उत्तम त्याग धर्म

मंगलाचरण

हरति जननदुःखं मुक्तिसौख्यं विधत्ते,
रचयति शुभबुद्धिं पापबुद्धिं धुनीते।
अवति सकलजन्तून् कर्मशत्रून् निहन्ति,
प्रशमयति मनो यस्तं बुधा धर्ममाहुः।।1।।

अर्थ- जो संसार के दुःखों से बचाता है, मोक्ष सुख प्रदान करता है, बुद्धि को निर्मल बनाता है, पाप बुद्धि को नष्ट करता है, समस्त प्राणियों की रक्षा करता है, कर्म शत्रुओं को नष्ट करता है मन को शांत करता है, उसे ज्ञानी जन धर्म कहते हैं।

बाह्याभ्यनतर परिग्रहत्यजनं त्यागः। ज्ञान संयम शौचापकरण दानं त्यागः। आत्माहित-कृतविषय-कषायाणां त्यजनं त्यागः। राग द्वेष क्राम क्रोधादि विकार भावनां त्यजनं त्यागः। राग द्वेष क्राम क्रोधादि विकार भावनां त्यजनं त्यागः। आत्मव्यतिरिक्त बाह्य पदार्थेषु इष्टानिष्ट कल्पनां त्यजनं त्यागः। त्रिविध पात्रेभ्यश्चतुर्विधाहार दानं त्यागः। ऐहिकामुत्रिकफलार्थमर्थ व्ययस्त्यागः।

1. बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह को छोड़ना त्याग कहलाता है।

2. ज्ञान, संयम और शौच के उपकरण साधु को प्रदान करना त्याग कहलाता है।

3. आत्मा के अहित करने वाले विषय कषाय का छोड़ना त्याग कहलाता है।

4. राग, द्वेष, काम, क्रोध आदि विकार भावों का छोड़ना त्याग कहलाताहै।

5. आत्मा से भिन्न बाह्य पदार्थों में इष्ट अनिष्ट कल्पना का छोड़ना त्याग कहलाता है।

6. तीन प्रकार के पात्रों को चार प्रकार का आहार देना त्याग कहलाता है।

7. इस लोक पर लोक में फल प्राप्ति के लिएधन का व्यय करना त्याग कहलाता है।

दाता का लक्षण

सप्त गुणों से युक्त सम्यग्दृष्टि नवधा भक्ति पूर्वक दान देने वाला धर्म में तत्पर जो होता है उसे दाता जानना चाहिए।

त्योगो भोगो विनाशश्च, विभवस्य त्रयीगतिः।
द्वेयस्याद्ये न विद्येते, नाशस्तस्यावशिष्यते।।2।।

अर्थ- धन की तीन गति होती है त्याग, भोग और विनाश जिसके धन का उपभोग त्याग और भोग में नहीं होता उसके धन का नाश नियम से होता है।

त्याग एव गुणः श्लाध्यः, किमन्यै र्गुण शालिभिः।
त्यागाज् जगति पूज्यन्ते, पशुपाषाणपादपाः।।3।।

अर्थ- अन्य गुणों की अपेक्षा त्याग गुण श्रेष्ठ है, त्याग के कारण ही पशु पाषाण तथा वृक्ष आदि जगत में पूजे जाते हैं।

त्यागो हि परमो धर्मस्, त्याग एव परं तपः।
त्यागाद् इह यशो लाभः, परत्राभ्युदयो महान्।।4।।

अर्थ- त्याग ही परम धर्म है, त्याग ही परम तप है, त्याग से ही इस जगत में यश का लाभ होता है और पर लोक में महान अभ्युदय की प्राप्ति होती है।

द्रव्यानुसारेण ददाति दानं, पात्रेषु शीलस्थित मानवेषु।
यो भावतो जैनमतानुरागी, स त्याग धर्मः कथितो जिनेन्द्रैः।।5।।

अर्थ- जो जैन मत का अनुरागी भाव पूर्वक शील आदि में स्थित मनुष्यों को अपने द्रव्य के अनुसार दान देता है उसे जिनेन्द्र भगवान त्याग धर्म कहते हैं।

जो चयदि मिट्ठभोज्जं, उवयरणं रायदोससंजणकं।
वसदिममत्तहेदुं, चायगुणो सो हवे तस्स।।6।।

अर्थ- जो मिष्ट भोजन और, राग द्वेष को उत्पन्न करने वाले उपकरण को तथा ममत्व भाव के उत्पन्न होने में निमित्त वसतिका को छोड़ देता है उसके त्याग धर्म होता है।

णिव्वेगतियं भावइ, मोहं चइऊण सव्वदव्वेसु।
जो तस्स हवे चागो, इदि, भणिदं जिणवरिंदेहिं।।7।।

अर्थ- जो समस्त द्रव्यों में मोह छोड़कर, संसार शरीर और भोगों से विरक्त होता है उसके त्याग धर्म होता है ऐसा जिनेन्द्र भगवान ने कहा है।

कः पूरयति दूष्पूर - माशागर्तं चिरादहो।
चित्रं यत्क्षणमात्रेण, त्यागेनैकेन पूर्यते।।8।।

अर्थ- आशा रूपी गड्ढा चिरकाल में भी किसके द्वारा भरा जा सकता है? किंतु आश्चर्य है कि त्याग के माध्यम से क्षण भर में पूर्ण हो जाता है।

दाता की प्रशंसा

दातृयाचकयो र्भेदः कराभ्यामेव दर्शितः।
अर्थिनस् तिष्ठतोऽधस्तात् स दातुरूपरिस्थितः।।9।।

अर्थ- दाता और याचक का भेद हाथों के माध्यम से दिखाया गया है, चायक का हाथ नीचे रहता है और दाता का हाथ ऊपर रहता है अर्थात् दाता बड़ा और याचक छोटा होता है।

धनानि जीवितं चैव, परार्थे प्राज्ञ मुत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति।।10।।

अर्थ- बुद्धिमान परोपकर के लएि धन और जीवन का त्याग करे। विनाश के निश्चित होने पर तथा समीचीन निमित्त के मिलने पर त्याग करना ही श्रेष्ठ है।

उदारवादी पुरूषः कीत्र्या विधुरिव दिशां मण्डलं श्वेतयते, वृहस्पतीव वाग्मी जायते, पूषेव प्रतापनिलयः स्यात्, नीत्यां शुक्राचार्यसदृशो भवति।

अर्थ- उदार दानी पुरूष कीत्रि से चन्द्रमा के समान दिशाओं के समूह को श्वेत करता है, वृहस्पति के समान विद्वान होता है, सूर्य के समान प्रताप युक्त होता है, नीती में शुक्राचार्य के समान होता है।

दान के पाँच अधिकार

पात्रं दाता दानविधि, र्देयं दान फलं तथा।
अधिकारा भवन्येते, दाने पंच यथाक्रमम्

अर्थ- पात्र, दाता, दान की विधि, देने योग्य वस्तु, और दान का फल ये पांच अधिकार क्रम से दान के विषय में जानना चाहिए।

उत्तम पात्र

सत्पात्रं त्रिविधं भवति सर्वसंगविनिर्मुक्तान् गुणसम्पदा समन्वितान् रत्नत्रयविभूषितान् सर्वप्राणिहितोद्यतान् भव्यजीवबोधकान् पापभीरून् इन्द्रिय मनोगजसिंहान् महाधैर्यवतः संख्यातीतगुणसमुद्रान् तृणहेमशत्रुमित्रसमभावान् सर्वामंगललिप्तान् संसारसागरसंतारकान् मुनीन्द्रान् उत्तमपात्रान् विद्धि।।

अर्थ- सत्पात्र तीन प्रकार के होते हैं। समस्त परिग्रह से रहित, गुण रूपी सम्पत्ति से सहित, रत्नत्रय से विभूषित, समस्त प्राणियों के हिता में तत्पर भव्य जीवों को सम्बोधन करने वाले, पाप से भयभीत, इन्द्रिय और मन रूपी हाथी को पराजित करने में सिंह के समान, महाधैर्यवान, असंख्यात गुणों के समुद्र, तृण, सोन, शत्रु मित्र में समभाव, समस्त शरीर मल से लिप्त संसार से तारने वाले मुनियों को उत्तम पात्र समझाना चाहिए।

