|| श्लोक-काव्य : 33-48 ||
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यश-प्रसार

गंभीरताररवपूरितदिग्विभाग-
स्त्रैलोक्यलोकशुभसंगमभूतिदक्षः।
सद्धर्मराजजयघोषणघोषकः सन्,
खे दुन्दुभिध्र्वनति ते यशसः प्रवादी।।३२।।

पदच्छेद - गंभीर तार रव-पूरित-दिग्विभागः, त्रैलोक्य लोक शुभ संगम भूति दक्षः, सत् धर्मराज जय-घोषण घोषकः सन् खे दुंदुभिः ध्वनति ते यशसः प्रवादी।

शब्दार्थ - गंभीर = प्रशांत, गहन, तार = ऊँचा, रव = शब्द, पूरित = पूरा हुआ, दिग्विभागः = दशों दिशाओं को। त्रैलोक्य = तीन लोक, लोक = संसार, शुभ = अच्छा, संगम = संस्पर्श, भूति = सम्पत्ति, दक्षः = समर्थः। सत् = सच्चा, समीचीन, धर्मराज = श्रेष्ठ धर्म, जयघोषण = जयनाद, घोषकः = घोषणा करनेवाला, सन् = करता हुआ। खे = आकाश में, दुंदुभि = दुन्दुभि बाजा, ध्वनति = शब्द करता है, ते = आपका, यशसः = यश का, प्रवादी = कहनेवाला।।३२।।

अन्वय - गंभीरताररवपूरितदिग्विभागः त्रैलोक्य लोक शुभसंगमभूतिदक्षः सद्धर्मराजजयघोषणघोषकः सन् दुन्दुभिः ते यशसः प्रवादी खे ध्वनति।

श्लोकार्थ- आपके समवसरण (धर्मसभा) में देवगण आकाश में दुन्दुभि बजा रहे हैं, उसकी गंभीर, स्पष्ट और मधुर ध्वनि ने समस्त दिग्मण्डल को गुंजायमान कर दिया है, मानो, वह तीनों लोकों को प्राणियों को सत्समागम रूपी सम्पत्ति प्राप्त कराने की घोषणा करती हुई श्रेष्ठ-समीचीन जैन धर्म की जय-जयकार करती हुई आपका यशोगान और जयजयकार कर रही है। (पाँचवाँ प्रातिहार्य = दुन्दुभि)

रुचिर गंभीर उच्च शब्दनि सों, दस-दिसि पूरनवारो।
त्रिभुवनजनकहँ शुभ संगम की, संपति वितरनहारो।
गगन माहिं पुनि तुव जस की जो, महिमा गावत छाजै।
सो दुन्दुभि जिनराज-विजय की, करत घोषणा बाजै।।३२।।

Filling all quarters with deep and loud sound the beat of kettle drums, skilled in announcing the grandeur of the auspicious society to the people of the three worlds, glorifying the victory of the soverign master of Religion, is moving in the sly proclaiming your fame.

शब्दसुमन-वर्षा
मन्दार-सुंदर-नमेरु-सुपारिजात-
संतानकादि-कुसुमोत्करवृष्टिरुद्धा।
गन्धोदबिंदु-शुभमन्दमरुत्प्रपाता,
दिव्या-दिवः -पतित ते वचसां ततिर्वा।।३३।।

पदच्छेद - मंदार-सुंदर-नमेरु-सुपारिजात, सन्तानक्-आदि कुसुमोत्कर वृष्टिः उद्धा, गंधोद बिन्दु शुभ मन्द मरुत-प्रपाता, दिव्या दिवः पतति ते वचसाम् ततिः वा।

शब्दार्थ - मन्दार = मन्दार मानक फूल, सुंदर = मनोहर, नमेरु = स्वर्ग के एक वृक्ष का नाम, सु = अच्छा, पारिजात = पारिजात का फूल। सन्तानक् आदि = सन्तानक आदि अन्य भी, कुसुमोत्कर = कल्पवृक्ष के फूल-समूह, वृष्टि = वर्षा, उद्धा = श्रेष्ठ। गन्धोद = सुगंधित जल, बिन्दु = बूँद, शुभ = उŸाम, मंद = भीनी, मरुत्प्रपाता = हवा के साथ गिरते हुए। दिव्या = मनोहर, दिवः = आकाश से, पतति = गिरती है, ते = आपके, वचसाम् = वचनों की, ततिः = पंक्ति की, वा = तरह।।३३।।

अन्वय - गंधोदबिन्दु शुभमन्दमरुत्प्रपाता उद्धा दिव्या मन्दार-संुदर-नमेरु सुपारिजात-सन्तानक-आदि कुसुमोत्करवृष्टिः दिवः पतति वा ते वचसां ततिः।

श्लोकार्थ- आपके समवसरण में सुगन्धित-पवित्र जल-कणों सहित मंद-मंद पव के सुख झोंकों के साथ लहराकर आकाश से गिरते हुए मन्दार-सुंदर-नमेरु और पारिजात आदि सुन्दर-उत्कृष्ट ऊध्र्वमुखी फूलों की वर्षा ऐसी प्रतीत हो रही है मानो आपके मुख से निसृत दिव्यध्वनिरूपी/वचनरूपी पुष्प ही बरस रहे हों। (छठा प्रातिहार्य = पुष्पवृष्टि)

गंधोदक बिंदुन सों पावन, मंद पवन की प्रेरी।
पारिजात मंदार आदि के, नव कुसुमन की ढेरी।
ऊरधमुखि ह्वै नभसों बरसत, दिव्य अनूप सुहाई।
मानो तुव वचनन की पंगति, रूपराशि धरि छाई।।३३।।

The shower of clusters of flowers of the trees Mandar, Sunder, Maneru, Par jat and Santanak etc., falling down gently from the sky with the auspicious mild breeze laden with drops of perfumed water, locks as if the continuous flow of Divine and excellent words is pouring out of your mouth.

