|| नमोकार मन्त्र - एक अनुचिन्तन ||
‘‘णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं।।’’

संसारावस्था में सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा बद्ध है, इसी कारण इसके ज्ञान और सुख पराधीन हैं। राग, द्वेष, मोह और कषाय ही इसकी पराधीनता के कारण हैं; इन्हें आत्मा के विकार कहा गया है। विकार ग्रस्त आत्मा सर्वदा अशान्त रहती है, कभी भी निराकुल नहीं हो सकती। इन विकारों के कारण ही व्यक्ति के सुख का केन्द्र बदलता रहता है, कभी ऐन्द्रियिक विषयों के प्रति आकृष्ट होता है तो कभी विकृष्ट। कभी इसे कंचन सुखदायी प्रतीत होता है, तो कभी कामिनी।

राग और द्वेष की भावनाओं के संश्लेषण के कारण ही मानव हृदय में अगणित भावों की उत्पत्ति होती है। आश्रय और आलम्बन के भेद से ये दोनों भाव नाना प्रकार के विकारों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। Read More...