|| श्लोक-काव्य : 17-32 ||
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असीम-अबाध उजास

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्यः,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्जगन्ति।
नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महाप्रभावः,
सूर्यातिशायि महिमाऽसि मुनीन्द्र लोके।।१७।।

पदच्छेद - नास्तम् (न अस्तम्) कदाचित् उपयासि न राहुगम्यः, स्पष्टीकरोषि सहसा युगपत् जगन्ति, न अम्भेधर उदर निरुद्ध महाप्रभावः, सूर्यं अतिशायि महिमा असि मुनीन्द्र लोके।

शब्दार्थ - न = नहीं, अस्तम् = अस्त दशा को, कदाचित् = कभी, उपयासि = प्राप्त होते हो, न = नहीं, राहुगम्यः = राहु के द्वारा ग्रस्त होने योग्य। स्पष्टीकरोषि = प्रकाशित करते हो, सहसा = शीघ्र ही, युगपत् = एकसाथ, जगन्ति = तीनलोक को। न = नहीं, अम्भोधर = जलधर, मेघ, उदर = गर्भ, निरुद्ध = छिपा हुआ, महाप्रभावः = महान् तेजशाली। सूर्य = सूरज, अतिशायि = अतिक्रम करनेवाली, महिमा = प्रभाव, असि = हो, मुनीन्द्र = मुनिराज, लोके = जगत में।।१७।।

अन्वय - मुनीन्द्र लोके सूर्यातिशायिमहिमा असि न कदाचित् अस्तं उपयासि न राहुगम्यः न अम्भोधर-उदरनिरुद्ध-महाप्रभावः सहसा जगन्ति युगपत्।

श्लोकार्थ- हे देव! आपके सूर्य की उपमा भी नहीं दी जा सकती, क्योंकि सूर्य सन्ध्या को अस्त हो जाता है, आप सदाकाल प्रकाशित रहते हैं। सूर्य एक जम्बूद्वीप को ही प्रकाशित करता है, आप तीन जगत के सम्पूर्ण पदार्थों को प्रकाशित करते हैं। सूर्य राहु के द्वारा ग्रस लिया जाता है, उसका प्रताप मेघ द्वारा ढक लिया जाता है, उसका प्रकाश कंदरा-गुफाओं को प्रकाशित नहीं कर पाता परंतु आपको न कोई राहु ग्रस्त कर पाता, न कोई आपके ज्ञानगुण को ढक सकता-इस प्रकार आपकी महिमा सूर्य से भी अधिक अतिशयवाली है।

क्षिति तैं छुपत नहिं छिनहु, छाया राहु की नहिं परत है।
तिहुँ जगत को जुगपत सहज ही, जो प्रकाशित करत है।
धारा धरन के उदर में परि, जिहि प्रभाव न घटत है।
यों मुनिष, तव महिमा जगत में, भानुहू तैं महत है।।१७।।

As You never set, you are neither affected by the Rahu (eclipse), nor your supernatural grandeur ever overshadowed by the cumulous of the clouds and as you simultaneously enlighten the entire universe, you, therefore, O Supreme Sage! excel the grandeur of the Sun.

प्रशांत प्रकाशक
नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,
गम्यं न राहुवदनस्य न-वारिदानाम्।
विभ्राजते तव मुखाब्जमनल्पकान्ति,
विद्योतयज्जगदपूर्व- शशांक-बिम्बम्।।१८।।

पदच्छेद - नित्य उदयम् दलित मोह-महा-अन्धकारम्, गम्यम् न राहु-वदनस्य न वारिदानाम्, विभ्राजते तव मुख-आब्जम् अनल्प-कान्ति, विद्योतयत् जगत् अपूर्व शशांक-बिम्बम्।

शब्दार्थ - नित्य = सतत्, चिरकाल तक, उदयम् = उदित रहने वाला, दलित = नष्ट, मोह-महान्धकारम् = मोहरूपी गहन अन्धकार को। गम्यम् = ग्रसने के योग्य, न = नहीं, राहुवदनस्य = राहु के मुख के, न = नहीं, वारिदानाम् = मेघों के द्वारा। विभ्राजते = शोभित होता है, तव = आपका, मुखाब्जम् = मुख-कमल-रूपी, अनल्पकान्ति = अधिक सुन्दरतावाला, विद्योतयत् = प्रकाशित करनेवाला, जगत = संसार को, अपूर्व = जैसा पूर्व मंे कहीं नहीं हुआ, शशांकबिम्बम् = चनद्रमण्डल को।।१८।।

अन्वय - तव मुखाब्जम् नित्योदयं दलितमोहं महान्धकारं अनल्पकांति न राहुवदनस्य गम्यं न वारिदानां, जगत विद्योतयत् अपूर्वशंशाक बिम्बं विभ्राजते।

