।। पंचमहाकल्याणक ।।

तीर्थकरों के गर्भावतरण, जन्म, तप, ज्ञान और निर्वाण की घटनाओं को पंचकल्याणक कहते हैं, क्योंकि ये अवसर जगत के लिए अत्यंत कल्याणकर एवं मंगलकारी होते हैं। तीर्थकर का इस धरती पर आना, जन्म लेना, दीक्षा धारण करना, केवलज्ञान प्राप्त करना और निर्वाण प्राप्त करना, ये पांचों हीप्रसंग जगत के जीवों के लिए कल्याणकारी ही होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि ‘‘नकरा अपि मोदन्ते यस्य कल्याणपर्वसु’’ तीर्थकरों के कल्याणक के अवसरों पर नारकी जीवों को भी कुछ क्षण के लिए आनन्द की अनुभूति होती हैं लोकोत्तर कल्याण का हेतु होने के कारण भगवान के जीवन के इन पांचों अवसरों को जंनकल्याणक कहते हैं। इन अवसरों पर समस्त देव और मनुष्य आदि विशेष प्रकार का उत्सव/आराधना कहते हैं।

गर्भ कल्याणक-जब तीर्थकरा का गर्भावतरण होता है, तब गर्भ कल्याणक मनाया जाता है। देवराज इन्द्र (सौधर्म इन्द्र) अपने दिव्य अवधिज्ञान से भगवान के गर्भावतरण को निकट जाकर कुबरे को तीर्थकर के माता-पिता के घर प्रतिदिन प्रभात, मध्याह्य-सायंकाल तथा मध्यरात्रि में चार बार साढ़े तीन करोड़ रत्न वर्षा की आज्ञा प्रदान करता है। रत्नों की वर्षा जन्म होने तक (पन्द्रह माह तक) निरंतर होती हैं। छह माह के उपरांत तीर्थकर जब माता के गर्भ में आने को होते हैं, तब तीर्थंकर की माता को रात्रि के अंतिम प्रहर में अत्यंत सुहावने, मनभावन और आह्लादकारी एक के बाद एक सोलह स्वप्नों की पंक्ति दिखाई पड़ती है। ये स्वप्न तीर्थकर के गर्भावतरण के संसूचक होते हैं। इनकी सर्वोपरि विषेशता एवं महत्व यही है कि ये रहस्यों से भरे होते हैं। इनके उद्घाटन में जिनेश्वर का संपूर्ण भविष्य झलकता है। ये स्वप्न भावती तीर्थकरा की प्रतिभा और प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं।

सोलह स्वप्न- सोलह स्वप्न निम्नलिखित हैं-

1- चार दांातें वाला उन्नत गज

2- श्वेत वर्ण का उन्नत स्कन्धवाला वृषभ

3- उछलाता हुआ सिंह

4- कमल सिंहासन पर स्थित लक्ष्मी

5- सुगन्धित भव्य मन्दार पुष्पों की दो मालाएं

6- नक्षत्रों से परिवेष्ठित चन्द्र

7- उदयाचल पर अंगड़ाई भरता सूर्य

8- स्वच्छ-जल पूरित दो स्वर्ण कलश

9- जलाशय में क्रीडारत मत्स्द्वय

10- स्वच्छ जल से भरपूर जलाशय

11- गंभीर घोष करता सागर

12- मणिजटित सिंहासन

13- रत्नों से प्रकाशित देव विमान

14- नागेन्द्र भवन

15- रत्नों की विशाल राशि

16- निर्धूम अग्नि

उपर्युक्त स्वप्नों के दर्शन से तीर्थकर प्रभु की माताओं का मन हर्ष-विभोर हो उठता है। वे बड़ी कुतूहल और जिज्ञासा के साथ अपने पति के पास पहुंचती हैं। उन्हें अपने स्वप्नों की जानकारी दे कर अपनी जिज्ञासा प्रकट करती हैं। तीर्थकर के पिता अपने निमित्तज्ञान के बल पर स्वप्नों का प्रतीकात्मक विश्लेषण कर अपनी पत्नी को स्वप्नों का फल बताते हैं अैर भावी तीर्थकर भगवन्त के गर्भावतरण की कल्पना में आनन्द विभोर हो जाते हैं।

स्वप्नों का प्रतीकाशय

गज- गज स्वप्न शास्त्र में महत्ता का प्रतीक है। इस स्वप्न दर्शन द्वारा गर्भस्थ शिशु के महान तीर्थ प्रचारक होने की सूचना प्राप्त होती है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार चतुर्दन्त गज को किसी महान अभ्युदय की प्राप्ति का प्रतीक माना जाता है।

वृषभ- वुषभ धर्म का प्रतीक है। स्वप्न में उन्नत सकन्धोंवाले वृषभ का दर्शन गर्भस्थ शिशु के सत्य धर्म का प्रचारक होने का संसूचक है।

सिंह- स्वप्न शास्त्र में सिंह को बल, पराक्रम अैर पौरूष की वृद्धि का प्रतीक माना गया है। स्वप्न में उछलते हुए सिंह के दर्शन का फल गर्भस्थ बालक का अतुल पराक्रमी होना है।

मन्दार-पुष्पमाला-मन्दार पुष्पों की माला उत्सव, यश और प्रसिद्धि का सूचक है। इस स्वप्न के दर्शन से बालक के यशस्वी, कांतिमान और सुरभित शरीरवाला होने के साथ सबके द्वारा शिरोधार्य होने की सूचना मिलती है।

लक्ष्मी- अभिषिक्त होती हुई लक्ष्मी के दर्शन से यह प्रकट होता है कि सुमेरू पर्वत पर सौधर्म आदि इन्द्रों द्वारा बालक का अभिषेक किया जायेगा। राजा महाराजाओं के साथ इन्द्र धरणेन्द्रादि उसके चरणों की पूजा करेंगे।

चन्द्रा- स्वप्न में चन्द्रा का दर्शन यह बताता है कि बालक चन्द्रा की तरह जगत के संताप को दूर करेगा।

सूर्य- सूर्य दर्शन से यह सूचित होता है कि भावी बालक अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करनेवाला होगा और सूर्य के समान भास्वर केवलज्ञान प्राप्त करेगा।

पूर्ण कलश- जल पूरित दो स्वर्ण कलशों के दर्शन से यह प्रकट होता है कि भाावी बालक अक्षय निधियों का अधिपति होगा।

मत्सरू युगल- स्वप्न शस्त्र में मत्स्रू युगल के दर्शन को भावी सुख समृद्धि का प्रतीक माना गया है। स्वप्न में मत्स्य युगल का दर्शन अनन्त सुख की उपलब्धि का सूचक है।

सरोवर- जलाशय संवेदनशीलता का प्रतीक है। स्वप्न में सरोवर का दर्शन यह बताता है कि बालक अत्यधिक संवेदनशील ओर वात्सल्य भाव से युक्त होगा।

सागर-गम्भीर घोष करते हुए समुद्र का दर्शन हृदय की विशाालता का प्रतीक है। भावी बालक समुद्र के समान गम्भीर बुद्धि का धारक होगा।

मणिजटित सिंहासन- सिंहासन वर्चस्व और प्रभुत्व का प्रतीक है। इसका दर्शन यह बताता है कि भावी बालक तीनों लोकों में सर्वाधिक वर्चस्व और प्रभुत्व संयुक्त होगा।

देव विमान- देव विमान का दर्शन देवों के आगमन का प्रतीक है।

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