अलौकिक आभा-वलय
शुम्भत्प्रभावलयभूरिविभा विभोस्ते,
लोकत्रये द्युतिमतां द्युतिमाक्षिपन्ती।
प्रोद्यद्विाकर-निरंतरभूरिसंख्या,
दीप्त्याजयत्यपि निशामपि सोमसौम्यां ।।३४।।

पदच्छेद - शुम्भत् प्रभा-वलय भूरि विभोः ते, लोकत्रये-द्युतिमताम् द्युतिम् आक्षिपन्ती, प्रोद्यत् दिवाकर निरंतर भूरि संख्या, दीप्त्या जयति अपि निशाम् अपि सोम सौम्याम्।

शब्दार्थ - शुम्भत् = शोभायमान, प्रभावलय = भामण्डल, भूरि = विशाल, विभा = कान्ति, विभोः = ईश्वर, ते = आपके। लोकत्रये = तीन लोक, द्युतिमताम् = कांतिवान का, द्युतिम् = कान्ति को, आक्षिपन्ती = लजाती हुई। प्रोद्यत् = उगते हुए, दिवाकर = सूर्य, निरंतर = लगातार, भूरि = अनेक, संख्या = गणना। दीप्त्या = कान्ति से, जयति = जीतता है, अपि = भी, निशाम् = रात्रि को, अपि = भी, सोम = चन्द्र, सौम्याम् = सुंदर।।३४।।

अन्वय - विभोः ते शुम्भप्रभावलय भूरि विभा प्रोद्यत् दिवाकर निरंतर भूरि संख्या, लोकत्रये द्युतिमतां द्युतिम् आक्षिपन्ती सौम-सौम्यामपि दीप्त्या निशामपि जयति।

श्लोकार्थ- हे प्रभो! आपके अत्यंत शोभनीय प्रकाशमान उज्ज्वल भामण्डल की ज्योति उदित होते हुए असंख्य सूर्यों की निरंतर जगमगाती हुई तेजयुक्त कांति के समान है। उस ज्योति के सम्मुख तीनों लोक में जितने भी चमकीले देदीप्यमान पदार्थ हैं उन सबकी आभा तिरस्कृत हो जाती है, लज्जित हो जाती है। उसकी विलक्षणता यह है कि सूर्यों के तेज से अधिक प्रचण्ड होने पर भी पूर्णिमा के चन्द्रमा से अधिक शीतलता-सौम्यता भी प्रदान करती है। (सातवाँ प्रातिहार्य = भामण्डल)

जाकी अमित सुदुति के आगे, सब दुतिवंत लजावैं।
अगनित उदित दिवाकर हू, जिहि समता नहिं कर पावैं।
हे विभु, ऐसो तेजपुंज तुव, भामण्डल अति नीको।
शशिसम सौम्य तऊ जीतत है, दीपतिसों रजनी को।।३४।।

O Majestic Lord! the excessive light of your glittering Halo, surpassing the lustre of the brilliant objects of the three worlds, despite being dazzling like the raging radiance of hundreds of suns, that overcomes the darkness of night it is gentle and mild like the light of the Moon.

शाश्वत सत्य-निरूपक
स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्टः,
सद्धर्म-तŸव-कथनैक-पटस्त्रिलोक्याः।
दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषा-स्वभाव-परिणाम-गुणैः प्रयोज्यः।।३५।।

पदच्छेद - स्वर्ग-अपवर्ग गममार्ग विमार्गण इष्टः, सत् धर्म तŸव कथन एक पटुः त्रिलोक्याः, दिव्य-ध्वनिः भवति ते विशद् अर्थ सर्व, भाषा स्वभाव-परिणाम-गुणैः प्रयोज्यः।

शब्दार्थ - स्वर्ग = स्वर्ग, अपवर्ग = मोक्ष, गममार्ग = जाने का रास्ता, विमार्गण = ढूँढने के लिए, इष्ट = स्मरणीय। सत् = सच्चा, समीचीन, धर्म = धर्म, तत्व = गूढता, कथन = कथा, एक = एक, पटुः = समर्थ, त्रिलोक्याः = तीन लोक के प्राणियों को। दिव्य = दैवी, ध्वनि = शब्द, भवति = होती है, ते = आपकी, विशद् = विशेष रूप से, अर्थ = प्रयोजन, सर्व = सब। भाषा = भाषा, स्वभाव = अपने आप, परिणाम = परिवर्तित होनेवाले, गुणैः = गुणों से, प्रयोज्यः = युक्त।।३५।।

अन्वय - ते दिव्यध्वनिः स्वर्ग-अपवर्ग गममार्ग विमार्गणेष्टः भवति त्रिलोक्याः सद्धर्मतŸवकथनैक पटुः विशदार्थ-सर्व भाषा स्वभाव परिणामगुणैः प्रयोज्यः।

श्लोकार्थ- आपकी कल्याणकारी दिव्यध्वनि स्वर्ग एवं मोक्ष का मार्ग दिखानेवाली है। तीनों लोकों के समस्त प्राणियों को समीचीन धर्म का तŸवार्थ समझाने में पूर्ण सक्षम है, गंभीर अर्थवाली होकर भी अत्यंत स्पष्ट है। अपकी वाणी में यह अलौकिक गुण है कि वह जगत् के सभी जीवों के लिए उनकी अपनी-अपनी भाषा के अनुरूप बोध देने की शक्ति से युक्त है अर्थात् जो उसे सुनता है वही उसे अपनी भाषा में सरलता से समझ लेता है। (आठवाँ प्रातिहार्य = दिव्यध्वनि)

स्वर्ग और अपवर्ग मार्ग की, बाट बतावनहारी।
परम धर्म के तŸव कहन को, चतुर त्रिलोक मँझारी।
होय जगत की सब भाषनि में, जो परिनत सुखदानी।
ऐसी विशद अर्थ की जननी, हे जिनवर, तुव वाणी।।३५।।

Your Divince Voice which is indispensable in seeking out the path to heaven and salvation, singularly proficient in expounding the essentials of the right Religion of the three worlds and clear with profound meanings, is endowed with the faculty of being made comprehensible to every one his own language.