मध्यम पात्र

साणुव्रताः शुद्धदृशोऽकषायिणः, स्वस्त्री प्रहृष्टाः सदयाः शुभाशयाः।
साधुप्रिया जैनजनोपकारिणः, ते साधुभि र्मध्यमपात्रमीरितम्।।12।।

अर्थ- जो शुद्ध सम्यग्दृष्टि अणुव्रती और कषाय रहित है स्व स्त्री में सन्तुष्अ शुीा परिणामी साधु हैं प्रिय जिन्हें ऐसे जैन मनुष्यों का उपकार करने वाले व्यक्ति साधुओं द्वारा श्रावक कहे गये हैं।

पुनर्ये सम्यग्दृष्टयो व्रतोपेताः दानपूजापरायणाः सदाचारास्तान् मध्यमपात्रान् जानीहि।।

अर्थ- जो सम्यग्दृष्टि व्रतों से सहित दान पूजा में तत्पर सदाचारी है उन्हें मध्यम पात्र जानना चाहिए।

जघन्य पात्र

व्रतहीनान् सम्यग्दृष्टीन् जिनादिपंचपरमेष्ठि भक्ति - तत्परान्।
जिन शासनप्रभावकान् सधर्मिवत्सलान् जघन्यपात्रान् अवैहि।।13।।

अर्थ- व्रत रहित सम्यग्दृष्टि पंचपरमेष्ठी की भक्ति में तत्पर जिन शासन की प्रभावना करने वाले साधर्मियों में वात्सल्य करने वालों के जघन्य पात्र जानना चाहिए।

पांच प्रकार के पात्र

उत्कृष्ट पात्रमनगारमणुव्रताढयं, मध्यं व्रतेन रहितं सुदृशं जघन्यं।
निर्दर्शनं व्रतनिकाययुतं कुपात्रं, युग्मोज्झितं नरमपात्रमिदं तु विद्धिः।।14।।

अर्थ- उत्कृष्ट पात्र मुनि, मध्यम पात्र अणुव्रती श्रावक, जघन्यपात्र अवितर सम्यग्दृष्टि, कुपात्र सम्यग्दर्शन रहित व्रती तथा सम्यग्दर्शन और व्रत दोनों से रहित (इन्द्रिय विषय लोलुपी, स्वेच्छाचारी, कुमार्गगामी, कषाय, कषाय बहुत) मनुष्य को अपात्र जानना चाहिए।

कुपात्र दान का फल

कुपात्रदानेन भवेद्ः, दारिद्रदोषेण करोति पापं।
पापाधिकारी नरकं च गच्छेत्, पुन र्दरिद्रः पुनरेव पापी।।15।।

अर्थ- कुपात्र दान से दाता दरिद्र होता है, दरिद्रता के कारण पाप करता है, पानी नरक में जाता है पुनः दरिद्र होता है फिर पाप करता है।

दान का फल

पंचसूनापरः पापं, गृहस्थः संचिनोति यत्।
तदपि क्षालयत्येव, मुनिदान विधानतः।।16।।

अर्थ- पंच सून में तत्पर गृहस्थ जिन पापों का संचय करता है वे पाप मुनि दान की विधि से धुल जाते हैं।

खण्डनी पेषणी चुल्ली, उदकुम्भः प्रमार्जनी।
पंचसूना गृहस्थस्य, तेन मोक्षं न गच्छति।।17।।

अर्थ- उखली, चक्की, चूल्हा, घड़ा, झाडू ये पांच सूना गृहस्थ के होते हैं इसलिए उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता है।

आहार के अयोग्य गृह

गायकस्य तलारस्य, नीचकर्मोपजीविनः।
मालिकस्य विलिंगस्य, वेश्यायास्तैलिकस्य च।।18।।

अर्थ- गायक, नीच कार्यों से अजीविका करने वाले, माली, कुलिंग, वेश्या, तेली, शिल्पी, दीन, आदि अस्पृश्य शूद्रों के यहां मुनि को आहार नहीं लेना चाहिए।

साधु के दान काल में त्यागने योग्य कार्य

शाठ्यंगर्वमवज्ञानं, पारिप्लवमसंयमं।
वाक्पारूष्यं विशेषेण, वर्जयेत् भोजनक्षण।।19।।

अर्थ- शठता, अहंकार, अज्ञान, असंयम, कठोर, वचन आहार दान के समय विशेष रूप से छोड़ देना चाहिए।

दान के पांच आभूषण

आनन्दाश्रूणि रोमाणि, बहुमानं प्रियं वचः।
पश्चात् दानानुमोदं च, दाने पंचैव भूषणम्।।20।।

अर्थ- आनन्द के आंसू आना, शरीर रोमांचित होना बहुमान होना, प्रिय वचन बोलना और बाद में दान की अनुमोदना करना ये पांच दान के आभूषण हैं।

दान के पांच दूषण

अनादरो विलम्बं च, विमुखं विप्रियं वचः।
पश्चात्तापोऽनुपातश्च दाने पंचैव दूषणम्।।21।।

अर्थ- अनादर पूर्वक दान देना, देरी करना, विकृत मुख बनाना, कठोर वचन बोलना, दान देकर पश्चात्ताप करना और दुःखी होना ये पांच दान के दूषण हैं।

कठोर वचन बोलना

मुमुक्षूणां क्षुधां तीव्रां यो निवारयतीदृशं।
स एव मान्यो वन्द्योऽसौ, संसाराब्धितरण्डकः।।22।।

अर्थ- जो भूख साधुओं की तीव्र बाधा को दूर करता है वह माननीय है वन्द्यनीय है, वही संसार समुद्र को तैरने के लिए जहाज के समान है।

केचिच्च दानिनः सन्ति, केच्चि प्रियभाषिणः।
दानिनः प्रयिवक्ता च, लक्षेष्वपि च दुर्लभाः।।23।।

अर्थ- कोई दानी है, कोई प्रिय बोलने वाले हैं, किंतु दानी और प्रिय बोलने वाले लाखों में भी दुर्लभ हैं।

द्वीपेष्वर्ध तृतीयेषु, पात्रेभ्यो वितरन्ति ये।
ते धन्या इति च ध्यायेदतिथ्यन्वेषणोद्यतः।।24।।

अर्थ- जो ढाई द्वीप में पात्रों को दान देते हैं वे धन्य है ऐसा अतिथि की खोज करने वाला चिन्तन करें।

पंच आश्चर्य

आकाश में दुन्दुभि बाजा बजाना, सुगन्धित वायु का बहना, देवों द्वारा धन्य-धन्य मधुर शब्द का होना, पंच वर्ण के पुष्पों की वर्षा होना रत्नों की वर्षा होना आहार दान के प्रभाव से ये पंच आश्चर्य होते हैं।

कन्जूस की निन्दा

ये लोभग्रस्ता धनिनः सुखार्णवं दानं न दद्युः ते उरगा भूत्वा धनं रक्षितुं तिष्ठन्ति। अतो गृहस्थता पात्रदानेन गुणवती प्रोक्ता तद्हीना सा पाषाणनौकोपमा ज्ञेया।

अर्थ- जो लोभी धनवान् सुखों की खान स्वरूप दान को नहीं देते हैं वे मरकर सांप बनकर धन की रक्षा करते हैं इसलिए गृहस्थी पात्र दान से गुणवती कही गई है, पात्र दानसे हीन गृहस्थी पाषाण की नौका केक समान अर्थात् संसार सागर में डुबाने वाले जानना चाहिए।

दाता के सप्त गुण

श्रद्धा भक्तिरलोभत्वं, दया शक्तिः क्षमापरा।
विज्ञानं चेति सप्तैते, गुणा दातुः प्रकीर्तिताः।।26।।

अर्थ- पात्र के प्रति श्रद्धा, भक्ति, उदारता, दया, शक्ति, क्षमा, विज्ञान इस प्रकार ये सात गुण दाता के कहे गये हैं।

श्रद्धा गुण

अद्याचिन्त्यमहाफलेन फलितो, मत्पुण्यकल्पद्रुमः,
संसारोदधिमज्जता च कलितं, संयानपात्रं मया।।27।।

