।। आओ अभिषेक करें ।।


सर्वात्म चक्रभ्यं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्वपरमंत्रं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व शूल रोगं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व शूल रोगं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व कुष्ठ रोगं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व क्षय रोगं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व क्रूर रोगं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व नर मारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व गजमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व अश्व मारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व गोमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व महिषमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व धान्यमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व वृक्षमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व गुल्ममारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व पत्रमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व पुष्पमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व फलमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व राष्ट्र मोरिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व देशमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व विषमारिं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व वेताल शाकिनी भयं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व वेदनीयं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व मोहनीय छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व कर्माष्टकं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
ऊँसुदर्शन-महाराज-चक्र-विक्रम-तेजो-बल शौर्य-वीर्यं-शांति कुरू कुरू।
सर्वजनान्दनं कुरू कुरू! सर्व-भव्यानन्दनं कुरू कुरू! सर्व गोकुलानन्दनं कुरू
कुरू! सर्व ग्राम नगर कर्वट मटंब पत्तन द्रोण मुख सवाहानन्दनं कुरू कुरू।
सर्व लोकानन्दनं कुरू कुरू। सर्व देशा नन्दनं कुरू कुरू। सर्व यजमानानन्दनं
कुरू कुरू। सर्वं दुखं हन हन, दह दह, पंच पंच, कुट कुट, शीघ्रं शीघ्रं

यत्सुखं त्रिषु व्याधि-व्र्यसन-वर्जित।
अभयं क्षेममारोग्यं स्वस्तिरस्तु विधीयते।।

शिवमस्तु कुल-गोत्रं! धन-धान्यं सदास्तु! चन्द्रप्रभु वासुपूज्य
मल्लिवर्द्धमान-पुष्पदन्त-शीतल-मुनिसुव्रत-नेमिनाथ-पाश्र्वनाथ इत्येभ्या ेनमः।

ऊँ नमों अर्हते भगवते श्रीमते प्रक्षीणाशेष-कल्मषाम दिव्यते जोमूर्तये श्री शांतिनाथाय शांति-कराय सर्व पाप प्रणाशनाय, सर्व-विघ्नविनाशनाय, सर्व-रोगो मृत्युविनाशनाय, सर्व-परकृत-क्षुद्रीपद्रव विनाशनाय, सर्व क्षामर-डामर-विनाशय, ऊँ हृां हृीं हृूं हृौं हृः अ सि आ उ सा अर्हं नमः सर्व-शांति कुरू कुरू वषट् स्वाहा।