श्लोकार्थ- हे जिनेन्द्र! आपका मुख चन्द्रमा से भी अधिक विलक्षण है। चन्द्रमा तो केवल रात्रि में ही उदित होता है परंतु आपका मुख सदा ही उदयरूप होता है। चन्द्रमा साधारण अंधकार का नाश करता है परंतु आपका मुख मोहरूपी अज्ञान के अंधकार का नाश करता है। चन्द्रमा को राहु ग्रस लेता है, बादल अपनी ओट में छिपा लेता है परंतु आपको ग्रसनेवाला-ढकनेवाला कोई भी नहीं है। चन्द्रमा पृथ्वी के एक भाग को ही प्रकाशित करता है पर आपका मुख तीन जगत को प्रकाशित करता है। चन्द्रमा की कान्ति कृष्णपक्ष में घट जाती है पर आपके मुख की कांति सदा समानरूपी से देदीप्यमान रहती है।

जो उदयरूप रहे सदा, पुनि मोह-तम को हनत है।
मुख राहु के न परै कबहुँ, वारिद न जिहि को ढकत है।
हे नाथ, सो मुख-कमल तुव, धारत प्रकाश अमंद है।
सोहत जगत-उद्योतकारी, अति अपूरब चंद है।।१८।।

O Lord! your splendent lotus-like face which always remain risen, has destroyed the darkness of delusion, can never be affected by the Rahu nor shadowed by the clouds, and which has always illuminated the Universe, shines like the disc of a singular and peerless Moon.

निष्प्रभ-निष्प्रयोज्य सूर्य-चन्द्र
किं शर्वरीषु शशिनाऽह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तमः सु नाथ।
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनि जीवलोके,
कार्यं कियज्जलधरैर्जलभार-नम्रैः।।१९।।

पदच्छेद - किं शर्वरीषु शशिना-अह्नि विवस्वता-वा, युष्मन् मुखेन्दु दलितेषु, तमः सु नाथ, निष्पन्न शालिवन शालिनि जीवलोके, कार्यम् कियत् जलधरैः जलभार-नमै्रः।

शब्दार्थ - जिस प्रकार पके हुए धान्यवाले खेत में वर्षा की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, वहाँ बादलों का बरसना व्यर्थ व हानिप्रद होता है उसी प्रकार जहाँ आपके मुखरूपी चन्द्रमा से अज्ञानरूपी अंधकार का नाश हो चुका है वहाँ दिन में सूर्य की और रात में चन्द्रमा की क्या आवश्यकता रहती है!

हे नाथ, यदि तुव तमहरन वर, मुख मयंक अमंद है।
तो व्यर्थ ही सूरज दिवस में, और निशि में चंद है!
चहुँ ओर शोभित शालि के, बहु बनन सों जो हैव रहो।
तिहि देश में जलभरे मेघन सों, कहा कारज कहो।।१९।।

O Lord! when your moon-like face can destroy the darkness and illuminate the entire universe, there is no need of the Moon in the night and the Sun during the day, just as one wonders, of what use are the clouds heavy with the weight of water on the rice fields in the country after the Rice grains have ripened?

केवलज्ञान-ज्योतिधारी
ज्ञानं यथा त्वयि विभाति-कृतावकाशं,
नैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु।
तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्व,
नैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि।।२॰।।

पदच्छेद - ज्ञानम् यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं (कृत-अवकाशं), नैवं (न-एवं) तथा हरि-हर आदिषु नायकेषु, तेजः स्फुरन् याति यथा महत्वम्, नैवं तु काच-शकले किरणाकुले अपि।

शब्दार्थ - ज्ञानम् = ज्ञान, यथा = जिस प्रकार, त्वयि = आपमें, विभाति = शोभायमान होता है, प्रकाशित होता है, कृत = प्राप्त, अवकाशम् = स्थान, अवसर को। न = नहीं, एवं तथा = उस प्रकार, हरिहरादिषु = विष्णु-शंकर आदि, नायकेषु = देवों में। तेजः = तेज, प्रकाश, स्फुरत् = चमकते हुए, मणिषु = मणियों में, याति = प्राप्त होता है, यथा = जैसे, महत्वम् = महत्व को। न = नहीं, एवं = वैसे, तु = निश्चय से, काचशकले = काँच के टुकड़े में, किरणाकुले = किरणों से व्याप्त, अपि = भी।।२॰।।

अन्वय - कृतावकाशं ज्ञानं यथा त्वयि विभाति तथा हरिहरादिषु नायकेषु नैव स्फुरन्मणिषु तेजः यथा महत्व याति किरणाकुले अपि काचशकले तु न एवम्।

श्लोकार्थ- जैसा तेज (प्रकाश) महारत्नों में प्रकाशित होता है वैसा तेज (प्रकाश) काँच के टुकड़ों में सूर्य-किरणों के समूह के होने पर भी नहीं होता इसी प्रकार हे भगवन्! अवसर (स्थान) पाकर ज्ञान जिस प्रकार आपमें शोभायमान है उस प्रकार अन्य देवों में नहीं है। अर्थात् जैसा स्व-पर-प्रकाशक ज्ञान आप में है वैसा स्व-पर प्रकाशक ज्ञान अन्य देवों में नहीं पाया जाता।

