|| दक्षलाक्षणी धर्म ||
jain temple3

धर्म का स्वरूप दशलक्षण रूप है। इन दश चिन्हों से ही अंतरंग धर्म जाना जाता हैं वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। दशलक्षण महापर्व वीतरागता का पोषक त्याग, तपस्या, संयम एवं साधना का पर्व हैं।

श्री दशलक्षण पर्व वर्ष में तीन समय मनाये जाते हैं।

1. भाद्रपद सुदी पंचमी से भाद्रपद सुदी चौदस तक

2. माघ सुदी पंचमी से माघ सुदी चौदस तक

3. चैत्र सुदी पंचमी से चैत्र सुदी चौदस तक

दशलक्षण धर्म

1. क्षमा: शांत तथा समता भाव से अपने आप में क्लेश ना होने देना व क्रोध छोड़ना।

2. मार्दव: मान नहीं करना, अहं छोडना।

3. आर्जव: कपट नहीं करना, माया कपट छोडना।

4. सत्य: सत्य वचन बोलना।

5. शौच: लोभ नहीं करना।

6. संयम: इन्द्रियों व मन को वश में करना।

7. तप: इच्छायें छोड़ना।

8. त्याग: त्याग करना।

9. आकिंचन: परिग्रह का त्याग करना।

10. ब्रह्मचर्य: विषय सेवन व यौन भावों को मन वचन काम से छोड़ना।

जैनों का सबसे पवित्र पर्व दशलक्षण पर्व हैं। दिगम्बर सम्प्रदाय में यह पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ला पचंमी से चतुर्दशी तक तथा श्वेताम्बर में भाद्र कृष्णा द्वादशी से भाद्र शुक्ला चतुर्थी तक मनाया जाता है। इन दिनों में जैन मंदिरों मंे खूब आनंद छाया रहता है। प्रतिदिन प्रातः काल से ही सब स्त्री-पुरुष स्नान करके मंदिरों में पहुँच जाते हैं और बड़े आनंद के साथ भगवान का पूजन करते हैं। पूजन समाप्त होने पर प्रतिदिन श्री तत्वार्थसूत्र के दस अध्यायों में से एक-एक अध्याय का व्याख्यान और उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आंकिन्चय और ब्रह्मचर्य- इन धर्मों में से एक-एक धर्म का विवेचन होता है। इन दस धर्मों के कारण इस पर्व को दशलक्षण पर्व कहते हैं, क्योंकि धर्म के उक्त दस लक्षणों का इस पर्व में खासतौर से आराधन किया जाता है। व्याख्यान के लिए बाहर से बड़े-बडे़ विद्वान बुलायें जाते हैं, और प्रायः सभी स्त्री-पुरुष उनके उपदेश से लाभ उठाते हैं। त्याग धर्म के दिन परोपकारी संस्थाआंे को दान दिया जाता है और आश्विन कृष्णा प्रतिपदा के दिन पर्व की समाप्ति होने पर समाज के सब लोग एकत्र होकर परस्पर में गले मिलते हैं और गतवर्ष की अपनी गलतियों के लिए परस्पर में क्षमायाचना करते हैं। जो लोग दूर देशांतर में बसते हैं उन्हें पत्र लिखकर क्षमायाचना की जाती है।

इन दिनों में प्रायः सभी स्त्री-पुरुष अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार व्रत-उपवास वगैरह करते हैं। कोई कोई दसों दिन उपवास करते हैं, बहुत से दसों दिन एक बार भोजन करते हैं। इन्हीं दिनों में भाद्रपद शुक्ला दशमी को सुगंध दशमी पर्व होता है, इस दिन सब जैन स्त्री-पुरुष एकत्र होकर मंदिरों में धूप देने के लिए जाते हैं।

भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी अनंत चतुर्दसी कहलाती है। इसका जैनों में बड़ा महत्व है। जैनशास्त्रों के अनुसार इन दिन व्रत करने से बड़ा लाभ होता है। दूसरे, यह दशलक्षण पर्व का अंतिम दिन भी है, इसलिए इस दिन प्रायः सभी जैन पुरुष-स्त्री व्रत रखते हैं और पूरा दिन मंदिर में बिताते हैं। अनेक स्थानों पर इस दिन जलूस भी निकलता है। कुछ लोग इन्द्र बनाकर जुलूस के साथ जल लाते हैं और उस जल से भगवान का अभिषेक करते हैं। फिर पूजन होता है और पूजन के बाद अनंत चर्तुदशी व्रत कथा होती है। जो व्रती निर्जल उपवास नहीं करते वे कथा सुनकर ही जल ग्रहण करते हैं।