उन्निदहेमनवपंकजपुंजकांति,
पर्यल्लसन्नखमयूखशिखाभिरामौ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र-धतः,
पद्यानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति।।३६।।

पदच्छेद - उन्निद्र हेम नव पंकज-पुंज-कान्ति, परि-उल्लसत् नख-मयूख-शिखा-अभिरामौ, पादौ-पदानि तव यत्र जिनेन्द्र धतः, पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति।

शब्दार्थ - उन्निद्र = प्रस्फुटित, हेम = स्वर्ण, नव = नवीन, पंकजपुंज = कमल-समूह, कान्ति = शोभा को धरनेवाले। परि = सर्वप्रकार से, उल्लसत् = शोभायमान, नख = नख, मयूख = किरण, शिखा = अग्र भाग, अभिरामौ = सुंदर। पादौ = चरणद्वय, पदानि = कमल, तव = आपके, यत्र = यहाँ, जिनेन्द्र = भगवान, धतः = रखते हैं। पद्मानि = कमल, तत्र = वहाँ, विबुधा = देव, परिकल्पयन्ति = रचना कर देते हैं।।३६।।

अन्वय - जिनेन्द्र तव पादौ उन्निद्र-हेम-नव-पंकज-पुंजकांती पर्युल्लसन्नखमयूख शिखाभिरामौ यत्र पदानि धतः तत्र विबुधाः पद्मानि परिकल्पयन्ति।

श्लोकार्थ- हे जिनेन्द्र! आपके चरणयुगल खिले हुए नवीन स्वर्णकमलों के समान कांतिवाले हैं, उनके नखों से चारों ओर चमचमाती कांति फैल रही है। धर्मोपदेश हेतु गमन करते हुए आप जहाँ-जहाँ पग धरते हैं वहाँ-वहाँ देवगण स्वर्णकमलों की रचना करते जाते हैं।

सुवरन-वरण खिले कमलन की, ललित कांति जो धारे।
त्यों ही नख-किरणन की चहुँधा, छटा अनूप उछारे।
अस तुव चरणन की डग जहँ-जहँ, परत अहो जिनराई।
तहँ तहँ पंकज-पुंज अनूपम, रचत देवगन आई।।३६।।

O Jinendra (the Lord of conquerors) gods create lotuses wherever you step. You pair of feet which bear the lustre of recently blown lotuses of gold are beautified by the rays of light skipping from the nails.

विरल विभूति
इत्थं यथा तव विभूतिरभूज्जिनेन्द्र!
धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य।
यादृक्प्रभा दिनकृतः प्रहतान्धकारा
तादृक्कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि।।३७।।

पदच्छेद - इत्थम् यथा तव विभूतिः अभूत् जिनेन्द्र, धर्म-उपदेशन विधौ न तथा परस्य, यादृक् प्रभा-दिनकृतः प्रहत-अन्धकारा, तादृक् कुतः ग्रहगणस्य विकाशिनः अपि।

शब्दार्थ - इत्थम् = इस प्रकार, यथा = जैसी, तव = आपकी, विभूतिः = शोभा, वैभव, अभूत = जो पहले न हुई थी, जिनेन्द्र = जिनदेव। धर्मोपदेशन = धर्मोपदेशन के, विधौ = विधान में, न = नहीं, तथा = उस प्रकार, परस्य = औरों की। यादृक = जिस प्रकार, प्रभा = कान्ति, दिनकृतः = सूर्य द्वारा, प्रहत = दूरीभूत, अंधकारा = अँधेरा। तादृक् = उस प्रकार, कुतः = कहाँ से, ग्रहगणस्य = ग्रहों के, विकाशिनः = प्रकाशमान होते हुए, अपि = भी।।३७।।

अन्वय - जिनेन्द्र इत्थम् धर्मोपदेशन-विधौ यथा विभूति अभूत् तथा परस्य न दिनकृतः प्रभा यादृक् प्रहतान्धकारा तादृक् विकासिनः अपि ग्रह-गणस्य कुतः ?

श्लोकार्थ- हे जिनेन्द्र! समवशरण मंे विराजित धर्मोपदेश के समय जैसी दिव्य विभूतियाँ, जैसा ऐश्वर्य आपका था वैसी विभूतियाँ, वैसा ऐश्वर्य अन्य लौकिक देवों मंे किंचित् भी नहीं पाया गया। ठीक ही है, अंधकार को नष्ट करनेवाली जैसी ज्योति सूर्य के पास है वैसी ज्योति टिमटिमाते हुए तारागणों के पास कहाँ से हो सकती है!

इह विधि वृष उपदेश समय, तुव समवसरन के माहीं।
भई विभूति अपूरब हे जिन, सो औरन के नाहीं।
जैसी प्रभा देखियतु रवि में, तेजवती तमहारी।
तैसी उडुगणमाहिं कहाँ दुति, जदपि प्रकाशनवारी।।३७।।

O Jinendra! the Exuberant erudition manifested by you during the course of Religious Preachings was never attained by any body else. The dazzling radiance perceptible in the Sun is capable of destroying the darkness, when radiance can never be obtained by a cluster of shining planets or stars.

अभय प्रदाता
(उन्मत्त हस्ति-भय-भंजक)
श्च्योतन्मदाविलविलोलकपोल मूल-
मत्तभ्रमद् भ्रमरनादविवृद्धकोपम्।
ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं,
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानां।।३८।।

पदच्छेद - श्च्योतन् मद-आविल विलोल कपोलमूल, मत्त भ्रमद् भ्रमर-नाद विवृद्ध कोपम्, ऐरावताभम् इभम् उद्धतम् आपतन्तम्, दृष्टवा भयम् भवति नः भवत्-आश्रितानाम्।

शब्दार्थ - श्च्योतन् = झरते हुए, मद = मधु, आविल = मलीन, विलोल = चंचल, कपोलमूल = गाल का अग्रभाग। मत्त = मस्त, भ्रमद् = घूमते हुए, भ्रमर = भँवरा, नाद = शब्द गुंजार, विवृद्ध = बढ़े हुए, कोपम् = क्रोध। ऐरावताभम् = ऐरावत की तरह, इभम् = हाथी को, उद्धतम् = उदण्ड, आपतन्तम् = आकर पड़ते हुए। दृष्ट्वा = देखकर, भयम् = डर, भवति = होता है, नः = नहीं, भवत् = आपके, आश्रितानाम् = आश्रितों को।।३८।।