विद्याद्याम्बरगामिनी शिवपुरे, गन्तुं च लब्धं मया,
सत्साधुर्यदयं तपः कृश्वपुः, प्राप्तो मदीये गृहे।।28।।

अर्थ- आज अचिन्त्य महापुण्य के फल से मेरा पुण्य रूपी कल्पवृक्ष फलित हुआ है, संसार रूपी समुद्र में डूबते हुये मैंने समीचीन पात्र प्राप्त कर लिया है मोक्ष नगर को जाने वाले मेरे द्वारा आकाश गामिनी विद्या आदि प्राप्त कर ली है क्योंकि तप से कृश शरीर सत्याधु मैंने अपने घर पर प्राप्त कर लिया है।

भक्ति गुण

आभुक्ते र्मुनि सन्निधै शुभमतिः, स्थित्वा विशोध्यामलान्,
आहारान् परिहार्य वीक्ष्य सततं, मार्जारकीटादिकान्।।29।।

भुक्त्यन्ते परिणम्य साधु हृदि सं-तृप्तो भवेद् यः पुमान्,
दाता तन्मुनिसेवनेयमुदिता, भक्तिश्च सा पुण्यदा।।30।।

अर्थ- भोजन पर्यन्त जो शुभमति मुनि के पास बैठकर, आहार शोधकर बिल्ली, कीड़े आदि को देख कर दूर करता है, भोजन के अंत में प्रणाम कर मन में संतुष्ट होता है, यह मुनि की सेवा दाता को पुण्य की देन वाली भक्ति कहलाती है।

अलुब्धता गुण

अमुष्मादस्ति मे कार्य-मस्मै दानं ददाम्यहं।
ईदृग्मनो न यस्यास्ति, स तदा नैव लोभवन्।।31।।

अर्थ- इससे मुझे काम है इसलिए मैं इसे दान देता हूं इस प्रकार का विकल्प जिससे मन में नहीं, वह लोभी नहीं कहलाता है।

तुष्टि गुण

यथा चन्द्रोदये जाते, वृद्धिं याति पयोनिधिः।
सतां हृदय तोषब्धि र्मुनि चन्द्रोदये तथा।।32।।

अर्थ- जैस चन्द्रमा के उदय होने पर समुद्र वृद्धि को प्राप्त होता है उसी प्रकार मुनि रूपी चन्द्रमा का उदय होने पर सज्जनों का हृदय रूपी समुद्र वृद्धि को प्राप्त होता है।

दया गुण

कार्यं प्रति प्रयातीति, कीटकादीन् विलोकयन्।
गृहमध्येप्रयत्नेन, स तदा स्याद् दयापरः।।33।।

अर्थ- जब घर में किसी कार्य के लिए चीटी को देखकर चलता है तब वह श्रावक दयावान् कहलाता है।

शक्ति गुण

तुर्यांशो षडांशो वा दशांशो बा निजार्थतः।
दीयते या तु सा शक्ति, र्वय्र्यामध्याकनीयसी।।34।।

अर्थ- अपने धन का चतुर्थ भाग, छटवां भाग अथवा दसवां भाग दान करने वाला दाता क्रमशः उत्तम, मध्यम और जघन्य शक्ति का धारक कहलाता है।

विज्ञान गुण

सात्म्यं सुव्रतरक्षणं पदमलं, सेव्यं त्वसेव्योज्झिंतं,
यद्दुर्दोषहरं यथामयहरं, यन्मानसंस्थामाकृत्।।35।। यन्निद्रादिहरं यदव्ययमनु स्वाध्याय संपत्करं, पूतं यद् व्रति हस्त दत्तमशनं, विज्ञाय दद्याद् यतेः।।36।।

अर्थ- सात्विक व्रतों की रक्षा के योग्य, अभक्ष्य पदार्थों से रहित, निर्दोष, रोग को हरने वाला, शरीर की स्थिति का कारण, निद्रा आदि को हरने वाला, निरंतर स्वाध्याय रूपी सम्पत्ति को करने वाला, पवित्र व्रती के हाथ का दिया हुआ जान कर आहार मुनि को देना चाहिए।

क्षमा गुण

पुत्र दरादिभिर्दोषे, कृत्तेऽपि च न कुप्यति।
यः पुनदा्रनकालेऽसौ क्षमावानिति भण्यते।।37।।

अर्थ- जो आहार दान के काल में पुत्र स्त्री आदि के दोष कर देने पर भी क्रोध नहीं करता वह क्षमावान् दाता कहलाता है।

दूसरे के हाथ में दान दिलाने का फल
आत्म वित पित्यागात्, परै र्धर्म विधापने।
निः सन्देहमवाप्नोति, परभोगाय तत्फलम्।।38।।

अर्थ- अपने धर का दूसरे के हाथ से दान कराने पर निःसन्देह धन प्राप्त होता है, किंतु उसका भोग दूसरे लोग करते हैं।

स्वयं के हाथ से दान देने का फल
भोज्यं भोजनशक्तिश्च, रतिशक्तिर्वरस्त्रियः।
विभवो दानशक्तिश्च, स्वयं धर्मकृत्तेः फलम्।।39।।

अर्थ- भोग्य सामग्री, भोजन, भोग भोगने की शक्ति, श्रेष्ठ स्त्रियां, वैभव दान देने की शक्ति इत्यादि सामग्री स्वयं धर्म करने के फल स्वरूप प्राप्त होते हैं।

दान का लक्षण

यद् दाति निकृन्तन्ति व्यसनानि तद्दानं निदानविकलं दानमरीनपि मित्राणि करोति। कष्टं विदूरयति, अनिष्टं वारयते, मार्तण्ड मूर्तिरिव समस्तं संतमसं निवारयति। पानीयपूर्णा सरसीव सरोज खण्डान् उक्तगुणान् प्रोद्भासयति। अनुग्रहार्थम् स्वस्यातिसर्गोदानम्।

अर्थ- जो दुःखों को नष्ट कर देता है उसे दान कहते हैं। निदान रहित दान शत्रुओं को भी मित्र बना देता है, कष्टों को दूर कर देता है, अनिष्अ का निराकरण करता है, सूर्य बिम्ब के समान समस्त अन्धकार को दूर कर देता है, स्व और पर के उपकार के लिए मन धन का त्याग करना दान कहलाता है।

स्व पर उपकार का लक्षण

रत्नत्रयोच्छ्रयो भोक्तुर्दातुः, पुण्योच्चयः फलं।
मुक्त्यन्तचित्राभ्युदय-प्रदत्वं तद्विशिष्टता।।40।।

आत्मनः श्रेयसे ऽन्येषां, रत्नत्रयसमृद्धये।
स्वपरानुहायेत्थं यत् स्यात् तद्दानमिष्यते।।41।।

अर्थ- अहार लेने वाले साधु के रत्नत्रय की वृद्धि होती है और दाता के पुण्य की वृद्धि होती है तथा अनेक प्रकार के सांसारिक वैभव की प्राप्ति के बाद अन्त में मुक्ति की प्राप्ति होती है अतः जिससे स्व ओर पर का उपकार हो उसे दान कहते है।

यथा कृषीवला र्वृष्टि र्जाता इति संश्रुतेः देहसौख्यं परित्यज्य क्षेत्रं गत्वा बींज वपन्ति तथा दातारः पात्रागमनं संश्रुत्य ज्ञानवृष्टिकारिणे पात्राय इष्टान्यन्नानि सादरं वितरन्ति।

अर्थ- जैसे - किसान वर्षा हुई है ऐसा सुनकर शारीरिक सुख को छोड़कर खेत में जाकर बीज बोता है, उसी प्रकार दाता पात्र के आगमन को सुनकर ज्ञान की वर्षा करने वाले पात्र के लिए तप की वृद्धि के अनुकूल भक्ति पूर्वक आहार देता है।

गौरवं प्राप्यते दानान्, न तु वित्तस्य स्ंचयात्।
स्थितिरूच्चैः पयोदानां, पयोधिनामधः स्थितिः।।42।।

अर्थ- दान देने से गौरव प्राप्त होता है किंतु धन संचय करने से नहीं, जैसे मेघ पानी का दान करता है इसलिए ऊपर रहता है समुद्र पानी ग्रहण करता है इसलिए नीचे रहता है।

दानं लोकान् वशीकर्तुम्, प्रथमं कारणं मतम्।
दानं गुरूत्वहेतुं च, कुलजातिप्रकाशकम्।।43।।

