावरूप उत्तमक्षमादि धर्म होंगे। इसीप्रकार चतुर्थ गुणस्थानवर्ती अविरत सम्यग्दृष्टि के एकमात्र अनन्तानुबन्धी कषाय के अभावरूप उत्तक्षमादि धर्म प्रकट होंगे। मिथ्यादृष्टि के उत्तमक्षमादि धर्म नहीं होते। उसकी कषायें कितनी भी मंद क्यों न हों, उसके उक्त धर्म प्रगट नहीं हो सकते; क्योंकि उक्त धर्म कषाय के अभाव से प्रकट होने वाली पर्यायें हैं, कषाय की मंदना से नहीं। मंदता से जो तारतम्यरूप भेद पड़ते हैं, उन्हें शास्त्रों में लेश्या संज्ञा दी है, धर्म नहीं। धर्म तो मिथ्यात्व और कषाय के अभाव का नाम है, मंदता का नहीं।

इन धर्मों की व्याख्या अनेक पहलुओं (दृष्टिकोणों) से संभव है। जैसे - मुनियों और श्रावकों की अपेक्षा, निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा, अन्तर और बाह्य की अपेक्षा आदि।

इनमें से प्रत्येक धर्म स्वतंत्ररूप से विस्तृत व्याख्या की अपेक्षा रखता है। आगे प्रत्येक पर विस्तृत विश्लेषण किया ही जा रहा है।

अतः अब यहां इस पवित्र भावना के साथ विराम लेता हूँ कि इस दशलक्षण महापर्व के पाव अवसर पर सभी आत्माएं धर्म के उक्त दश लक्षणों को अच्छी तरह जानकर, हिचानकर, तद्रूप परिणमन कर परमसुखी हों।