अन्वय - भवत् आश्रितानां श्च्योतत् मद आविल विलोल कपोलमूलम् मत्त भ्रमद् भ्रमरनाद विवृद्ध कोपम् ऐरावताभम् आपतन्तम् उद्धतम् इभम् दृष्ट्वा भयं नो भवति।

श्लोकार्थ- हे नाथ! झरते हुए मद से जिसके कपोलों के मूल भाग मलिन तथा चंचल हो रहे हैं और उन पर उन्मत्त होकर भ्रमण करते हुए भौंरे अपने शब्दों से जिसका क्रोध बढ़ा रहे हैं, ऐसे ऐरावत हाथी के समान आकारवाले तथा उद्धत अर्थात् अंकुश से भी बस में न आनेवाले हाथी को देखकर भी आपकी आस्था के आश्रय में रहनेवाले पुरुष उससे भयभीत नहीं होते। अर्थात् आपके शरणागत को मदोन्मत्त गजों से भी कोई भय नहीं।

मद-जल-मलिन विलोल कपोलन, -पै इत उत मँडराके।
कोप बढ़ायो जिंहिको अलिगन, अतिशय शोर मचाके।
ऐसेा उद्धत ऐरावतसम, गज जो सनमुख धावै।
तौ हू तुव पद-सेवक ताकों, देखि न नेकु डरावै।।३८।।

The devotees who have taken shelter in you are not terrified in the least when they see themselves attacked by the unruly and intoxicated huge elephant, (Airawat like-god Indra’s elephant) whose temples are restless and drenched on account of the constant dripping of ichor, who has been provoked by the excited humming bees flying near the frontal globes

अभय प्रदाता
(सिंहभय-निवारक)
भिन्नेभकुम्भगलदुज्जवलशोणिताक्त-
मुक्ताफलप्रकरभूषितभूमिभागः।
बद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि,
नाक्रामति क्रमयुगाचलसंश्रितं ते।।३९।।

पदच्छेद - भिन्न इभ-कुम्भ-गलत् उज्ज्वल शोणित-अक्त, मुक्ताफल प्रकर भूषित भूमि-भागः, बद्धक्रमः क्रमगतम् हरिण-अधिप-अपि, न आक्रामति क्रमयुग-अचल-संश्रितम् ते।

शब्दार्थ - भिन्न = विदीर्ण, इभ = हाथी, कुंभ = गण्डदेश, गलत् = भीगे हुए, उज्ज्वल = शुभ्र, शोणित = रक्त, अक्त = सने हुए। मुक्ताफल = मोती, प्रकर = समूह, भूषित = शोभायमान, भूमिभागः = पृथ्वीतल। बद्धक्रमः = आक्रमण करने के लिए प्रस्तुत, क्रमगतम् = पैरों के बीच आते हुए, हरिणाधिप = सिहं, अपि = भी। न = नहीं। आक्रामति = आक्रमण करता है, क्रमयुग = दोनों पैर, अचल = पहाड़, संश्रितम् = आश्रय लेनेवाले को, ते = आपके ।।३९।।

अन्वय - भिन्नेभकुम्भलदुज्ज्वलशोणिताक्त मुक्ताफल प्रकर भूषितभूमिभागः बद्धक्रमः हरिणाधिपः अपि क्रमगतं ते क्रमयुगाचलसंश्रितं न आक्रामति।

श्लोकार्थ- जिस बलिष्ठ सिंह ने मदोन्मत्त विशालकाय हाथियों के उन्नत गण्डस्थलों को अपने नुकीले नाखूनों से क्षत-विक्षत करके उनसे निकलनेवाले रुधिर से सने हुए गजमुक्ताओं से पृथ्वी को अलंकृत कर दिया हो, ऐसा अपने शिकार पर छलाँग भरकर आक्रमण करने के लिए उद्यत खूंखार शेर भी अपने पंजों में आये हुए आपके भक्त पर वार नहीं कर पाता। अर्थात् हिंसक शेर भी आपके भक्त के समक्ष अपनी नैसर्गिक क्रूरता को भी छोड़ देता है। आपका भक्त भयंकर सिंहों के भय से मुक्त रहता है।

जो मदमत्त गजनके उन्नत, कुंभ विदारि नखनसों।
सिंगारत भुवि रुधिरसुरजिंत, संुदर सित मुकतनसों।
भरी छलाँग हतनकहँ जिहिने, ऐसे खल मृगपतिके।
पंजनि परे बचैं तव-पद गिरि, -आश्रित जन शुभमतिके।।३९।।

The lion (king of the beasts) who has decorated a part of the ground with a lot of white pearls drenched in blood from the rent temples of elephants and has assumed a posture of aggression, cannot attack the man who has taken refuge at your mountain like feet, even though he has fallen into his clutches.

अभय प्रदाता
(अग्नि-भय-शामक)
कल्पांतकालपवनोद्धतवह्निकल्पं,
दावानलं ज्वलितमुज्जवलमुत्स्फुलिंगम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं,
त्वन्नामकीर्त्तनजलं शमयत्यशेषम्।।४॰।।

पदच्छेद - कल्पान्त-काल पवन-उद्धत वह्नि-कल्पम्, दावानलम् ज्वलितम् उज्ज्वलम् उत्स्फुलिंगम् विश्वम् जिघत्सुम् सम्मुखम् आपतन्तम्, त्वद् नाम-कीर्तन-जलम् शमयति अशेषम्।

