।। आओ अभिषेक करें ।।

निम्न श्लोक पढ़कर भूमि शुद्ध करें-

ये संति केचिदिह दिव्य-कुल-प्रसूता।
नागाः प्रभूत बलदर्पयुता विबोधाः।।
संरक्षणार्थममृतेन शुभेन तेषां।
प्रक्षालयामि पुरतः स्नपनस्य भूमिम्।।3।ं

मंत्र-ऊँ हृीं पवित्र जलेन भूमि शुद्धिं करोमि स्वाहा।

अन्वयार्थ- इस लोक में (प्रभूत बल-दर्पयुताः) प्रभूत बल और दर्प से युक्त (विबोधाः) बुद्धिशाली (तथा) (दिव्याकुल-प्रसूता) दिव्यकुल में उत्पन्न (ये केचित्) जो भी (नागाः) नागदेव (सांति)ः है, (तेषां) उनके (पुरतः) समक्ष (संरक्षणार्थ) संरक्षण के लिए (शुभेन अमृतेन) प्रशस्त जलामृत से (स्नपनस्य भूमि) स्नपन:- न्हवन भूमि का (प्रक्षालयामि) प्रक्षालन करता हूं।

अर्थ- इस लोक में प्रभूत बल और दर्प से युक्त बुद्धिशाली और दिव्य कुल में उत्पन्न हुए जो नागदेव हैं उनके संरक्षण के लिए प्रशस्त जल से स्नपन भूमि का प्रक्षाालन करता हूं।

अभिषेक कर्ता अपने हाथों में प्रासुक जल से लेकर भूमि पर छिड़कें। छींटे देते समय सूक्ष्म जीवों की रक्षा का ध्यान रखें। निम्न श्लोक पढ़कर अभिषेककत्र्ता-सिंहासन की शुद्धि करें-

क्षीरार्णवस्य पयासां शुचिभि प्रवाहैः।
प्रक्षालितं सुरवरैर्यदनेक वारम्।
अत्युद्धमुन्नतमहं जिन पादपींठ।
प्रक्षालयामि भवसंभवतापहारि।।

मंत्र-ऊँ हृां हृीं हूं हृः नमोभगवते श्रीमे पवित्रजलेन पीठं-प्रक्षालनं करोमि स्वाहा।

अन्वयार्थ- (क्षीरार्णवस्य) क्षीर समुद्र के (पयासां) जल के (शुचिभिः प्रवाहैः) निर्मल प्रवाहों से (सुरवरैः) देवेन्दा्रें के द्वारा (यद्) जो (अनेकवार) अनेक बार (प्रक्षालित) प्रक्षालित हुआ है। (भवसंभवतापहारि) संसार ताप का हरण करने वाले (अत्युद्धम उन्नतं) श्रेष्ठ एवं उत्तुंग (उस) (जिनपादपीठ) जिनपादपीठ का (अहं) मैं (प्रक्षालयामि) प्रक्षालन करता हूं।

अर्थ- देवों ने क्षीर समुद्र के जल के निर्मल प्रवाह से संसार ताप का हरण करने वाले और अत्युन्नत जिस जिनपादपीठ का अनेक बार प्रक्षालय किया है, समुपस्थित हुये उस पादपीठ का मैं प्रक्षालन करता हूं। अभिषेककत्र्ता सिंहासन को जल से प्रक्षालन कर शुद्ध करें तदुपरांत चंदन, केशर लेकर सिंहासन पर भी वर्ण लिखें।

श्री शारदासुमुख-निर्गत-बीजवर्ण।

श्री मंगलीक वर सर्व जनस्य नित्यम्।।

श्री मत्स्वयं क्षयति तस्व विनाश विघ्नं।

श्रीकार-वर्ण-लिखितं जिनभद्रपीठे।।

मंत्र-ऊँ हृीं श्रीकारलेखनं करोमि स्वाहा।

अन्वयार्थ- जो (विनाशविघ्नं क्षयति) विघ्न और विनाश का क्षयकारी है (श्रीमत्स्वयं) स्वयं श्री सम्पन्न है (नित्यं) सदा (श्रीमंगलीक वर सर्व जनस्य) सभी जन के लिए सौभाग्य तथा मंगलप्रदायक है ऐसा (श्रीशारदा सुमुख-निर्गत-बीजवर्ण) श्री सम्पन्न सरस्वती के मुख से समुद्रभूत बीजवर्ण रूपी (श्रीकार वर्ण) श्री वर्ण (जिन भद्रपीठे) जिनेन्द्र देव के भद्रपीठ पर (मेरे द्वारा) (लिखित) लिखा गया।