ऊँ सिद्धों के लिए नमस्कार! श्री वीतराग देव के लिए नमस्कार ऊँ समवसरण की बारह सभाओं से घिरे हुए, पवित्र शुक्ल ध्यान से संयुक्त सर्वज्ञ, स्वयंभू, सिद्ध, बुद्ध परमात्मा, परमसुखी, तीनों लोकों में व्याप्त, अनांदिकाल से जन्ममरण को दूर करने वाले अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख व अनन्त वीर्य से सुशाोभित सिद्ध, बुद्ध त्रैलोक्य में व्याप्त, सत्य ज्ञानी सत्य आत्मां वाले जो धरणेन्द्र के फणरूपी मण्डल से सुशोभित हैं, ऐसे श्री पाश्र्वनाथ अरिहंत भगवान ऋषि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका आदि चतुर्विध संघ के उपसर्गों को दूर करने के लिए घातिया व अघातिया कर्मों का नाश करने के लिए भी पाश्र्वनाथ अरिहन्त भगवान को हमारा नमस्कार हो। सभी अशुभ वायु का अभाव व नाश होवे। मृत्यु का अभाव व नाश होवे। अत्यधिक वासनाओं का अभाव व नाश होवे। अग्नि से उत्पन्न भय दूर हो जावें। सभी शत्रु (बाह्म व आंतरिक) दूर होवें सभी उपसर्ग दूर होवें। सभी बाधाएं दूर होवें। सभी प्रकार के भय (सातों भय) दूर होवें, राजा के सभी भय दूर होवें। चोरी से सम्बंधित सभी भय दूर होवें दुष्ट जीवों द्वारा उत्पन्न सभी दुःख भय दूर होवें। सभी पशुओं के दुःख भय दूर होवें। हमारे निज के सभी भय दूर होवें। सभी पर मन्त्रों का प्रभाव दूर होवें। सभी क्षय (टी.बी.) रोग दूर होवें। सभी प्रकार के कुष्ठ रोग दूर होवें। सभी प्रकार के भयंकर रोग दूर होवें। मनुष्यों में सभी प्रकार की महामारी दूर होवें। हाथियों की सभी बीमारियों दूर होवें। घोड़ों की सभी बीमारियां दूर होेवें। गायों के सभी रोग दूर होवें। भैंसों की सभी बीमारियां दूर होवें। अन्न की सभी बीमारियां दूर होवें। वृक्षों की सभी बीमारियां दूर होवें। लताओं की सभी बीमारियां दूर होवें। वृक्षों की सभी बीमारियां दूर होवें। पत्तों के सभी रोग दूर होवें। सभी पुष्पों के सभी रोग दूर होवें। फलों के सभी रोग दूर होवें। सभी राष्ट्रों के सभी रोग दूर होवें। सभी प्रकार के विषों से हाने वाले भय रोग दूर होवें। सभीप्रकार की भूत, प्रेत, शाकिनी, डाकिनी द्वारा हाने वाली पीड़ाएं व कष्ट दूर होवें। सभी जीवों के वेदनीय कर्म दूर होंगे। सभी जीवों का मोहनीय कर्म दूर होवें। सभी जीवों के अष्ट कर्म नष्ट होवें। ऊँ सुदर्शन महाराज चक्र, विक्रम, तेज, बल, शौर्य, शक्ति व शांति को करें। सभी जीवों को आनन्द का लाभ होवें। सभी देश सुखी व आनन्दित होवें। सभी भव्य जीव सुखी रहें। सभी गायों (गऊआं) को सुखी करो। सभी ग्राम, नगर, क्षेत्र, कस्बे, बाजार, मुहल्ले आदि के निवासी आनन्दित रहें। सभी दुःखों की हानि हो। सभी पाप शीघ्र ही जलकर नष्ट हो जावें।

प्रतिमा मार्जन करें

नत्वा मुहर्निज कौर रम्रतो पभेयैः, स्वच्छै जिनेन्द्र तब चन्द कराव दोते।।
शुद्धांशुकेन विमलेन नितांत रम्ये, देहजे स्थिततान जल कणान परिभर्जयामि।।
ऊँ हृं अमलांशुकेन जिन बिम्बमार्जनं करोमि।

गंधोदक

इस तरह शांति धारा सम्पन्न हुई। अब यंत्र या परिमार्जन कर यथास्थान विराजमान करें एवं गन्धोदक को एक बड़े कटोरे में एकत्र करके एवं छोटें कटोरे में शुद्ध प्रासुक गर्म जल रखें जिससे गन्धोदक लेने से पूर्व हाथ धाोए जा सकें। दोनों कटोरों में एक छोटी चम्मच अवश्य डाले दें, जिससे गन्धोदक में कोई हाथ न डाल सके। गन्धोदक चम्मच से ही लेना चाहिए क्योंकि हाथों की अशुद्धि या कोई चर्मरोग या संक्रमक रोग यदि होता है तो वे रोगाणु गन्धोदक में चले जाते हैं जो हानिकारक होते हैं।

विवेकपूर्वक गंधोदक चम्मच से निम्न मंत्र पढ़कर लेना चाहिए

मन्त्र- निर्मलं निर्मलीकरणं पवित्रं पापनाशनम्।
जिनागन्धोदकं वन्दे कर्माष्टकनिवारकम्।।

अर्थ- जिनेन्द्र भगवान् से स्पर्शित यह सुगन्धित जल स्वयं निर्मल है एवं दूसरों को निर्मल करने वाला, पवित्र करने वाला एवं पापों का नाश कर, आठ कर्मों से मुक्त करने वाला है। ऐसे गन्धोदक की मैं वन्दना करते हुए अंगों पर लगाता हूं।

प्रश्न- गंधोदक कहां-कहां लगाना चाहिए?

उत्तर- गंधेदक शरीर के उत्तम अंग अर्थात प्रथम मस्तिष्क पर लगाकर नाभि के ऊपर के भाग तक लगाना चाहिए। नाभि के नीचे का भााग अधोभाग, अशुद्ध भाग कहलाता है। वैसे उत्तम अंग का अर्थ मस्तिष्क है।

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