शब्दार्थ - कल्पान्तकाल = प्रलयकाल, पवनोद्धत = वायु की प्रचण्डता से, वह्नि = अग्नि, कल्पम् = तुल्य। दावानलम् = वन की अग्नि को, ज्वलितम् = जलती हुई, उज्ज्वलम् = प्रकाशमान, उत्स्फुलिंगम = जिसमें से शिखा निकल रही है। विश्वम् = पृथ्वी को, जिघत्सुम् = भक्षण करने के इच्छुक को, इव = तरह, सम्मुखम् = सामने, आपतन्तम् = आती हुई। त्वद् = आपके, नाम = नामरूप, कीर्तन = गुणगान, जलम् = जल, शमयति = शांत करता है, अशेषम् = पूर्ण रूप से।।४॰।।

अन्वय - कल्पान्तकाल पवनोद्धत वह्निकल्पं ज्वलितम् उज्ज्वलम् उत्स्फुलिंगम् विश्वम् जिघत्सुम् इव सम्मुखं आपतन्तं दावानलं त्वन्नामकीर्तनजलं अशेषं शमयति।

श्लोकार्थ- जंगल में लगी हुई प्रचंड आग जो कि प्रलयकालीन तीव्र हवा के झोंकों से धधक रही है, जिसमें से चारों ओर चिंगारियाँ उड़-उड़कर फैल रही हैं तथा जो समस्त भूमण्डल को भस्मसात करती हुई-सी प्रतीत होती है, वह भी आपके पवित्र नाम-स्मरणरूपी जल से सर्वथा बुझ जाती है, शांत हो जाती है। अर्थात् आपका नाम-स्मरण जल का कार्य करता है। आपका भक्त अग्निभय से मुक्त रहता है।

प्रलय-पवन-प्रेरित-पावकसो, विस्तृत अधिक उतंगा।
प्रजुलित उज्ज्वल नभ में जिहिके, अगनित उड़त फुलिंगा।।
ऐसी प्रबल दवानल जो सब, जगत भस्म करि डारै।
सो हू तुव गुन-गान-नीरसों, सीतलता विसतारै।।४॰।।

The furious forest conflagration like the intense fire moving ahead infuriated by the violent storms of the tempests of Destruction, tossing up sparks and blazing up in flames, spreading swiftly as if intent to reduce the universe to cinder, is quickly quietened totally by the water of your laudation.

अभय प्रदाता
(सर्प-भय-दमनक)
रक्तेक्षणं समदकोकिलकण्ठनीलं,
क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम्।
आक्रामति क्रमयुगेण निरस्तशंक-
स्त्वन्नामनागदमनी हृदियस्य पुंसः।।४१।।

पदच्छेद - रक्त ईक्षणम् समद कोकिल कण्ठनीलम्, क्रोध उद्धतम् फणिनम् उत्फणम् आपतन्तम्, आक्रामति क्रमयुगेन निरस्त शंकः, त्वद् नाम नागदमनी हृदि यस्य पुंसः।

शब्दार्थ - रक्त = लालवर्ण, ईक्षणम् = आँखवाले को, समद = मदसहित, कोकिल = कोयल, कण्ठनीलम् = नीलकण्ठ को। क्रोध = राग, उद्धतम् = प्रचंड को, फणिनम् = सर्प को, उत्फणम् = फण ऊपर उठाये हुए, आपतन्तम् = सामने आनेवाले। आक्रामति = लाँघ जाता है, क्रमयुगेण = दोनों पैरों द्वारा, निरस्त = रहित, शंकः = शंका, भय। त्वद् = आपके, नाम = नामरूपी, नागदमनी = साँप को वश में करनेवाली विद्या, हृदि = हृदय में, यस्य = जिसके, पुंसः = पुरुष के।।४१।।

अन्वय - यस्य पुंसः हृदि त्वत् नाम-नागदमनी निरस्तशंकः रक्तेक्षणम् समद कोकिल-कण्ठनीलम् क्रोधोद्धतम् उत्फणम् आपतन्तम् फणिनम् क्रमयुगेन आक्रामति।

श्लोकार्थ- जिस पुरुष के हृदय में आपके नाम की नाग-दमनी जड़ी है वह पुरुष लाल नेत्रवाले, मदोन्मŸा, कोयल के कण्ठ के समान काले, क्रोध से उद्यत और फण उठाये हुए, डसने के लिए झपटते हुए साँप को भी निडर होकर अपने पैरों से लाँघ जाता है। अर्थात् आपका भक्त सर्प-भय से मुक्त रहता है। 

The man who possesses the Nagdamani (Asparagus Plant) of your name rooted in his heart, fearlessly treads over the most poisonous red eye serpent as back as the neck of intoxicated Cuckoo, and indignant with rage ready to sting with its hood raised.

अभय प्रदाता
(परचक्र - भयनिवारक)
वल्गत्तुरंग-गजगर्जित भीमनाद-
माजौ बलं बलवतामपि भूपतीनां।
उद्यद्दिवाकर-मयूखशिखापविद्धं,
त्वत्कीर्त्तनात्तम इवाशुभिदामुपैति।।४२।।

पदच्छेद - वल्गत् तुरंग गज-गर्जित भीमनादम्, आजौ बलम् बलवताम् अपि भूपतीनाम्, उद्यत् दिवाकर शिखा अपविद्धम्, त्वत् कीर्त्तनात् तमः इव आशु भिदाम् उपैति।

शब्दार्थ - वल्गत् = उछलते हुए, तुरंग = घोडे़, गजगर्जित = हाथी की गर्जना, भीमनादं = भयंकर शब्द। आजौ = युद्ध में, बलम् = शक्ति, सेना, बलवताम् = शक्तिवान को, अपि = भी, भूपतीनाम् = राजाओं के। उद्यत् = उगते हुए, दिवाकर = सूर्य, मयूखशिखा = किरणों को अग्रभाग, अपविद्धम् = बेधे गये। त्वत् = आपके, कीर्त्तनात् = यशोगान से, तमः = अंधकार, इव = तरह, आशु = शीघ्र, भिदाम् = विनाश को, उपैति = प्राप्त होती है।।४२।।

अन्वय - त्वतकीर्तनात् आजौ वल्गत् तुरंग गजगर्जित भीमनादम् बलवताम् अपि भूपतीनाम् बलम् उद्यत् दिवाकर-मयूख शिखापविद्धम् तं इव आशु भिदामुपैति।