अर्थ- दान लोगों को वश में करने का पहला कारण माना गया है तथा कुल और जाति को प्रकाशित करने वाला होने से गुरूत्व का भी हेतु है।

प्रशंसनीय दान का लक्षण

यथाकालं यथादेशं, यथापात्रं यथोचितं।
दानेनेत्थं बुधाः कुर्युः, शासनस्य प्रभावनाम्।।44।।

अर्थ- योग्य देश, काल और पात्र को देखकर दान देकर ज्ञानी जन जिन शासन की प्रभावना करें।

तस्यैव सफलं जन्म, तस्यैव सफला क्रिया।
सफलं गृहधान्यादि, येन दानं कृतं शुभम्।।45।।

अर्थ- उसी का जन्म सफल है, उसी की क्रिया सफल है उसी के घन धान्य आदि सफल है जिसने शुभ दान दिया है।

मुनिभ्यः शाकपिण्डोऽपि, भक्त्या काले प्रकल्पितः।
भवेदगण्यपुण्यार्थं, भक्तिश्चिन्तामणि र्यतः।।46।।

अर्थ- योग्य काल में मुनि के लिए सब्जी का दान करने वाला भी अगणनीय पुण्य का भागीदार होता है। जैसे - भक्ति चिन्तमणि की तरह फल दायी होती है।

दान के योग्य सात क्षेत्र

जिनबिम्बं जिनागारं, जिनयात्रा प्रतिष्ठितम्।
दानं पूजा च सिद्धान्त - लेखनं क्षेत्र सप्तकम्।।47।।

अर्थ- जिन प्रतिमा, जिन मन्दिर, जिन यात्रा, प्रतिष्ठा, चतुर्विध संघ को चार प्रकार का दान, पूजा, सिद्धान्त के लेखन इस सात क्षेत्रों में दान देना चाहिए।

दान का फल - दानियों की इस लोक में कीर्ति, प्रताप, भाग्य, वृद्धि इत्यादि फल की प्राप्ति परभव में भोग भूमि के भोगों को भोगकर स्वर्ग को प्राप्त होता है। किंतु जो सम्यग्दृष्टि सत्पात्र को दना देता है वह सोलहवें स्वर्ग की लक्ष्मी को प्राप्त कर तीर्थंकर चक्रवर्ती के वचनातीत सुखों को प्राप्त होता है। सम्यग्दर्शन से रहित होने पर भी जो एक बार भी सत्पात्र को दान देता है, वह दान के प्रभाव से भोग भूमि के सुखों को प्राप्त कर स्वर्ग जाता है, इसलिए सद्गृहस्थ को हमेशा शक्ति के अनुसार दान देना चाहिए। उत्कृष्ट पात्र दानसे उत्कृष्ट भोग भूमि मध्यम मात्र दान से माध्यम भोग भूमि जघन्य पात्र दान से जघन्य भोग भूमि प्राप्त होती है। सुपात्र में लगाया गया धन परलोक में अनन्त गुना फलताहै। कुपात्र दान से कुभोग भूमि एवं अपात्रदान से दुर्गति की प्राप्ति होती है।

न्यग्रोधस्य यथा बींज, स्तोकं सुक्षेत्र भुमिगं।
बहु विस्तीर्णता याति, तद्वद् दानं सुपात्रगम्।।48

अर्थ- जैसे - अच्छी भूमि में गया हुआ वट का बीज बहुत विस्तार को प्राप्त होताहै उसी प्रकार सुपात्र को दिया हुआ थोड़ा भी दान बहुत फलता है।

नवधा भक्ति

प्रतिगृहोच्चसंस्थानं, पादक्षालनमर्चनं।
प्रणामयोग शुद्धिस्तु, चैषणाशुद्धिरेव हि।।49।।

अर्थ-

1 पड़गाहन

2 उच्चस्थान

3पाद प्रक्षालन

4पूजा

5नमस्कार

6मनः शुद्धि

7वचन शुद्धि

8काय शुद्धि

9आहार शुद्धि ये नवधा भक्ति मानी गयी है।

याचितं शतगुणं पुण्यं, लक्षपुण्यमयाचितं।
गुप्तकं कोटि पुण्याय, सेवादानं च निष्फलम्।।50।।

अर्थ- याचना करने परदेने से सौ गुना पुण्य होता है। बिना मांगे देने पर लाख गुना पुण्य होता है। गुप्त दान देने से करोड़ गुना पुण्य होता है, किंतु सेवा के बदले में देना निष्फल है।

मादुपिदुपुत्तमित्तं, कलत्तधणधण्णवत्थुवाहणविहवं।
संसारसारसोक्खं, सव्वं जाणउ सुपत्तदाणफलं।।51।।

अर्थ- माता, पिता, पुत्र, मित्र, स्त्री, धन, धान्य, वस्तुएं, वाहन, वैभव एवं समस्त संसार के श्रेंष्ठ सुख सुपात्र दान के फल जानना चाहिए।

उत्तमपत्तविसेसे, उत्तमभत्तीए उत्तम दाणं।
एयदिणे वि य दिण्णं, इंदसुहं उत्तमं देदि।।52।।

अर्थ- उत्तम पात्र विशेष को उत्तम भक्ति से एक बार भी दिया गया दान इन्द्र आदि के उत्तम सुख को देता है।

दान के भेद

पात्रदानं कृपादानं, समदानं ततः परम्।
परमान्वयदानं चेत्युक्तं, दानं चतुर्विधम्।।53।।

अर्थ-

1. पात्र दान

2. दया से दरि आदि को दान

3. अपनी बाराबरी वालो को दान

4. कुटुम्बी बान्धव आदि को दान इस प्रकार दान के चार भेद है।

1. पात्र लक्षण

पात्रं तत् पात्रवज्ज्ञेयं, विशुद्धगुणधारणात्।
यानपात्रमिवाभीष्टे, देशे सम्प्रापकं च यत्।।54।।

अर्थ- वह पात्र विशुद्ध गुणों का आधार होने से पात्र की तरह जानना चाहिए, जैसे इष्ट स्थान पर पहुंचाने वाला जलयान होता है।

पात्रदाने फलं मुख्यं, मोक्षः सस्यं कृषेरिव।
पलालमिव भोगास्तु, फलं स्यादानुषडिंकम्।।55।।

अर्थ- वह पात्र विशुद्ध गुणों का आधार होने से पात्र की तरह जानना चाहिए, जैसे इष्ट स्थान पर पहुंचाने वाला जलयान होता है।

2. दया दान

दीन, हीन, अनाथ, दुखित, रोग पीडि़त गरीबों को जो दान दिया जाता है, वह दया दान कहलाता है।

3. समदान अन्वय दान

पुण्यादि हेतवेऽन्योऽन्यं, गृहस्थैर्यद् वितीर्यते,
ताम्बूलाहारवस्त्रादि, समदानमभाणि तत्।।56।।
मोक्षायोत्तिष्ठमानो यत् स्व पुत्राय स्वसम्पदं,
दत्ते कुटुम्बपोषणायान्वयदानं तदुच्यते।।57।।

अर्थ- पुण्य आदि के लिए गृहस्थों के द्वारा परस्पर जो भोजन वस्त्र आदि दिये जाते हैं वह सम दान कहलाता है और मोक्ष प्राप्ति का इच्छुक मनुष्य पुत्र के लिए तथा कुटुम्ब के पोषण के लिए जो अपनी सम्पत्ति देता है, वह अन्वय दत्ति कहलाती है।

देने योग्य अन्न का लक्षण

प्रासुकं मधुरं स्निग्धं, भक्तभक्षादिभोजनं,
भावेन मुनये दत्तं, न पुण्यं स्यादतः परम्।।58।।

रसाढ्यं प्रासुकं हृद्यं, तपो वृद्धिविधायकं,
वहृर्थव्यंजनोपेतं, देयं भक्तं च दुर्लभभ्।।59।।

अर्थ- प्रासुक, मधुर, स्निग्ध, अभक्ष्य रहित रस युक्त, मनोहर तप की वृद्धि करने वाला अनेक प्रकार के दुर्लभ व्यंजनों से युक्त आहार मुनि को देने पर श्रेष्ठ पुण्य की प्रप्ति होती है। पवित्र अन्न दाता और पात्र दोनों को पवित्र करता है, दाता के शुद्ध होने पर अन्न और पात्र होते हैं तथा पात्र शुद्ध होता है तो दाता और अन्न को शुद्ध करता है।