जो स्व-पर-भावप्रकाशकारी, ज्ञान तुममें लसत है।
सो हरिहरादिक नायकों में, नाहि किंचित दिसत है।
जैसो प्रकाश महान मणि में, महतता को लहत है।
तैसो न कबहुँ कांतिजुत हू, काच में लख परत है।।२॰।।

Just as the magnificence of the light of the glittering jewels cannot be procured by a piece of glass even abounding in the rays of the Sun, so also omniscience (that throws light on the various phenomena of any subject) having found accommodation in you, glows with such splendor that it is not perceptible in other gods like Hari, Har etc.

अद्भुत वीतरागता
मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्यः,
कश्चिन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि।।२१।।

पदच्छेद - मन्ये वरम् हरि-हरादयः एव दृष्टाः, दृष्टेषु येषु हृदयम् त्वयि तोषम् एति, किम् वीक्षितेन भवता भुवि येन न अन्यः, कश्चित् मनः हरति नाथ भवान्तरे अपि।

शब्दार्थ - मन्ये = मैं मानता हूँ, वरम् = श्रेष्ठ, हरिहरादय = विष्णु-महादेव आदि देव, एव = ही, दृष्टा = देखे गये। दृष्टेषु = देखे जाने पर, येषु = जिनके, हृदयम् = मन, चित्त, त्वयि = आपके सम्बंध में, तोषम् = संतोष को, एति = प्राप्त होता है। किम् = क्या प्रयोजन है, वीक्षितेन = देखने से, भवता = आपसे, भुवि = पृथ्वी पर, येन = जिससे, न = नहीं, अन्यः = दूसरा कोई। कश्चित् = कोई भी, मनः = चित्त को, हरति = हरण करता है, नाथ = स्वामी, भवान्तरे = दूसरे भव में, जन्म में, अपि = भी।।२१।।

अन्वय - नाथ! मन्ये हरिहरादयः दृष्टा एव वरं येषु दृष्टेषु हृदयं त्वयि तोषं एति भवता वीक्षितेन किं येन भुवि अन्यः कश्चित् भवान्तरे अपि मनः न हरति।

श्लोकार्थ- मैं इस बात को अच्छा मानता हूँ कि मैंने अन्य देवों को पहले देख लिया। उन्हें देखने के बाद आपके वीतराग रूप को देखा तो उससे चित्त को परम संतोष मिला। अब अन्य देवों को देखने का कोई प्रयोजन नहीं रहा। आपकी वीतरागता देखने के बाद अब तो अन्य जन्मों में भी मेरा मन अन्यत्र संतुष्ट नहीं हो सकता, वह केवल आपके (वीतराग के) दर्शन से ही संतुष्ट व तृप्त होगा।

हरिहर आदिक देवन को ही, अवलोकन मोहि भावै।
जिनहिं निरखकर जिनवर, तुममें, हृदय तोष अति पावै।
पै कहा तुम दरसनसों भगवन्, जो इस जग के माहीं।
परभव में हू अन्य देव मन हरिवे समरथ नाहीं।।२१।।

O Lord! I consider it better that I have seen Hari, Har and other gods first, because after seeing them my heart finds satisfaction in you. What good is to look at your first? After seeing you, there is no other god to captivate my heart on the Earth even in the future births.

अद्भुत माता-अनुपम पुत्र
स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता।
सर्वाः दिशो दधति भानि सहस्त्ररश्मिं,
प्राच्येव दिग् जनयति स्फुरदंशुजालम्।।२२।।

पदच्छेद - स्त्रीणाम् शतानि शतशः जनयन्ति पुत्रान्, न अन्य सुतं त्वदुपम् (त्वत् उपम्) जननी प्रसूता, सर्वाः दिशः दधति भानी सहस्र-रश्मिम्, प्राचो एव दिक् जनयति स्फुरत् अंशुजालम्।

शब्दार्थ - स्त्रीणाम् = स्त्रियों के, शतानि = सैकड़ांे, शतशः = सैकड़ों, जनयन्ति = पैदा करती हैं, जन्म देती हैं, पुत्रान् = पुत्रों को। न = नहीं, अन्य = दूसरा, सुतम् = पुत्र को, त्वदुपम् = आप जैसा, जननी = माता, प्रसूता = जन्म देनेवाली। सर्वाः = सकल, सब, दिशः = दिशाएँ, दधति = धारण करती हैं, भानी = तारागणों को, सहस्त्ररश्मिम् = सूर्य को। प्राची = पूर्व दिशा, एव = ही, दिक् = दिशा, जनयति = प्रकट करती है, स्फुरत् = चमकता है, अंशुजालम् = किरणमाला।।२२।।