श्लोकार्थ- ऐसे भीषण रणक्षेत्र में, जहाँ घोड़े उछल-उछल कर हिनहिना रहे हों, विशाल हाथी भयंकर चिंघाड़ रहे हों, शत्रुपक्ष के राजाओं की सेना अत्यंत शक्तिशाली और अपराजेय हो तो वह भी आपके नाम-स्मरण से तुरंत छिन्न-भिन्न हो जाती है, शीघ्र नष्ट हो जाती है, मानो उदित होता हुआ सूर्य अपनी प्रखर किरणों की नोकों से अँधेरे को छिन्न-भिन्न कर रहा हो। अर्थात् आपका भक्त शत्रु-भय से मुक्त हो जाता है।

हय गय हजारों लरत, करत अपार नाद भयावने।
अस बिकट सैन बली नृपनिकी, जम रही हो सामने।
सो तुरत तुव गुन-गानसों, संग्राममें नशि जात है।
ज्यों उदित दिनपतिके करनसों, तमसमूह विलात है।।४२।।

By praising you the powerful armies of the warrier kings, in a battle resounding with the noise of galloping horses and trumpeting elephants, are instantaneously vanquished like the dispersion of the thick nocturnal darkenss by the rays of the rising Sup.

विजय-विधाता
कुन्ताग्रभिन्नशोणितवारिवाह-
वेगावतार-तरणातुर-योधभीमे।
युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षा-
स्त्वत्पादपंकजवनश्रियिणो लभन्ते।।४३।।

पदच्छेद - कुन्ताग्र भिन्न गज शोणित वारिवाह, वेग अवतार तरण आतुर योधभीमे युद्धे जयम् विजित दुर्जय जेय पक्षाः, त्वद् पाद पंकज वन आश्रयिनः लभन्ते।

शब्दार्थ - कुन्ताग्र = भालों का अग्रभाग, भिन्न = क्षत, गज = हाथी, शोणित = रक्त, वारिवाह = पानी की धारा। वेग = गति, अवतार = उतरना, तरण = पार होना, आतुर = व्याकुल, योधभीमे = योद्धाओं के द्वारा। युद्धे = लड़ाई में, जयम् = जीत, विजित = जीते हुए, दुर्जय = जिसे जीतना कष्टप्रद है, जेय = जीतने योग्य, पक्षाः = दल। त्वद् = आपके, पाद = चरण, पंकज = कमल, वन = वन, आश्रयिनः = आश्रय लेनेवाले, लभन्ते = पाते हैं।।४३।।

अन्वय - त्वत्पाद-पंकज-वनाश्रयिणो कुन्ताग्र भिन्न गज-शोणित-वारिवाह वेगावतार-तरण-आतुर योध भीमे युद्धे विजित-दुर्जय-जेय-पक्षाः जयं लभन्ते।

श्लोकार्थ- हे देव ! बरछी की नोकों से छिन्न-भिन्न हुए हाथियों के रक्त क प्रवाह के वेग में उतरने और उसे तैरने के लिए आतुर हुए योद्धाओं से जो भयानक हो रहा है, ऐसे युद्ध में आपके चरणकमल-वन का आश्रय लेनेवाले पुरुष नहीं जीते जा सकनेवाले शत्रुपक्ष को भी जीतते हुए विजय को प्राप्त करते हैं। अर्थात् आपका भक्त सर्वत्र विजयश्री प्राप्त करता है।

बरछीनसों छिदि गजनके सिर, जहँ रुधिर-धारा बहैं।
परि बेगमें तिनके, तरनकों, वीर बहु आतर रहैं।
ऐसी बिकट रनभूमि में, दुर्जय अरिनपै जय लहै।
तुव चरन-पंकज-वन मनोहर, जो सदा सेवत रहै।।४३।।

In the fierce battle in which the warriors are struggling to swim the streams of blood gushing out of the elephants rent up by the lancepoints, those having sought refuge in the forest of your locus like feet, emerge victorious vanquishing even those unconquerable.

भव-सागर-तारक
अम्भोनिधौ क्षुभितभीषणनक्रचक्र-
पाठीनपीठभयदोल्वणवाडवाग्नौ।
रंगतरंगशिखरस्थितयानपात्रा-
स्त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद्व्रजन्ति।।४४।।

पदच्छेद - अम्भोनिधौ क्षुभित भीषण नक्रचक्र, पाठीनपीठ भय-दोल्वण वाडवाग्नौ, रंगत् तरंग शिखरस्थित यानपात्राः त्रासम् विहाय भवतः स्मरणात् व्रजन्ति।

शब्दार्थ - अम्भोनिधौ = सागर में, क्षुभित = क्षोभयुक्त, भीषण = भयंकर, नक्र-चक्र = मगर-समूह। पाठीनपीठ = मछलियाँ, भयदोल्वण = भय पैदा करने वाले, विकराल, वाडवाग्नौ = बड़वानल में। रंगत् = चंचल, तरंग = लहर, शिखरस्थित = अग्रभाग में स्थित, यानपात्राः = जहाज। त्रासम् = भय को, विहाय = छोड़कर, भवतः = आपके, स्मरणात् = स्मरण से, व्रजन्ति = गमन करता है।।४४।।

अन्वय - भीषण-नक्र-चक्र-पाठीन, पीठ क्षुभित अम्भौनिधिौ भय-दोल्वण-वाड़वाग्नौ रंगतरंग-शिखर, स्थित यानपात्राः भवतः स्मरणाद् त्रासं विहाय व्रजन्ति।

श्लोकार्थ- भीषण मगरों, घडियालों, विशाल मछलियों तथा भयंकर वड़वाग्नि से आन्दोलित समुद्र की उछतली हुई तरंगों पर जिन पुरुषों के जहाज पड़े हैं वे पुरुष आपके स्मरणमात्र से उस समुद्र से बिना किसी भय के पार हो जाते हैं। अर्थात् आपका भक्त जल-भय से मुक्त हो जाता है।

जो ह्वै रह्मो भीषण मगमच्छादिकनसों, क्षुभित है।
विकराल बडवानल भयंकर, सदा जिहि में जलत है।
अस जलधि की लहरीनिमें, जिनकी जहाजें डगमगैं।
तुव नाम सुमरत हे जगतपति, ते तुरत तीरे लगैं।।४४।।

Persons seated in the ships staggering on the summits of the impetuous waves of the ocean infested with the terrible crocodiles, alligators, whales and peesh aquadits etc. and by the dreadful submarine fire, sail to the shore fearlessly by contemplating name.