शुद्ध अन्न का लक्षण

मद्य, मांस, मधु से रहित हो जल, तेल, घी, चमड़े से अस्पृष्ट हो रात्रि में न बनाया हो, चाण्डाल, बिल्ली, कुत्ता आदि के द्वारा छुआ न हो जिसका स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण न बदला हो, रोग को करने वाला न हो, घुना न हो, उच्छिष्ट नीचे मनुष्यों के योग्य न हो, देवता के लिए न बनाया हो, होटल का न हो, ग्रामन्तर से या मंत्र से न लाया गया हो, वह शुद्ध कहलाता है।

वस्त्र दान का फल

आर्योभ्यः आर्यिकाभ्यश्च, वस्त्र दानेन धीधनाः।
अरजोम्बर धर्यस्ति, शुक्लध्यानी भवान्तरे।।60।।

अर्थ- आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक, ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणी को वस्त्र दान करने से बुद्धिमान दाता भवान्तर में धवल वस्त्र का धारी तथा क्रमशः शुक्लध्यानी होता है।

कमण्डलु दान का फल

दानात कमण्डलोः पात्रे, निर्मलांग शुचिव्रतः।
मयूर वर्ह दानेन, सुपुत्रश्चिर जीवितः।।61।।

अर्थ- पात्र के लिए कमण्डलु दान करने से दाता निर्मल शरीर का धारक पवित्र व्रती होता है तथा मयूर पिच्छिका दान करने से दान करने से दाता दीर्घायु सुपुत्रवान् होता है।

कुदान का लक्षण

कनकाश्वतिला नागो, रथो दासी मही गृहं।
कन्या च कपिला धेनु-र्महादानानि वे दश।।62।।

अर्थ- सोना, चांदी, घोड़ा, तिल, हाथी, रथ, दासी, पृथ्वी, घर, कन्या, गाय से दस कुदान कहलाते हैं। कुदान का फल स्व पर के दुःख उत्पत्ति हिंसा के तथा नरक के कारण है अज्ञानी मिथ्या दृष्टियों द्वारा चलायो गये है ये संसार भ्रमण के कारण तथा पाप बंध के कारण है कुभोग भूमि के कारण और पाषाण की नौका के समान है। सम्यग्दृष्टि जीवों को प्राणों का अन्त होने पर भी नहीं देना चाहिए।

व्यर्थ दान का लक्षण

वृथा वृष्टिः समुद्रेषु, वृथा तृप्तेषु भोजनं।
वृथा दानं धनाढ्येषु, वृथा दीपो दिवाऽपि च।।63।।

अर्थ- जैसे समुद्र में वर्षा होना व्यर्थ है, तृप्त को भोजन कराना व्यर्थ है और दिन में दीपक जलाना व्यर्थ है वैसे ही धनाढ्य को दान देना व्यर्थ है।

चार प्रकार का दान

अभयाहारभैषज्य - श्रुत - भेदाच्चतुर्विधम्।
दानं मनीषिभिः प्रोक्तं, भक्ति शक्ति समाश्रयम्।।64।

अर्थ-

1.औशधि

2.शास्त्र

3.अभय

4. आहार ये चार प्रकार के दान ज्ञानियों को शक्ति पूर्वक देना चाहिए।

चारों दान का फल

सैरूप्यमभयादाहु राहाराद् भेगवान् भवेत्।
आरोग्यमौषधाज्ज्ञेयं, श्रुतात् स्याच्छुत केवली।।65।।

अर्थ- अभय दानसे निर्भयता, आहार दान से भोगों की प्रप्ति, औषधि दान से निरोगता की प्रप्ति, ज्ञान दान से केवलज्ञान की प्रप्ति होती है।

आहार दान

कायस्थित्र्थमाहारः कायो ज्ञानार्थमिष्यते।
ज्ञानं कर्म विनाशाय, तन्नाशे परमं पदम्।।66।।

अर्थ- साधु शरीर की स्थिति के लिए आहार लेते है, शरीर स्वस्थ रहने पर ज्ञान की प्रप्ति होती है। ज्ञान से कर्मो का नाश होता है, कर्मों का नाश होने पर मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है।

शमस्तपो दया धर्मः संयमों नियमेां यमः।
सर्वे तेन वितीर्यनते, येनाहारः प्रदीयते।।67।।

अर्थ- जिसने आहार दान दिया है, उसने समता, तप, दया, धर्म, संयम, नियम यम सब कुछ दिया है क्योंकि आहार के बिना इस सबका पालन नहीं हो सकता है।

औषधि दान

व्याधितश्चांगनाशः स्यादगनाशे कुतस्तपः।
जिनेन्द्र तपसा शून्यः कथं प्राणी लभेच्छिवम्।।68।।
तस्माद् भव्यैः प्रयत्नेन, महाधर्मानुरागतः।
धार्मिकादिकेभयश्च, देयं दानं सदौषधम्।।69।।

अर्थ- व्याधि से शरीर का नाश होता है, शरीर का नाश होने पर तप कहां से हो सकता है? और भगवान् से द्वारा बताये हुए तप के बिना प्राणी को मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकता है? इसलिए भव्य जीवों को प्रयत्न पूर्वक धर्मानुराग से धर्मात्माओं के लिए हमेशा औषधि देना चाहिए।

ज्ञान दान

लिखित्वा लेखयित्वा वा साधुभ्यो दीयते श्रुतं।
व्याख्यायतेऽथवा स्वेन, शास्त्रदानं तदुच्यते।।71।।

अर्थ- जो भव्य आत्मा शास्त्र लिखकर अथवा लिखवाकर साधुओं को देता है या शास्त्र की स्वयं व्याख्या करता है, वह शास्त्र दान कहलाता है।

शास्त्रदानफलेनात्मा, कलासु सकलास्वपि।
परिज्ञाता भवेत्, केवलज्ञान भाजनम्।।72।।

अर्थ- ज्ञान दान के फल से आत्मा समस्त कलाओं का ज्ञाता होता है और अंत में केवलज्ञान को प्राप्त होता है।

अभय दान

तदस्ति न सुखं लोके, न भूतो न भविष्यति।
यन्न संपद्यते संपद्यते सद्यो, जन्तुरभयदानतः।।73।।

अर्थ- लोक में ऐस कोई भी सुख नहीं है न भूत में था न भविष्य में होगा जो सुख प्राणी को अभय दान के प्रभाव से प्राप्त नहीं होता हो अर्थात अीाय दान के प्रभाव से प्राणियों को संसार के सभी सुख सहज में ही प्राप्त हो जाते हैं।

धर्मार्थकाममोक्षाणां, जीवितं मूलमिष्यते।
तद्रक्षता न किं दतं, हरता किं हृतम्।।74।।

अर्थ- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार पुरूषार्थों का मूल जीवन माना जाता है। जीवन दान देने वाले ने क्या नहीं दिया, अर्थात् सब कुछ दिया और प्राण हरण करने वाले ने क्या नहीं हरा अर्थात् सब कुछ हरण लिया।

त्याग के लिए धन का संचय निन्द्यनीय
त्यागाय श्रेयसे वित, मवित्तः संचिनाति यः।
स्वशरीरं स पकेंनद्व स्नास्यामीति विलिम्पति।।75।।

अर्थ- जो निर्धन मनुष्य दान करने के लिए तथा अपने सुख कल्याण के लिए धन सोने-चांदी आदि को एकत्र करता है। वह मनुष्य मैं स्नान करूंगा, ऐसे विचार से अपने शरीर को कीचड़ से लीपता है अर्थात् पहले पाप कमाकर बाद में पुण्य कमाने की इच्छा करना व्यर्थ है क्योंकि पुण्य बंध तो पर पदार्थ से राग घटाने से होता है।

कांचनगिरिसम कांचन दानसमर्जित सुपुण्यमानं हि।
एक प्राणि सुरक्षा जनित सुकृतमानतो हीनम्।।76।।