अन्वय - स्त्रीणां शतानि शतशः पुत्रान् जनयन्ति अन्या जननी त्वदुपमं सुतं न प्रसूता सर्वा दिशः भानि दधति प्राचीदिक् एव स्फुरत् अंशुजालं सहस्त्ररश्मिं जनयति।

श्लोकार्थ- इस जगतीतल में कोटि-कोटि माताएँ हुई हैं जिन्होंने समय-समय पर सैकड़ों पुत्रों को जन्म दिया है। किन्तु इस लोक में आप जैसे अद्वितीय पुत्र को जन्म देनेवाली अन्य माता आज तक दृष्टिगोचर ही नहीं हुई। सत्य है कि दीप्तिमान किरण समूहवाले सूर्य को जन्म देनेवाली तो केवल एक पूर्व दिशा ही है। शेष दिशाएँ तो टिमटिमाते नक्षत्रों को ही जन्म दिया करती हैं।

अहैं सैकड़ों सुभगा नारी, जो बहु सुत उपजावैं।
पै तुमसम सुपूत की जननी, यहाँ न और दिखावैं।
यद्यपि दिशि-विदिशाएँ सिगरी, धरैं नछत्र अनेका।
पै प्रतापि रवि को उपजावै, पूर्व दिशा ही एका।।२२।।

Hundreds of women give birth to sons hundreds of times, but no mother has given birth to a son like you. All the (eight) directions may hold the planets, but it is the East only which can produce the Sun with its cumulus of thousands of flashing rays.

मोक्षमार्ग-प्रणेता
त्वामामनन्ति मुनयः परमं पुमांस-
मादित्यवर्णममलं तमसः परस्तात्।
त्वामेव सम्यगुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्रपन्थाः।।२३।।

पदच्छेद - त्वाम् आमनन्ति मुनयः परमम् पुमांसम्, आदित्य-वर्णम् अमलम् तमसः पुरस्तात्, त्वाम् एव सम्यक् उपलभ्य जयन्ति मृत्युम्, न अन्यः शिवः शिव-पदस्य मुनीन्द्र-पंथाः।

शब्दार्थ - त्वाम् = आपको, आमनन्ति = मानते हैं, मुनयः = मुनिजन, परमम् = श्रेष्ठ, पुमांसम् = पुरुष को। आदित्य = सूर्य, वर्णम् = तरह, अमलम् = मलरहित, निर्मल, तमसः = अंधकार से, पुरस्तात् = दूर रहनेवाले। त्वाम् = आपको, एव = ही, सम्यक् = विशेष रूप से, उपलभ्यः = प्राप्त कर, जयन्ति = जीत लेते हैं, मृत्युम् = मरण को। न = नहीं, अन्यः = दूसरा, शिव = अच्छा, शिवपदस्य = मोक्ष का, मुनीद्रं = मुनियों मंे श्रेष्ठ, पंथा = रास्ता।।२३।।

अन्वय - मुनीन्द्र मुनयः त्वाम् आदित्यवर्णम् अमलं तमसः पुरस्तात् परमं पुमांसं आमनन्ति त्वाम् एव सम्यक् उपलभ्य मृत्युं जयन्ति शिवपदस्य अन्यः शिवः पन्थाः न।

श्लोकार्थ- साधु-मुनियों के समूह आपको परमपुरुष मानते हैं। आप राग-द्वेषरूपी मल से रहित हैं इसलिए आपको निर्मल मानते हैं। आप मोह-अंधकार का नाश करनेवाले हैं, इस कारण सूर्य के समान मानते हैं। आपको पाकर मृत्यु पर (जन्म-मरण पर) विजय पा लेते हैं इसलिए मृत्युंजय मानते हैं। मोक्ष का आपके अतिरिक्त अन्य कोई कल्याणकारी-निरूपद्रव मार्ग नहीं है इस कारण वे आपको ही मोक्ष का मार्ग मानते हैं।

हे मुनीश, मुनिजन तुमकहँ नित, परम पुरुष परमानैं।
अंधकार नाशन के कारन, निर्मल दिनकर जानैं।
तुम पाये तैं भलीभाँतिसों, नीच-मीच जय होई।
यासों तुमहिं छाँडि शिवपद-पथ, विघनरहित नंहिं कोई।।२३।।

O the best amongst the sages! The saints consider you the supreme being, the sun in having overcome the darkenss of ignorance, also hold you pure purged of impurities. They overcome Death after having duly obtained you. There is no other beneficial way to Bliss, tranquisty and salvation except through you.