रोगहारी, नीरोगकारी
उद्भूतभीषणजलोदरभारभुग्नाः
शोच्यां दशामुपगताश्च्युतजीविताशाः।
त्वत्पादपंकजरजोऽमृतदिग्धदेहा,
मत्र्या भवन्ति मकरध्वजतुल्यरूपाः।।४५।।

पदच्छेद - उद्भूत भीषण जलोदर भारभुग्नाः, शोच्याम् दशाम् उपगताः च्युत जीविताशाः, त्वद् पादपंकज रजः अमृत दिग्ध देहाः मत्र्या भवन्ति मकरध्वज तुल्यरूपाः।

शब्दार्थ - उद्भूत = उत्पन्न, भीषण = भयंकर, जलोदर = उदर में जल भरने का रोग, भारभुग्नाः = भार से नत। शोच्याम् = शोचनीय, दशाम् = अवस्था को, उपगताः = प्राप्त, च्युत = विहीन, जीविताशाः = जीवन की आशा। त्वद् = आपके, पादपंकज = चरण-कमल, रजः = धूलि, अमृत = अमृत, दिग्ध = लिप्त, देहाः = शरीर, मत्र्या = मनुष्य, भवन्ति = होते हैं, मकरध्वज = कामदेव, तुल्यरूपाः = समान रूपवान।।४५।।

अन्वय - उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्नाः शोच्यां दशामुपगताः च्युत-जीविताशाः मत्र्या त्वत्पादपंकज रजोमृत दिग्ध देहा मकरध्वज तुल्यरूपाः भवन्ति।

श्लोकार्थ- जिन मनुष्यों को अत्यंत भयंकर जलोदर रोग उत्पन्न हो गया हो, उसके भार से जिनकी कमर टेढ़ी हो गई हो, जो अत्यंत शोचनीय दशा प्राप्तकर जीने की आशा छोड़ चुके हों, वे यदि आपके चरणकमलों की रज से अपने को आच्छादित कर लेते हैं अर्थात् आपकी भक्ति करते हैं तो वे सचमुच ही रोग-मुक्त होकर कामदेव के समान रूपवान बन जाते हैं।

भीषण जलोदर-भारसां, कटि बंक जिनकी ह्वै गई।
अति सोचनीय दसा भई, आसा जियनकी तज दई।
ते मनुज तुव पद-कंज-रज, -रूपी सुधा-अभिरामसे।
निज तन परसि होवहिं अनूप, सुरूपवारे कामसे।।४५।।

Persons, bent down under the weight of horribly swollen dropsy, having reached a precarious stage and have lost of survival are also cured and transformed into hand-someness like that of God Cupid by anointing the nectar of the pollen of your lotus like feet.

बंध-विमोचक
आपादकंठमुरु-श्रृंखलवेष्टितांगा,
गाढं वृहन्निगड़कोटिनिघृष्टजंघाः।
त्वन्नाममंत्रमनिशं मनुजाः स्मरंतः,
सद्यः स्वयं विगतबंधभया भवन्ति।।४६।।

पदच्छेद - आपाद कण्ठम् उरु श्रृंखल वेष्टिता अंगा, गाढं वृहत् निगड कोटि निघृष्ट जंघाः, त्वद् नाममन्त्रम् अनिशम् मनुजाः स्मरन्तः, सद्यः स्वयं विगत बंधभयाः भवन्ति।

शब्दार्थ - आपाद = पाँव से लेकर, कण्ठमुरु = उरु के कण्ठपर्यन्त, श्रृंखल = साँकल, वेटित = जकड़ा हुआ, अंगाः = शरीर। गाढ़म् = गंभीर रूप में, वृहत् = बड़ी, निगड़ = बेड़ी, कोटि = करोड़़ों, निघृष्ट = घिसा हुआ, जंघाः = जाँघ। त्वद् = आपके, नाममन्त्रम् = नाम के मंत्र से, अनिशम् = निरंतर, मनुजाः = मनुष्य, स्मरंत = ध्यान करता हुआ। सद्यः = शीघ्र, स्वयम् = स्वतः, विगत = रहित, बन्धभया = बन्ध-भय से, भवन्ति = होते हैं।।४६।।

अन्वय - आपाद् कण्ठम् उरु श्रंखलवेष्टितांगा गाढ़म् बृहन्निगड़ कोटि निघृष्ट जंघा मनुजा त्वन्नाममन्त्रम् अनिशम् स्मरन्तः सद्यः स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति।

श्लोकार्थ- जिनका शरीर नीचे से ऊपर अर्थात् पाँव से कण्ठ तक बड़ी-बड़ी साँकलों से जकड़ दिया गया हो, मजबूत लोहे की जंजीरों की नोकों से रगड़-रगड़कर जिनकी जंघाएँ बुरी तरह छिल गई हों, ऐसे कारागार में बंदी, परवश पुरुष आपके नामरूपी मंत्र का निरंतर स्मरण करने से तुरंत बंधन के भय से स्वयमेव छूट जाते हैं, मुक्त हो जाते हैं।

गुरु सांकलनसों चरनतें ले, कण्ठलगि जो कसि रहे।
गाढी बड़ी बेड़ीन सों, जिनके जघन-तट घसि रहे।
ते पुरुष प्रभु, तुव नामरूपी, मंत्र को जपिकै सदा।
तत्काल बंधन भयरहित स्वयमेव ही होवहिं मुदा।।४६।।

Persons who are always kept cordoned by strong Iron Chains right from the ankle to the neck, whose thighs have been badly bruised by the friction of the corners of big shackles, get themselves rid of them immediately and have no fear of confinement by incessantly (day and night) reciting your name, which takes the shape of a kind of incantation.