अर्थ- श्री सम्पन्न, शारदा के मुख से निकले हुए, सब जनों के लिए सदा मंगल स्वरूप, विघ्नों का नाश करने वाले और स्वयं शोभा-सम्पन्न ऐसे श्री कार वर्ण को मैं जिनेन्द्र देव के भद्रपीठ (सिंहासन) पर लिखता हूं।

श्री

सिंहासन पर लिखें-जिन प्रतिमा को अभिषेक हेतु सिंहासन पर विराजमान करें।

यं पाडुकामल शिलागतमादिदेव। मस्नापयन् सुरवराः सुरशैलमूघ्र्निं।
कल्याणमीप्सुरहमक्षत-तोय-पुष्पैः। सम्भावयामि पुर एव तदीयबिम्बम्।।

मंत्र-ऊँ हृी क्लीं ऐं अर्हम् श्रीवर्णे प्रतिमास्थापनं करोमि स्वाहा।

अन्वयार्थ- (सुरशैलमूघ्र्नि) सुमेरू पर्वत के शिखर पर (पाण्डुकामलशिला गतम्) निर्मल पाण्डुक शिला पर स्थित (यम् आदिदेव) जिन आदिदेव का (सुरवराः) देवेन्द्रों ने (अस्नापयन्) अभिषेक किया था (कल्याण मीप्सुः) कल्याण का इच्छुक (अहं) मैं (तदीय बिम्ब) उन आदिनाथ की प्रतिमा को (पुर एव) सम्मुख (स्थापित करके) (अक्षत-तोय-पुष्पैः) अक्षत, जल और पुष्पों से पूजा करता हूं।

अर्थ- समुेरू पर्वत के अग्रभाग में स्थित निर्मल पाण्डुक शिला पर स्थित श्री आदिजिन का पहले देवेन्द्रों ने अभिषेक किया था। कल्याण का इच्छुक मैं उन आदिजिन की प्रतिमा की स्थापना कर अक्षत, जल और पुष्पों से पूजा करता हूं। अब सिंहासन के चारों कोनों में चार कलश स्थापित करें।

सत्पल्लवार्चित-मुखान्कल धौतरौप्य।
ताम्रारकूट-घटितान्पयसा सुपूर्णान।।
संवाहयतामिव गतांश्चतुरः समुद्रान।
संस्थापयामि कलशान् जिन वेदिकान्ते।।

मंत्र-ऊँ हृीं चतुष्कोणेषु चतुः कलश स्थापनं करोमि स्वाहा।

अन्वयार्थ- (कलधौत-रूप्य-ताम्रारकूट-घटितान्) स्वर्ण, चांदी और तांबे से निर्मित (पयसा सुपूर्णान्) जल से भरे हुए (सत्पल्लवार्चित मुखान्) उत्तममोत्तम पल्लवों से सुशोभित मुखवाले (चतुर कलशान्) चार कलशों को (चतुर$ समुद्रान् इब) मानो चार समुद्र ही हैं। (ऐसा मानकर) (जिन वेदिकांते) जिनवेदिका के चारों कोणों पर (संस्थापयामि) स्थापित करता हूं।

अर्थ- जो उत्तमोत्तम पल्लवों से अर्चित किए गए हैं जो स्वर्ण, चांदी, तांबें से निर्मित हैं और जल से भरे हुए हैं, ऐसे चार समुद्र ही हैं और मानकर मैं चारों कलश जिन वेदिका के चारों कोनों पर स्थापित करता हूं।

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