अर्थ- परमार्थ से विचार किय जाय तो मेरू पर्वत के बाराबर सुवर्ण दान से उत्पन्न पुण्य का प्रमाण, एक प्राणी की सुरक्षा से उत्पन्न पुण्य के प्रमाण से हीन है अर्थात स्वर्ण दान की अपेक्षा एक प्राणी की रक्षा करने में ज्यादा पुण्य बंध होता है।

मेघान्योक्ति

हंहो गुणधर जलधर ह्यनन्यशरणं विहाय सारगम्।
वर्षसि भूधरशिखरे पयोधि पूरे च किं नित्यम्।।77।।
किमिति कठोरं जर्गसि वर्षसि सलिलस्य शीकरं वै।
मा मा वर्षाम्भोधर त्यजतु कठोरं तु गर्जनं सद्यः।।78।।

अर्थ- कुछ दाता दान देते समय योग्य व्यक्ति का विचार न कर आवश्ययकता से रहित व्यक्ति के लिए दाने देते हैं तथा कितने ही लोग कुवचन सुनाने के बाद भी दान नहीं देते हैं। उन्हें संबोधित करने के लिए अन्योक्ति के रूप में मेघ से कहा जा रहा है कि हे गुणों को धारण करने वाले मेघ! तु,म जिसका अन्य सहारा नहीं है ऐसे चातक को छोडकर पर्वत के शिखर पर और समुद्र केपूरे में निरन्तर क्यों बरसते हो? यहां बसरने में क्या उपयोगिता है और हे मेघ! तुम कठोर गर्जना क्यों करते हो? पानी का एक कण भी बरसते नहीं केवल कठोर गर्जना क्यों करते हो? अच्छा हो कि बरसें नहीं किंतु कठोर गर्जना तो शीघ्र छोड़ दो।

समुद्रान्योक्ति

तृष्णादानवपीडित विपद्यमानं नरं पुरो दृष्ट्वा।
जलधे चपलतरंगै विनर्तमनो न लज्जसे कस्मात्।।79।।

अर्थ- कितने ही लोग अपने आगे धनाभाव से नष्ट होते हुए मनुष्य को देखकर भी तृष्णा के वशीभूत हो उसे कुछ देते नहीं है किंतु अपनी धनिकता का अहंकार करते हैं उन्हें संबोधित करते हुए समुद्र की अन्योक्ति से कहते हैं - हे समुद्र! अपने आगे प्यास रूपी दानव के द्वारा पीडित होकर मरते हुये मनुष्य को देखकर अपनी चंचल लहरों से नाचते हुए लज्जित क्यों नहीं होते हो?

चन्दन पादपान्योक्ति

हंहो मलयज! मूले सदा निषण्णान् भुजंगमान्वारय।
येन तव सुरभिसारं भोक्तुं शक्नोतु जगदेतत्।।80।।

अर्थ- कितने ही दाताओं के पास दुष्ट मनुष्य रहते हैं, जिनके कारण सज्जन पुरूष उनके समीप नहीं आ पाते, ऐसे लोगों को संबोधित करते हुए चन्दन वृक्ष की अन्येक्ति से कहते हैं - हे चन्दन वृक्ष! तुम अपने मूल में बैठे हुए सांपों को दूर करो जिससे यह जगत् तुम्हारी श्रेष्ठ सुगन्ध का उपभोग करने के लिए समर्थ हो सके।

रोहणगिर्यन्योक्ति

मा कुरू मा कुरू शोकं रत्नसमूहव्ययेन हे रोहण!।
इगिति पयोधर रावो दास्यति रत्नानि ते बहुशः।।81।।

अर्थ- कितने ही लोग दान देकर यह खेद करते हैं कि हमारे पास धन की कमी हो गई। उन्हें रोहण गिरि की अन्योक्ति से संबोधित करते हैं। संस्कृत साहित्य में एक ऐसे रोहण गिरि का वर्णन आता है कि जसमें मेघ की गर्जना से नये नये रत्न उत्पन्न होते हैं - हे रोहणगिरि! रत्न समूह के व्यय होने से शोक मत करो, मत करो, क्योंकि मेघ की गर्जना तुम्हें शीघ्र ही बहुत रत्न देगी।

खर्जूर वृक्षान्योक्ति

रे खर्जूरानोकह! किमे वमुत्तुगमानमुद्वहसि।
छायाति ते न भोग्या पान्थानां किं फलैरेभिः।।82।।

अर्थ- कितने ही लोग सम्पत्ति शाली होने पर भी कभी किसी का उपकार नहीं करते हैं उन्हें संबोधित करने के लिए खर्जूर वृक्ष की अन्योक्ति से कहते हैं- हे खर्जूर के वृक्ष! तुम इस प्रकार बड़े होने का अहंकार क्यों करते हो? क्योंकि तेरी छाया भी पथिक जनों के उपयोग के योग्य नहीं है फिर ऊंचाई पर लगे हुए इन फलों से क्या होगा? अर्थात् तेरी न छाया किसी के काम आती है और न फल काम आते हैं।

शाल्यन्योक्ति

अत्यल्पता निमित्ताच्छाले शाखिन् नु सिद्यसे कस्मात्
जीवित जगज्जनोच्चत्वमेव धन्यः समस्त भू भागे।।83।।

अर्थ- कितने ही लोग शक्ति वाले न होने से सदा खिन्न रहते हैं कि हमारे पास दान के लिए पुष्कन धन नहीं है। उन्हें धान्य के पौधे की अन्योक्ति से संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे धान्य के पौधे! मेेरे पास अत्यन्त अल्प साधन है ऐसा विचार कर तू खिन्न क्यों हो रहा है? तू तो अत्यन्त छोटा होकर भी जगत् के जीवों को जीवित रख हा है और इस कारण समस्त पृथिवी तल पर एक तू ही धन्य है।

त्याग और दान में अंतर

त्याग धर्म है, दान पुण्य है, त्याग अनुपयोगी व उपयोगी दोनों वस्तुओं का किया जाता है, दान उपयोगी वस्तु का दिया जाता है। त्याग में स्वोपकार होता है, दान में स्वपरोपकार होता है।

राग द्वेष का त्याग किया जाता है। ज्ञान और अभय का दान दिया जाता है, औषधि और आहार का त्याग भी किया जाता है और दान भी दिया जाता है।

कन्जूस के समान दाता नहीं

कृपणेन समो दाता न भूतो न भविष्यति।
अस्पृशन्नेव वित्तानि यः परेभ्यः प्रयच्छति।।84।।

अर्थ- कंजूर के समान न दाता है, न हुआ है और न होगा जो कि धन को छुए बिना ही दूसरों को दे देता है।

भुक्तिमात्र प्रदाने तु का परीक्षा तपस्विनः।
ते सन्तः सन्त्वसन्तो वा गृही दानेन शुद्धयति।।85।।

अर्थ- आहार मात्र के लिये तपस्यिों की परीक्षा क्या करना? वे साधु हो अथवा न हो गृहस्थ तो दान से शुद्ध होता है।

त्याग धर्म - कथानक

1. माघ कवि बड़े दानी थे, उन्हें अपनी कविता के पारितोषिक में महाराज भोज से हजारों रूपये इनाम मिलते थे, किंतु वे सब रूपयो गरीबों को बांट देते थे और खुद भूखे रह जाते थे। एक दिन उनकी स्त्री ने कहा - बच्चे भी भूखे पड़े हैं कल तो कुछ बचा लाना। कवि माघ ने कहा- अवश्य। दूसरे दिन फिर अच्छा इनाम मिला वह भी सब गरीबों को बांट कर थोड़ा सा बचा कर रख लिया। किंतु द्वार पर जब कुछ गरीब लोग मिल गये तो बचे हुये रूपये उनको दे दिये। घर जाने पर स्त्री ने पूछा कुछ लाये। सुन कर चुप। तब पत्नि ने कहा-

लाखों इनाम पाते, दुखियों को जा खिलाते।
हम और आप भूखे, क्यों व्यर्थ दुख उठाते।।
इस बात को सुनकर माघ कवि ने उत्तर दिया।
अपनी क्षुधा तपन को संतोष जल बुझाये।
दीनों का करूण क्रन्दन हमसे न सुना जाये।।

परोपकार की भावना के बिना दान नहीं दिया जाता, इसलिए दान देने से स्व और पर दोनों का उपकार होता है।