भयत्राता
मत्तद्विपेन्दमृगराजदवानलाहि-
संग्रामवारिधिमहोदरबंधनोत्त्थं।
तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते।।४७।।

पदच्छेद - मत्त द्विपेन्द्र मृगराज दवानलज अहि, संग्राम वारिधि महोदर बंधन उत्थम्, तस्य आशु नाशम् उपयाति भयम् भिया इव यः तावकम् स्तवम् इमम् मतिमान् अधीते।

शब्दार्थ - मत्त = उन्मत्त, द्विपेन्द्र = हाथी, मृगराज = सिंह, दवानल = वनाग्नि, अहि = साँप। संग्राम = युद्ध, वारिधि = सागर, महोदर = जलोदर रोग, बंधन = बन्दीपना, उत्थम् = उत्पन्न हुआ। तस्य = उसका, आशु = शीघ्र, नाशम् = विनाश, उपयाति = प्राप्त होता है, भयम् = डर, भिया = भय से, इव = ही। यः = जो, तावकम् = आपके, स्तवम् = स्तुति, इमम् = इस, मतिमान = बुद्धिमान्, अधीते = पाठ करता।।४७।।

अन्वय - यः मतिमान् इमं तावकं स्तव अधीते मस्य मत्तद्विपेन्द्र-मृगराज-दवानल-अहि-संग्राम-वारिधि-महोदर-बंधनोत्थम् भयं भिया इव आशु नाशं उपयाति।

श्लोकार्थ- इस प्रकार जो विवेकशील, बुद्धिमान, प्रज्ञावान भद्रपुरुष आपके इस परम पवित्र स्तोत्र का अनवरत श्रद्धासहित चिन्तवन, अध्ययन, आराधन और मनन करते हैं उनके मदोन्मत्त हाथी, विकराल सिंह, भभकता दावानल, भयंकर सर्प, वीभत्स संग्राम, विक्षुब्ध समुद्र, कष्ट-साध्य जलोदर और बंधनजनित भय भी स्वयं भयाकुल होकर शीघ्र नष्ट हो जाते हैं तथा आपके भक्तजनों की ओर लौटकर वार नहीं करते। अर्थात् भय स्वयं आपके भक्त से भयभीत होकर दूर हो जाता है।

मदमत्त गज मृगराज दावानल समुद्र अपारको।
संग्राम साँप तथा जलोदर, कठिन कारागारको-।
भय, स्वयं भयकरि भागि जावै तुरत ताको, नेमसों।
यह आपकी विरदावली, बाँचै सुधी जो प्रेमसों।।४७।।

The wise man who recites this Panegyric of you has found that this fear arising out of intoxicated elephant, lion, fire, serpent, battle, ocean, dropsy and bonds suddenly vanish away as if it (fear) were being frightened.

सर्वसिद्धिदायक स्तुति
स्तोत्रस्त्रजं तव जिनेन्द्र! गुणैर्निबद्धां,
भक्त्या मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पां।
धत्ते जनो य इह कंठगतामजस्त्रं,
तं मानतुंगवशा समुपैति लक्ष्मीः।।४८।।

पदच्छेद - स्तोत्र स्रजम् तव जिनेन्द्र गुणैः निबद्धाम्, भक्त्या मया रुचिर वर्ण विचित्र पुष्पाम्, धत्ते जनः य इह कण्ठगताम् अजसं तं मानतुंगम् अवशा समुपैति लक्ष्मीः।

शब्दार्थ - स्तोत्र = स्तुति, स्रजम् = सृजन करना, तव = आपका, जिनेन्द्र = हे जिनदेव, गुणैः = गुणों के द्वारा, निबद्धाम् = गूँथी हुई। भक्त्या = भक्ति द्वारा, मया = मेरे द्वारा, रुचिर = सुंदर, वर्ण = रंग, अक्षर, विचित्र = मनोहर, पुष्पाम् = फूलों के। धत्ते= कारण करता है, जनः = मनुष्य, इह = इस संसार में, कण्ठगताम् = कण्ठस्थ, अजस्त्रम् = निरंतर। तं = उस, मानतुंगम् = मानतुंगाचार्य को, अवशा = विवश होती हुई, समुपैति = प्राप्त होती है, लक्ष्मी = धन की देवी।।४८।।

अन्वय - जिनेन्द्र इह मया भक्त्या गुणैः निबद्धां रुचिर- (विविध) वर्ण-विचित्रपुष्पाम् कण्ठगताम् तव स्तोत्रस्रजं यः (जनः) अजस्रं धत्तेतं मानतुंग लक्ष्मीः अवशा समुपैति।

श्लोकार्थ- जैसे सुंदर नयनाभिराम रंग-बिरंगे फूलों का हार कण्ठ में धारण करने से मनुष्य शोभायमान होता है, वैसे ही प्रभावशाली स्तोत्ररूपी माला को (पहिरने से) कण्ठस्थ करने से वह जगत के ऊँचे से ऊँचे सम्मान को प्राप्त होता है और उसे राज्य, स्वर्ग, सम्पदा आदि अभ्युदय और मोक्षरूपी लक्ष्मी आदि निःश्रेयस की प्राप्ति स्वयमेव होती है।

हा गूँथि लायो विरदमाला, नाथ तुव गुन-गनन सों।
बहु भक्तिपूरित रुचिर वरन, विचित्र सुंदर सुमन सौं।
यासों सदा सौभाग्यजुत, जो मनुज कण्ठ सिंगारि है।
तिस ‘मानतुंग‘ सुपुरुष को, कमला विवश उर धारि है।।४८।।

O Lord! in the world the goddess of Prosperity (wealth, dignity, heavens and salvation) will be impelled to approach the person who always wears round his neck (keeps his heart) this garland of the Eulogy composed by (Acharya) Mantung Preceptor in the elegant style of your innumerable virtues (infinite knowledge etc.) and interwoven in multifarious flowers of varied and attractive (alliterations, pun, etc.) hues.