अनन्तगुणसागर
त्वामव्ययं विभुमचिन्त्यमसंख्यमाद्यं,
ब्रह्याणमीश्वरमनन्तमनंगकेतुम्।
योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकं,
ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदन्ति सन्तः।।२४।।

पदच्छेद - त्वाम् अव्ययम् विभुम् अचिन्त्यम् असंख्यम्-आद्यम्, ब्रह्मााणम् ईश्वरम् अनन्तम् अनंग-केतुम्, योगीश्वरम् विंदितयोगम् अनेकम् एकम्, ज्ञान-स्वरूपम् अमलम् प्रवदन्ति सन्तः।

शब्दार्थ - त्वाम् = आपको, अव्ययम् = जिनका विनाश न हो, विभुम् = सर्वोपरि, समर्थ, अचिन्त्यम् = चिन्तन से परे, असंख्यम् = गणनारहित गुणवान्, आद्यम् = आदि। ब्रह्माणम् = शुद्धात्म, ईश्वरम् = आत्म ऐश्वर्य से पूर्ण, अनन्तम् = अनन्त गुणयुक्त, अनंगकेतुम् = काम को जीतनेवाला, कामजयी। योगीश्वरम् = योगियों में श्रेष्ठ, विदितयोगम् = योग के ज्ञाता, अनेकम् = बहु, एकम् = एक। ज्ञानस्वरूपम् = ज्ञानवान, ज्ञानमूर्ति, अमलं = निर्मल, प्रवदन्ति = कहते हैं, सन्तः = सज्जन पुरुष।।२४।।

अन्वय = सन्तः त्वाम् अव्ययं विभुं विभिन्न गुणों की अपेक्षा से अक्षय, अव्यय, सर्वोपरि, समर्थ, परम वैभव-सम्पन्न, वचन-अगोचर, गुणातीत, चतुर्विंशति तीर्थंकरों में आद्य स्मरणीय, ब्रह्मा, ईश्वर, अनन्त, अनंगकेतु, योगीश्वर, योगवेत्ता, अनेक, एक, ज्ञानस्वरूप, अमल आदि विविध सार्थक नामों से सम्बोधित करते हुए स्तुति करते हैं।

कहैं संतजन तोहि निरंतर, अखय अनंत अनूपा।
आद्य अचिंत्य असंख्य अमल विभु, केवलज्ञानस्वरूपा।
एक अनेक ब्रह्म परमेश्वर, कामकेतु योगीशा।
जेगरहित को जाननवारो, श्री जिनेन्द्र जगदीशा।।२५।।

The holy sages regard you as imperishable, majestic (the adobe of sterling merits, in comprehensible, innumerable, the first and Principal founder of Religion, the supreme self-immersed soul. Almighty of the three worlds (self-accomplished). Infinite (possessor of Infinite excellences), like a ketu in vanquishing the Cupid (Deity of sexual passions), the chief amongst the mediators, conversant with you (the science of self absorption and cessation of corporeal activities), multifarious (with regards to merits and properties), singular (with regards to substance) knowledge personified and free from all foreign matter (the dirt of mortal sins or karmas).

विविध विशेषणधारी
बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चितबुद्धिबोधात्,
त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रयशंकरत्वात्।
धाताऽसि धीर! शिवमार्गविधेर विधानात्,
व्यक्तं त्वमेव भगवन्-पुरुषोत्तमोऽसि।।२५।।

पदच्छेद - बुद्धः त्वमेव (त्वम् एव) विबुध-अर्चित बुद्धिबोधात्, त्वम् शंकरः असि भुवन-त्रय शंकरत्वात्, धातासि (धाता असि) धीर शिवमार्ग-विधेः विधानात् व्यक्तम् त्वम् एव भगवन् पुरुषोत्तमः असि।

शब्दार्थ - बुद्धः = बुद्ध, ज्ञानी, त्वम् = आप, एव = ही, विबुध = देव अथवा विद्वान द्वारा, अर्चित = पूजित, बुद्धिबोधात् = बुद्धिमान होने से। त्वम् = आप, शं-करः = शुभकारी, मंगलकारी, असि = हो, भुवनत्रय = तीन जगत, शंकरत्वात् = मंगल करने के कारण स्वरूप। धाता = पालन करनेवाले अर्थात् ब्रह्मा, असि = हैं, धीर = शांत, शिवमार्ग = मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग की, विधेः विधानात् = विधि के करने से, व्यक्तम् = स्पष्ट रूप से, त्वम् = आप, एव = ही, भगवन् = भगवान्, पुरुषोत्तमः = उत्तम पुरुष अर्थात् नारायण, असि = हो।।२५।।

अन्वय - विबुध-अर्चित-बुद्धिबोधात् त्वम् एव बुद्धः, त्वम् शंकरः असि भुवनत्रय-शंकरत्वात्, धीर शिवमार्गविधेः विधानात् धाता असि भगवन् त्वम् एव व्यक्तं पुरुषोत्तमः असि।

श्लोकार्थ- हे देवाधिदेव! आपसे बुद्धि (ज्ञान) की पूर्णता ‘केवलज्ञान‘ को पा लिया इसलिए आप गणधरों व ज्ञानियों द्वारा पूजित हैं अतः आप ‘बुद्ध‘ हैं। आप ‘शंकर‘ हैं क्योंकि तीनों लोकों के जीवों के लिए ‘शं‘ अर्थात् मंगल/सुख करनेवाले हैं, शुभकारी हैं। आप उदात्त, गंभीर और धीर व्यंितव से परिपूर्ण है। मोक्षमार्ग का निष्पादन आपके द्वारा ही हुआ है अतः आप ही ब्रह्मा अथवा विधाता हैं। हे भगवान्! आपने अपनी पर्याय में सर्वोत्कृष्ट पुरुषत्व व्यक्त कर लिया है इसलिए आप ही पुरुषोत्तम हैं।