2. एक राजा बड़ा धर्मात्मा था। वह रोजाना दरबार में अनेक याचकों को बड़े प्रेम से मान दान देता था। उसके पा जाकर जो कोई जितना धन मांगता था, उसे उसी समय दरबार से मुंह मांगा धन देकर विदा किया जाता था। राजा का यह दैनिक कार्य था। मंत्री ने सोचा कि यदि इसी प्रकार प्रतिदिन दान दिया जायेगा, तो एक दिन राज्य भी समाप्त हो जायेगा। अतः राज्य की रक्षा के लिए कोई यत्न करना चाहिए। अन्त में उसने एक दिन राजा से एकान्त में विनय पर्वूक कहा। ’’आपदर्थं धनं रक्षेत्’’ हे स्वामिन्! भाग्य का कोई भरोसा नहीं है, कि कब तक साथ दे। इसलिए आपति काल के लिए धन बचाकर रखना चाहिए। राजा ने मं.ी के वचन सुनकर उत्तर दिया ’’श्रीमतां कुत आपदा’’ भाग्यवान पुरूषों पर आपत्ति कहां से आ सकती है। मंत्री ने पुनः कहा ’’दैवात् क्वचित् समायाति’’ यदि दुर्भाग्य से आपत्ति आ भी जाय, तो क्या होगा? राजा ने उत्तर दिया - संचितं हि विनश्यति’ यदि आपत्ति आ भी जाय तो दान पुण्य में खर्च न करके इकट्ठा किया हुआ धन है, ह भी नष्ट हो जायेगा। धन की रक्षा करके मुझे और सम्पत्ति को कभी कोई सुरक्षित नहीं रख सकता। अब मंत्री की जबान बन्द थी क्योंकि -

येषां न विद्या तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणों न धर्मः।
ते मत्र्यलोके भुवि भार भूता, मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति।।

जिन मनुष्यों के पा न तो उत्तम विद्या है, न व्रत उपवास करने की शक्ति है, न सत्यकार्य में धन का सदुपयोग है, न ज्ञान है, न शील है, न विवके है और न धर्म है। वे मनुष्य इस पृथ्वी पर भार स्वरूप होकर मनुष्य के भेष में पशुओं के समान भटकने फिरते हैं।

3. वाराणसी नगरी में एक लोलुप नाम का हलवाई रहता था। वह बड़ा लालची और लोभी था। उस नगरी के राजा की आरे से एक मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा था। उस मंदिर के लिए जो ईंट मजदूरों द्वारा लाई जा रही थी। उनके भीतर सुवर्ण छिपा था। उस लालची लोलुप ने सुवर्ण के लोभ में मजदूरों को मिठाई खिलाकर बहुत सी ईंटें अपने घर डलवाना प्रारंीा किया। एक दिन विशेष कार्य से हलवाई को ग्रामान्तर जाना पड़ा। उसने अपने पुत्र को आदेश दिया था कि मजदूरों को कुछ भोजन देकर उसे अपने घर में ईंटें डलवा लेना। इसे मत भूलना। इस विषय में पुत्र ने पिता का आदेश पालन नहीं किया। घर वापिस आने पर उस हलवाई को यह ज्ञात हुआ कि उसके पुत्र ने उसका आदेश पालन नहीं किया। इससे उसे क्रोध आया उस मूर्ख ने लकड़ी और पत्थर से अपने पुत्र का सिर फोड डाला। और महान दुखी होकर उस दुष्ट हलवाई ने अपने भी पैर काट डाले इसकी खबर सर्वत्र फैल गई। राजा ने आदेश से यह हलवाई मार डाला गया। मरकर वन नेवला हुआ। इस नेवला के जीव को मुनि के आहार दान को देखकर अपार हर्ष हुआ। इस पात्र दान की अनुमोदान से इन नेवला ने उत्तम भोग भूमि की आयु का बन्ध किया था। आयु पूर्ण होने तक उसने भोगभूमि के अपूर्व सुख भोगे।

आशय यह है कि आहार दान तो पुण्य का हेतु है ही लेकिन आहारदान को अनुमोदना पूर्वक देखना और हर्षित होना भी पुण्य बंध का हेतु होता है।

4. महाराज युधिष्ठिर के पास किसी याचक ने आकर कुछ मांगा। युधिष्ठिर को वह मनुष्य अच्छा दिखाई पड़ा अतएवं युधिष्ठिर ने कल का वादा किया तो भीम ने सोचा कि बड़े भैया दान की भूमिका भूल गये हैं। कुछ कहूंगा तो बुरा लगेगा। लेकिन मुझे अपने बड़े भाई का हित करना है तो मैं क्या करूं? ऐसा विचार करके चैक में रखे नगाड़े को बजाने लगे धर्मराज ने पुंछवाया - यह नगाडा क्यों बज रहा है? भीम ने कहा - भैया ने काल को जीत लियाहै इसी खुशी में, क्योंकि उन्होंने काल को अपने अधीन कर ही लिय है। इस बात को सुनकर युधिष्ठिर लज्जित हुए। मैंने यह भूल की है, जो तुरंत दान नहीं दिया। कल का क्या भरोसा? अच्छे कार्यों को कल के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। ऐसा विचार कर याचक को दान देने के लिए बुलवाया, सेवक उसे ढूंढकर लाये और युधिष्ठिर ने सम्मान पूर्वक दान दिया। इससे यह शिक्षा लेना चाहिए कि दान देने में देर नहीं करना चहिए क्योंकि आज दान का भाव हुआ याने दानान्तराय कर्म का क्षयोपशम हुआ है। हो सकता कल दानान्तराय का उदय हो जाय, तो दान से वंचित हो सकते हैं।

5. बात अधिक पुरानी नहीं बल्कि कुछ दिन पूर्व की हैं एक सेठ ने पानी की तरह पैसा बहा कर, बड़े उत्साह से मन्दिर बनवाया और मंदिर संचालन हेतु सात नगर सेठों की एक प्रबन्ध समिति स्थापित की जिसमें सेठ जी भी थे। नगर भर में सेठ जी के त्याग पर वाह! वाह! हाने लगी। सब सेठजी की प्रशंसा करने लगे उनकी मर्यादा में चार चांद लग गये। वे चाहते भी यही थे। परंतु प्रबन्ध समिति के अगले चुनाव में सेठ जी को दूध में मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया गया। बेचारे सेठी की आकांक्षाओं पर पानी फिर गया।

कुछ दिनों बाद नगर में एक महात्माजी आये। सेठ जी ने अपना दुखड़ा सुनाया ’हे महात्मन! संसार कितना कृतघ्न है। मैंने लाखों रूपये खर्च किये किंतु मेरा कुछ अधिकार नहीं और जिसका मंदिर निर्माण में कुछ नहीं लगा, वे मालिक बन कर बैठे हैं। पहले तो कोई आगे भी नहीं होता था परंतु अब पचासों अधिकार जताने वाले पैदा हो गये हैं।

यह बात सुनकर महात्मा जी हंस पड़े। बोले - सेठ जी आपने दान के सही अर्थ को अब तक नहीं समझा है। वास्तव में किसी वस्तु को देकर बदले में कुछ प्राप्त करनेकी आशा दान नहीं, अपितु व्यापार है और जब आपने व्यापार किया तो लाभ हानि की संभावना तो रहेगी ही।

6. एक अत्यन्त दरिद्र एवं गरीब कुटुम्ब में एक बारह वर्षीय किशोर भयंकर बीमार हुआ दो सप्ताह से खटिया पकड़ रखी थी, सन्निपात ज्वर के तापमान से किशोर का रक्त जल रह था। एक ही बालक था, ऐसी हालत में किशोर कीमां परक्या बीतती होगी? यह तो भुक्तभोगी माता ही जान सकती है। एक दिन बालक की अवस्था चिन्ता जनक हो गयी। मां ने कहा आप यहां के प्रसिद्ध डॉ. गुप्ता केा ले आइये, वे क्या कहते है। उनका अभिप्राय भी जान लेना चाहिए। बालक के पिता को यह ज्ञान नहीं था कि बडे डॉ. की फीस पच्चीस रूपया है, और घर में 25 नये पैसे भी नहीं है। फिर भी वह गरीब अपना साहस कर बड़े डॉ. के पा गया और जाकर कहा डॉ. गुप्ता जी! मेरा इकलौता बेटा बीमार है, आप कष्ट करके एक नजर से देखने की कृपा करे। बालक की माँ का आग्रह है कि बड़े डॉ. को एक अवश्य ले आइये।

