।। आओ पूजन करें ।।

सर्वप्रथम कोमल श्वेत वस्त्र से पूजन के पात्रों (बर्तनों) को पोंछकर साफ करना चाहिए एवं ठोना में ऊँ वर्ण लिखें।

ऊँवर्ण ठोना में क्यों लिखते हैं?

ऊँ वर्ण में पांचों परमेष्ठी गर्भित हैं। क्योंकि ऊँ वर्ण पांच अक्षरों से बना है।

अ- अरिहंत

अ- अशरीरी (सिद्धि)

आ- आचार्य

उ- उपाध्याय

म्- मुनि

ठोना में उनकी स्थापना हेतु पुष्प चढ़ाते जाते हैं जिनकी हमें पूजा करनी है, वे हैं पंच परमेष्ठी भगवान अत$ ठोना में ऊँ लिखना उचित है।

अ बवह थाली तैयार करें जिस पर पूजन का अष्ट द्रव्य समर्पित करना है। द्रव्य चढ़ाने वाली थाली में स्वास्तिक बनाएं।

एक बिंदु सिद्ध परमात्मा का प्रतीक-

छत्राकार सिद्ध शिला मोक्ष स्थली की प्रतीक-

तीन बिंदु देव-शास्त्र-गुरू के प्रतीक-

स्वास्तिक की रेखााएं चर गति का प्रतीक हैं-

मनुष्य गति देव गति

नरक गति तिर्यंच गति

स्वास्तिक के अन्दर बने चार बिंदु-

बिन्दु नं 1- प्रथमानुयोग

बिन्दु नं 2- करणानुयोग

बिन्दु नं 3- चरणानुयोग

बिन्दु नं 4- द्रव्यानुयोग

सीधी खड़ी रेखा त्रस नाली (संसार रेखा) की प्रतीक है। आड़ी रेखा संसार में जन्म-मरण की प्रतीक है। अर्थात हम अनादि काल से संसार में जन्म-मरण करते आ रहे हैं।उस जन्म-मरण से मुक्त होने के लिए हे जिनेन्द्र! मैं आपकी पूजन कर रहा हूं। चार गति रूप जन्म-मरण से मुक्ति पाने के लिए मैं चार अनुयोगों (प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग) का सहारा लेकर रत्नत्रय की प्राप्ति करके आपके समान सिद्ध शिला में विराजमान होना चाहता हूं। अतः मैं आपकी (देव-शस्त्र-गुरू की) पूजन प्रारम्भ करता हूं।

अब जिन कलशों में जल चन्दन चढ़ाना हो उन पर स्वास्तिक बनाएं-

स्वास्तिक चारों गतियों से निवृत्त होने का प्रतीक है।

अब ठोना को एक ऊँची चैकी पर विराजमान करें। फिर उससे नीची चैकी पर अष्टद्रव्य से सुसज्जित थाल रखें एवं चढ़ाने वाली थाली उससेनीचे रखें। थाली के पास ही जल, चंदन चढ़ाने हेतु दो कलश रखें एवं एक धूप खेने का पात्र रखें जिसमें अग्नि हो। अपने पास एक छोटी प्लेट रखें जिससे अघ्र्य चढ़ाएं। प्लेट पोंछने के लिए कपड़े का एक छोटा-सा छन्ना रखें।

इस तरह सेपूजन की तैयारी हुई। खड़े होकर सावधानीपूर्वक नौ बार णमोकार मन्त्र पढ़कर पूजन प्रारम्भ करें।

पूजन पीठिका प्रारम्भ

पूजक अपने हाथों में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़ें:-

ऊँजय जय जय मनोस्तु नमोस्तु नमोस्तु
णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोएसव्वसाहूणं
ऊँ हृीं अनादिमूलमन्त्रेभ्या ेनमः। पुष्पांजलि विक्षपामि।

अर्थ-हे पंच परमेष्ठी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो, नमस्कार हो, नमस्कार हो, नमस्कार हो।

अरिहन्तों को नमस्कार हो, सिद्धों को नमस्कार हो, आचार्यों को नमस्कार हो, उपाध्यायों को नमस्कार हो और लोक में सब साधुओं को नमस्कार हो।

अपने हाथों की अंजुलि बनाकर पुष्प बरसाएं, हाथों में पुनः पुष्प लेकर मंगल पाठ पढ़ें।

चत्तारि मंगलं, अरिहन्ता मंगलं, सिद्धा मंगलं,
साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहन्ता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा,
साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहंते शरणं पव्वज्जामि,
सिद्धे शरणं पव्वज्जामि, साहू शरणं पव्वज्जामि,
केवलिपण्णत्तं धम्मं शरणं पव्वजामि।

उपर्युक्त तरीके से पुष्पांजलि क्षेपण करें।

अर्थ-चार पदार्थ मंगल स्वरूप हैं- अरिहन्त मंगल है, सिद्ध मंगल है, साधु मंगल है, अैर केवली द्वारा प्रणीत धर्म मंगल है। लोक में चार पदार्थ श्रेष्ठ हैं- अरिहंत श्रेष्ठ है, सिद्ध श्रेष्ठ है, साधु श्रेष्ठ है और केवली द्वारा प्रणीत धर्म श्रेष्ठ है। मैं चार की शरण को प्राप्त होता हूं, अरिहन्तों की शरण को प्राप्त होता हूं, सिद्धों की शरण को प्राप्त होता हूं, साधुओं की शरण को प्राप्त होता हूं और केवली के द्वारा प्रणीत धर्म की शरण को प्राप्त होता हूं।

अब निम्न श्लोक पढ़ते हुए पुष्पों की बरसात करते जाएं।

(1) अपवित्रःपवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपिवा।
ध्यायेत्पंच नमस्कारं सर्वपापैः प्रमुच्यते।।

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