विबुधन पूजौ बुद्धि-बोध तव, यासों बुद्ध तुम्ही हो।
तीन भुवन के शंकर यासों, शंकर शुद्ध तुम्ही हो।
शिव-मारगके विधि-विधानसों, साँचे तुम्ही विधाता।
त्यों ही शब्द अर्थसों तुम ही, पुरुषोत्तम जगत्राता।।२५।।

You are the Buddha as the other gods and learned persons (Gandhar etc.) have worshipped and commended your self-Awakening, (Omniscience), you are the Shankar (Shiv) as your are the benefactor of the summum bonum (highest good) to the living beings of the three worlds. O Resolute one ! you are the providence (creator) as you have constituted the ordinations of the Path of salvation (codifier of the rules of emancipations). Thus, O Lord, it is manifest that you being the best amongst the persons are the only Purushottam.

दुःखहारी-शांतिकारी
तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ!
तुभ्यं नमः क्षितिलामलभूषणाय।
तुभ्यं नमस्त्रिजगत्ः परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधिशोषणाय।।२६।।

पदच्छेद - तुभ्यम् नमः त्रिभुवन-आर्तिहराय नाथ, तुभ्यम् नमः क्षिति-तल-अमल-भूषणाय, तुभ्यम् नमः त्रिजगतः परमेश्वराय, तुभ्यम् नमः जिन भवोदधि शोषणाय।

शब्दार्थ - तुभ्यम् = आपको, नमः = नमस्कार है, त्रिभुवन = तीन भुवन के, आर्तिहराय = दुःख हरनेवाले को, नाथ = स्वामी। तुभ्यम् = आपको, नमः = नमस्कार है, क्षितितल = पृथ्वीतल, अमल-भूषणाय = निर्मल भूषण। तुभ्यम् = आपको, नमः = नमस्कार है, त्रिजगतः = तीन जगत के, परमेश्वराय = भगवान को। तुभ्यम् = आपको, नमः = नमस्कार है, जिन = जिनदेव को, भवोदधि = संसार का, शोषणाय = शोषण करनेवाले को।।२६।।

अन्वय = नाथ त्रिभुवनार्तिहराय तुभ्यं नमः, क्षितितलअमल-भूषणाय तुभ्यं नमः, त्रिजगतः परमेश्वराय तुभ्यं नमः, जिन भवोदधिशोषणाय तुभ्यं नमः।

श्लोकार्थ- हे नाथ! तीन लोक की पीड़ा हरण करनेवाले तुम्हें नमस्कार! पृथ्वीतल के निर्मल अलंकाररूप तुम्हें नमस्कार! तीनों जगत् के परमेश्वर तुम्हें नमस्कार! हे जिन! संसार-समुद्र का शोषण करनेवाले (सुखानेवाले) तुम्हें नमस्कार है!

तीनभुवनके विपद-विदारक, तारन-तरन नमस्ते।
वसुधातलके निरमल भूषन, दूषन-दरन नमस्ते।
तीनलोकके परमेश्वर जिन, विगत-विकार नमस्ते।
अति गंभीर जगत-जलनिधिके शोषनहार नमस्ते।।२६।।

O Lord! bow to you, the annihilator of the afflictions of the three worlds, how to you the purest and the most resplendent jewel on the face of Earth, bow to you the Paramount Almigthy of the three worlds. O Jin (conqueror), I bow to you, the Absorbent of the ocean of Births and Deaths.

गुणनिधान
को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषै-
स्त्वं संश्रितो निवकाशतया मुनीश-
दोषैरुपात्तविविधाश्रयजातगर्वैः,
स्वप्नान्तरेऽपि न कआचिदपीक्षितोऽसि।।२७।।

पदच्छेद - कः विस्मयः अत्र यदि नाम गुणैः अशेषैः, त्वम् संश्रितः निः अवकाशतया मुनीश, दोषैः उपात्त विविध आश्रय जात गर्वैः, स्वप्न-अन्तरे अपि न कदाचित् अपि ईक्षितः असि।

शब्दार्थ - कः = क्या, विस्मय = आश्चर्य, अत्र = इसमंे, यदि = यदि, नाम = नाम, गुणैः = गुणों के द्वारा, अशेषैः = समस्त। त्वम् = आप, संश्रितः = आश्रित, निः = रहित, बिना, अवकाशतया = स्थान मिलने पर, मुनीश = मुनिराज। दोषैः = दोष द्वारा, उपात्त = प्राप्त हुए, विविध = नाना प्रकार, आश्रय = सहारा, जात = उत्पन्न, गर्वैः = गर्व द्वारा। स्वप्न = स्वप्न, अन्तरे = मध्य में, अपि = भी, न = नहीं, कदाचित् = कभी, अपि = भी, ईक्षितः = देखे गये, असि = हो।।२७।।

अन्वय - मुनीश यदि अशेषैः गुणैः निरवकाशतया त्वं संश्रितः अपि उपात्तविविध-आश्रयजातगर्वैः दोषैः कदाचित् अपि स्वप्नानन्तरे अपि न ईक्षितः असि अत्र को नाम विस्मयः!