डॉ. गुप्ता ने आगन्तुक की ओर बड़ी गौर से देखा और नौकर से कुछ कहा-अन्नू बैग ले आओ। अन्नू ने बेग डॉ. के हवाले किया, डॉ. और आगन्तुक दोनों ही रिक्शा में बैठकर इच्छित मार्ग की ओर चल दिये। घर आकर देखा तो मामला कुछ और था। वह इकलौता लाड़ला बेटा चल बसा थ, और उसकी मां रूदन कर रही थी, जिसे देखकर पाषाण हृदय भी रो उठता था, बडा ही करूण दृश्य था। मृत बालक के पिता ने कहा- डॉ. साहब! 5 मिनट ईश्वर के लिए ठहरिये, वह पड़ोसी के पास गया और आग्रह पूर्वक कहा - डॉ. साहब! दरवाजे पर खड़े हैं। उनकी फीस 25/- रूपये देना है। आप मेरे लिए 25 रूपये उधार देदें। धीमे-2 मैं वापिस कर दूंगा। मैं गरीब हूं यह सत्य है पर मैं बेईमान नहीं हूं। पडोसी ने उदार हृदय पूर्वक 25/- रूपये दे दिये। वह 25/- लेकर आया और डॉ. को देते हुए कहा- लीजिए डॉ. सा. अपनी फीस।

डॉ फीस का नाम सुनकर आसमान की ओर देखने लगा और म नही मन सोचने लगा कि ऐसी भयंकर गरीबी में भी यह आदर्श, निष्ठा! और मानवता! मैं क्या उत्तर दूं। डॉ. कुछ क्षण तक सोच नहीं पाये थे अंत में उसने कहा- भाई मैं फीस नहीं लूंगा, तुम्हारे पु?त्र की आकस्मिक मृत्यु से मुझे बहुत दुख है। अगर 24 घंटे पहले मैं बालक को एक नजर भर देख लेता तो वह मरता नहीं ऐसा मैं मानता हूं पर होना अमिट है। इतना कहकर डॉ. उसी रिक्शे में बैठकर जिसमें किवह आया था वापिस चला गया। डॉ. ने जेब से निकाल कर रिक्शा वाले को रूपये दिए तो उसने लेने से इन्कार करते हुए कहा जब आप अपनी फीस के 25 रूपये छोड सकते हैं तब मैं 3/- रूपये भी नहीं ले सकता। मैं समझूंगका कि मैंने इस रोड से रानी रोड तक कोई सवारी नहीं ली थी। रिक्शा वाले से ऐसा मानवता जन्य उत्तर सुनकर डॉ. बहुत प्रसन्न हुआ और डॉ. ने कहा भाई! मेरे और आपके काम में बहुत अंतर है। तुम 3/- रूपये ले लो इसमें मुझे संतोष मिलेगा। तब रिक्शे वाले ने कहा- डॉ साहब यह सत्य है कि मेरे तुम्हारे काम में और आमदानी में जमीन आसमान का अंतर है फिर भी मनुष्यता हर व्यक्ति में आ सकती है चाहे वह छोटा हो या बड़ा गरीब हो या अमीर।

मृत बालक का पिता पड़ोसी के पच्चीस रूपये वापस करने गया जो उसने उधार लिये थे किंतु पडोसी ने यह कह कर रूपये नहीं लिय जब डॉ. ने रूपये नही लिये तब मैं क्यों लूं तुमने तो डॉ. की फीस चुकाने को लिये थे ना? इस घटना से मृत बालक का पिता अपने आप में ही परेशान था। आज भी हमें इने गिने लोगों में उदार मानवता के दर्शन हो जाते हैं, अन्यथा प्रलय न हो जाय।

उत्तम त्याग अमृत बिन्दु

1. दो व्यक्ति स्वर्ग में ऊंचा स्थान पाते हैं।

1. अधिक धन नहिं होने पर भी दान देने वाला।

2. शक्ति होने पर भी क्षमा करने वाला।

2. वेदना, रक्तक्षय, शस्त्रग्रहण, भय, संक्लेश से जीवों की रक्षा करना अभय दान कहलाता है।

3. पूर्व पत्तों का त्याग करने पर ही वृक्ष में नये पत्ते लगते हैं।

4. गाय दूध का त्याग कर ही स्वस्थता का अनुभव करती है।

5. संसारी प्राणी भी पर पदार्थों का त्याग कर ही सुखी होता है।

6. एक रूपये प्रतिदिन दान करने से वर्ष में 365 रूपये होते हैं।

7. प्राणी के पास सांसारिक वैभव बहुत हो सकता है पर सब कुछ तो मोक्ष में ही होता है।

8. कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति यश की फिक्र नहीं करता।

9. जगत का कोई पदार्थ मेरा नहीं है, मेरा स्वरूप ही मेरा है, सर्व पर पदार्थ मुझसे भिन्न है, ऐसी श्रद्धा ही उत्तम त्याग है।

10. लौकिक जन वस्तु के त्याग को त्याग कहते हैं, किंतु जैन धर्म में आत्मा के विकारी भावों के त्याग को त्याग धर्म कहा है।

11. दान देते समय दाता के परिणाम अत्यंत विशुद्ध होने चहिए। सहस्र मिथ्यादृष्टियों को भोजन कराने से जो पुण्य होता है, उतना पुण्य एक पाक्षिक श्रावक को भोजन कराने पर होता है। क्रमशः ब्रह्मचारी, क्षुल्लक, मुनि, आचार्य, ऋद्धिधारी, मुनिराज, तीर्थंकर को आहार देने में हजार गुणा अधिक-अधिक पुण्य बंध होता है।

12. भावों से रिश्ते कात्याग करना सच्चा त्याग कहलाता है।

13. धन की हमें रक्षा करना पड़ती है, ज्ञान हमारी रक्षा करता है।

14. पेट भरने से नहीं दान देने से राजा और रंक काभेद पता चलता है।

15. पुत्र मृत्यु की अपेक्षा आहार दान से रहित दिन धर्मात्मा को खटकता है।

16. वर्तमान में जो मिला है वह पूर्व दान का ही फल है।

17. आहार देते समय तीर्थंकर को भी हाथ नीचे करना पड़ते हैं।

18. त्यागी हुई वस्तु का ग्रहण करना वमन के ग्रहण करने के समान है।

अमृत दोहावली

पानी बाढ़े नाम में घर में बाढ़े दाम।
दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।।1।।

बिना मागे दे दूध बराबर मांगे दे सो पानी।
वह देना है खून बराबर जामें खेंचा तानी।।2।।

चोरी करे निहाई की सूई का देते दान।
ऊपर चढ़कर देखते कितनी दूर विमान।।3।।

कोई मरकर देता है कोई देकर मरता है।
जरा से फर्क से बनते ज्ञानी और अज्ञानी।
अगर धन की रक्षा है मंजूर तो धनवालो बनो दानी।
कुंए से गर नहं निकला तो सड जायेगा पानी।।4।।

मर जाऊ मांगू नहिं अपने तन के काज।
पर स्वरथ के कारणे मोहे न आवे लाज।।5।।

त्याग तरण-तारण सही भव सागर में नाव।
त्याग बने नहिं देव पै मनुज लहो यह दाव।।6।।

उत्तम त्याग करै जो कोई, भोग भूमि-सुर-शिवसुख होई।
चार प्रकार दान जो देय, वह नरभव को लाहो लेय।।7।।

जिसे न भाता अन्य का, पर को देना दान।
मांगेगी उस नीच की, अन्न-वस्त्र संतान।।8।।

एक अतिथि को पूंज, जोकर पर की बाट।
बनता वह सुर वर्ग का, सुप्रिय अतिथि सम्राट।।9।।
जोकरता है बांटकर, भोजन का उपभोग।
कभी न व्यापै भूख का, उसे भयंकर रोग।।10।।

।।ऊँ ही्र उत्तमत्यागधर्मांगया नमः।।
इति उत्तम त्याग धर्म