।। आओ अभिषेक करें ।।

दूरावनम्र-सुरनाथ-किरीट कोटी-
संलग्न-रत्न किरणच्छवि-धूसरांप्रिम्।।
प्रस्वेदताप-मलमुक्तमपि प्रकृष्टै।
र्भक्त्या जलैः र्जिनपतिं बहुधाभिषिंधे।।

अन्वयार्थ- दूरा-अवनम्-सुरनाथ-किरीट-कोटि-संलग्न-रत्न-किरणच्छवि-धूसर-अंध्रिम् दूर से झुके हुए इंद्रों के मुकुटों के (कोटी) के अग्रभाग में लगे हुए रत्नों की किरणछवि से धूसर हुए चरण हैं जिनके (अपि) और (जो) (प्रस्वेद-तप-मल-मुक्त) प्रस्वेद तोप और मल से मुक्त है (उन) (जिनपति) जिनेन्द्र देव का मैं (प्रकष्टैः भक्त्या) उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक (जलैः) जल से (बहुधा) अनेक बार (अभिषिंचे) अभिषेक करता हूं।

अर्थ- श्री जिनेन्द्र देव के जो चरण दूर से नम्र हुए इन्द्रों के मुकुटों के अग्रभाग में लगे हुए रत्नों की किरण छवि से धूसर हो रहे हैं और जो प्रस्वेद ताप और मल से मुक्त हैं। उन जिनेन्द्र देव का मैं भक्तिपूर्वक जल से अनेकानेक बार अभिषेक करता हूं। यहां पर मात्र शुद्ध जल से प्रभु का अभिषेक करें-

मंत्र-

ऊँ हृीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपालसन्तं वृषभादिमहावीरपर्यन्त चतुर्विशति
तीर्थकर परमदेवम् आद्यानाम् आद्ये जम्बद्वीपे भरत क्षेत्रे आर्य
खण्डे भारत देशे.....नाम्नि नगरे मासानामुत्तम मासे......मासे......
पक्षे........शुभ दिन मुनि आर्यिाका श्रावक-श्राविकाणां सकल कर्मक्षयार्थं जलेनाभिषेकं करोमिति स्वाहा।

मंत्र अर्थ- ऊँ हृीं सब द्वीपों के मध्य विराजमान जम्बूद्वीप में, भारत क्षेत्र में, आर्य खण्ड में............ भारतदेश में............ (यहां पर उस स्थान का नाम बोलो जिस गा्रम में मंदिर बना हो) (हिन्दी माह का नाम)...... मास में (कृष्ण या शुक्ल पक्ष जो अभिषेक के समय हो).... पक्ष की (दिन का नाम बोलें जो भी वार हो)...... के शुभ दिन मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविकाओं को समस्त कर्मों का क्षय करने के लिए मैं अन्तरंग और बहिरंग लक्ष्मी से सुशोभित परम कृपालु भगवान् ऋषभदेव से लेकर महावीर स्वामी पर्यन्त चैबीस तीर्थंकर का जल से अभिषेक करता हूं।

विधि- अब छोटी प्लेट (तश्तरी) में आठों द्रव्यों का मिश्रण अघ्र्य लेकर निम्न श्लोक पढ़कर भगवानों को अघ्र्य समर्पित करें।

उदक-चन्दन-तन्दुल-पुष्पकैश्चरूसुदीप-सुधूप-फलाघ्र्यकैः।
धवल मंगलागानरवाकुले, जिन-गृहे जिननाथमहं यजे।।

मंत्र-ऊँ हृीं श्री वृषभादिवीरान्तेभ्यो अभिषेकान्ताय अघ्र्यं निर्वापामीति स्वाहा।

यहां पर सुगन्धित जल से अभिषेक करें-

द्रव्यैरनल्पघन सार चतुः समाद्यै-
रामोदवासित समस्त दिंगतरालैः।
मिश्री कृतने पयासा जिन पुगंवानां,
त्रैलोक्य पावल महं स्नपनम् करोमि।।

मंत्र-ऊँ हृीं चतुष्कोणेषु चतुः कलश स्थापनं करोमि स्वाहा।

ऊँ हृीं श्री क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वं मं मं हं
हं सं सं तं तं झं झं क्ष्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं
द्रीं द्रावय द्रावय ऊँ नमो अर्हते भगवते श्र ीमते
पवित्रतर जलेन जिनमेषेचयामि स्वाहा।

अर्थ- उदक-चंदन-तंदुल-पुष्पकैश्चरूसुदीप-सुधूप-फलाध्र्यकैः।
धवल मंगालगानरवाकुले, जिन-गृहे जिननाथमहं यजे।।

मंत्र-ऊँ हृीं श्री वृषभादिवीरांतेभ्यो अभिषेकान्ताय अध्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

यहां पर चारों कलशाों से अभिषेक करें-

इष्टैर्मनोरथ-शतैरिव भव्य्पुंसां,
पूणैंः सुवर्ण-कलशैर्निखिलैवसानैः।
संसार-सागर-विलंघन-हेतु-सेतु,
माप्लावये त्रिभुवनैकपतिं जिनेन्द्रम।।

मंत्र- ऊँ हृीं श्रीमंतं भागवन्तं कृपालसंतं वृषभादि-महावीर-पर्यतं चतुर्विंशति तीर्थंकरपरमदेवम् आद्यानाम् आद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे-भारत देशे...नाम नगरे एतद्..... जिन चैत्यालये सं....... मासोत्तमेसमासे.....पक्षे तिथौ......वासरे प्रशस्त ग्रह-लग्न-होरायां मुनि-आर्यिका-श्रावक-श्राविकाणाम् सकल-कर्म-क्षयार्थं जलेनाभिषेकं करोमीति स्वाहा।

अर्घ- उउदर-चंदन-तंदुल-पुष्पकैश्चरूसुदीप-सुधूप-फलाघ्र्यकै‘।
धवल-मंगल-गान रवाकुले, जिन-गृहे कल्याणमहं यजे।।
ऊँ हृीं श्री वृषभादिवीरांतेभ्यो अभिषेकान्ताय अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांति धारा

टोंटीदार कलश से शंतिपूर्वक बिना धारा टूटे प्रभु का न्हवन करें। ऊँ नमः सिद्धेभ्यः। श्री वीतरागाय नमः ऊँ नमोऽर्हते भगवते, श्रीमते पाश्र्व-तीर्थंकराय द्वादशगण परिवेष्टिताय, शुक्ल-ध्यान-पवित्राय, सर्वज्ञाय, स्वयंभुवे, सिद्धाय, बुद्धाय परमात्मने, परम-सुखाय, त्रैलोक्य-महिताय, अनन्त-संसार-चक्र परिमर्दनाय, अनंतदर्शनाय, अनंत ज्ञानाय, अनंत सुखाय अनंतवीर्याय सिद्धाथ-बुद्धाय, त्रैलोक्यवशंकराय, सत्यज्ञानाय, सत्य-ब्रह्मणे धरणेन्द्र-फण-मण्डल-मंडिताय, ऋषि-आर्यिका-श्रावक-श्राविका-प्रमुख चतुस्संघोपसर्ग-विनाशनाय, घातिकर्म-विनाशनाय, अघााति-कर्म विनाशनाय, अपवायुं
छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
मत्युं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
अतिकामं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
रतिकामं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
क्रोध छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
अग्निभयं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्वशत्रुं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्वोपसर्गं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्वभयं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्वराजभयं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व चोर भयं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।
सर्व मृग भयं छिंधि-छिंधि, भिंधि-भिंधि।

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