श्लोकार्थ- संसार में जितने गुण थे उन सबने आपमें इस सघनता से निवास कर लिया कि फिर कुछ भी अवकाश (स्थान) शेष नहीं रहा। जिससे दोषों को आपमें बिल्कुल भी स्थान नहीं मिला। वे दोष-दुर्गुण अन्यत्र चले गये, अन्यत्र आश्रय मिल जाने के गर्व से वे दुर्गुण पुनः लौटकर स्वप्न में भी आपकी ओर नहीं आये। अर्थात् संसार के समस्त गुण आपमें विद्यमान हैं, दुर्गुण एक भी नहीं है इसमें क्या आश्चर्य है!

हे मुनीश, गुन-गुन मिलि सिगरे, आय बसे तुवमाहीं।
ह्वै अति सघन, रह्मौ तातें अवकाश लेश हू नाहीं।
यह लखि दोषवृंद सपनेहुँमें, जो नहि तुव तन जोवै।
तो नहिं अचरज, बहुआश्रयतैं गरब सबनिको होवै।।२७।।

O the Best amongst the sages! It is not strange if all the virtues have taken shelter in you in densely clustered numbers and if the faults (vices) being puffed up with pride in having attained the patronage of other deities did not cast a glance at you in a dream.

शोकहारी-अशोककारी
उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूख-
माभाति रुपममलं भवतो नितान्तम्।
स्पष्टोललसत्किरणमस्ततमोवितानं
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति।।२८।।

पदच्छेद - उच्चैः अशोकतरु संश्रितम् उन्मयूखम्, आभाति रूपम् अमलम् भवतः नितान्तम्, स्पष्ट उल्लसत् किरणम् अस्त तमः वितानम्, बिम्बम् रवेः इव पयोधर पाश्र्ववर्ति।

शब्दार्थ - उच्चैः = ऊँचे, अशोकतरु = अशोक वृक्ष, संश्रितम् = आश्रित, उन्मयूखम् = ऊध्र्वमुखी, ऊपर की ओर जाती हुई किरण। आभाति = शोभित होती है, प्रकाशमान होती है, रूपम् = रूप, अमलम् = निर्मल, पवित्र, भवतः = आपका, नितान्तम् = अत्यंत। स्पष्ट = स्पष्ट रूप से, उल्लसत् = शोभायमान, किरणम् = किरण को, अस्त = गत, नष्ट, तमः = अंधकार का, वितानम् = प्रसार को। बिम्बं = प्रतिकृति, रवेः= सूर्य के, इव = तरह, पयोधर = मेघ, पाश्र्ववर्ति = पास में रहनेवाले।।२८।।

अन्वय - उच्चैः अशोकतरुसंश्रितम् उन्मयूखं भवतः अमलं रूपं स्पष्टोल्लसत् किरणम् अस्ततमोवितानं पयोधरपाश्र्ववर्ति खेः बिम्बं इव नितान्तं आभाति।

श्लोकार्थ- जिस प्रकार बादल-समूह के बीच में चमकती हुई किरणों से अंधकार को नष्ट करता हुआ सूर्य-शोभित होता है उसी प्रकार प्रभो! समवसरण में अशोक वृक्ष के नीचे विराजित आपकी पावन दिव्य देह से निकलती हुई ऊपर की ओर जा रही स्वर्ण-आभा अशोक वृक्ष की हरितिमा के साथ मिलकर अत्यंत शोभायमान है। (प्रथम प्रातिहार्य-अशोक वृक्ष)

हे जिनवर, अशोकतल तेरो, विमलरूपम न मोहै।
किरण-निकर-वितरन सों चहुँधा, अस उपमायुत सोहै।
जैसे जलधर के समीप, सोहत बहु किरणस्वरूपा।
तेजमान तमतोमहरण वर, दिनकर-बिम्ब अनूपा।।२८।।

O Lord while seated under the Ashoka tree (Jonasia ashoka) your resplendent and spotless body looks extraordinarily elegant, like the Sun in close proximity of the dense clouds radiating its brilliant rays and dispelling the expanse of darkness.

स्फटिक के शुभ्रआसन पर ज्योतिर्मय
सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे
विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम्।

बिम्बं वियद् विलसंदशुलतावितानं,
तुंगोदयाद्रिशिरसीव सहस्त्ररश्मेः।।२९।।

पदच्छेद - सिंहासने मणि-मयूख-शिखा विचित्रे, विभ्राजते तव वपुः कनक-अवदातम्, बिम्बम् वियत्-विलसत् अंशु-लता-वितानम्, तुंग उदयाद्रि (उदय-आद्रि) शिरसि इव सहस्त्रश्मेः।

शब्दार्थ - सिंहासने = सिंहासन पर, मणिमयूख = मणि कि किरण, शिखा = अग्रभाग, चोटी, विचित्रे = विचित्रता में। विभ्राजते = शोभित होता है, तव = आपका, वपुः = आकाश में शोभित, अंशु = किरण, लता = बेल, वितानम् = समूह को। तुंग = ऊँचा, उदयादि = उदयगिरि, शिरि = शिखर पर, चोटी में, इव = तरह, सहस्त्ररश्मेः = सूर्य के।।२९।।

अन्वय - मणिमयूख शिखाविचित्रे सिंहासने कनकावदातम् तव वपुः तुंगादयाद्रिशिरसि वियद्विलसदंशुलतावितानं सहस्त्ररश्मेः बिम्बं इव विभ्राजते।

श्लोकार्थ- जिस प्रकार ऊँचे उदयगिरि (पर्वत) पर उगता हुआ सूर्य चारों ओर फैली अपनी स्वर्णिम किरणों से आकाश में अत्यंत शोभायमान होता है उसी प्रकार मणिजटित सिंहासन पर आपका सोने के समान देदीप्यमान/चमकता हुआ सुवर्ण शरीर शोभायमान है। (द्वितीय प्रातिहार्य - सिंहासन)

मणि-किरणसों चित्रित दुतियुत, सिंहासन मन भावै।
तापै जिन, तुव कनक-वरण तन, ऐसी उपमा पावै।
तान वितान गगन में अपनी, किरनन को सुखदाई।
ऊँचे उदयाचल के ऊपर, दिनकर देत दिखाई।।२९।।

Your gold-like lovely body seated on the throne emitting multicoloured rays from the listre of gems studded therein (throne) resembles the Sun with its radiant rays shining on the high peak of the Eastern mountain.

दिव्यदेह पर धवलधारा
कुन्दावदातचलचामरचारुशोभं
विभ्राजते तव वपुः कलधोतकान्तम्।
उद्यच्छशांकशुचिनिर्झरवारिधार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव - शातकौम्भम्।।३॰।।

पदच्छेद - कुन्द-अवदान चल-चामर चारु शोभम्, विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कान्तम्, उद्यत् शशांक शुचि निर्झर वारिधारम्, उच्चैः तटम् सुर-गिरेः इव शातकौम्भम्।

शब्दार्थ - कुन्द = कुन्द नामक सफेद फूल, अवदात = उज्ज्वल, चल = चलनेवाला, चामर = चँवर, चारु = सुन्दर, शोभम् = शोभायुक्त। विभ्राजते = शोभित होता है, तव = आपका, वपुः = शरीर, कलधौत = शुद्ध स्वर्ण, कान्तम् = चमकयुक्त। उद्यत् = तैयार, शशांक = चन्द्र, शुचि = पवित्र, निर्झर = झरना, वारिधारम् = जल की धारा। उच्चैः = ऊँचे, तटम् = तट, सुरगिरेः = मेरुपर्वत पर, इव = तरह, शातकौम्भम् = सोने के बने हुए।।३॰।।

अन्वय - कुन्दावदातचलचामरचारुशोभं कलधोतकान्तम् तव वपुः उद्यच्छशांकशुचिनिर्झर वारिधारम् शातकौम्भम् सुरगिरेः उच्चैस्तटं इव विभ्राजते।

श्लोकार्थ- समवशरण में आपकी स्वर्णिम कांतिवाली दिव्यदेह के दोनों ओर ढोरे जाते हुए कुन्द के फूलों जैसे श्वेत-शुभ्र-धवल चँवर की कांति वैसी ही सुंदर प्रतीत होती है जैसे स्वर्णगिरि (सुमेरु पर्वत) के ऊपर दोनों ओर से चन्द्रमा कि किरणों के समान उज्ज्वल जल-प्रपात की गिरती हुई धवल धारा हो। (तृतीय प्रातिहार्य - चँवर)

कनक-वरण तुव सुतनु, जासु पर, कुंद सुमन दुतिधारी।
चारु चमर चहुँ ढुरत विशद अति, सोहत यों मनहारी।
सुरगिरि के कंचनमय ऊँचे, तट पर ज्यों लहरावै।
झरनन की उज्जल जलधारा, उदित इन्दु-सी भावै।।३॰।।

Your gold-like glittering body intensly beautified by the waving of the clean white (like kund flowers) flappers (chanwars whisks made of bos grunniens Hairs), looks elegant, like the lofty peak of sumeru mountain, with streams of water as white and clean as the rising Moon, flowing in either sides of it in great torrents.

तीनलोक के अधिपति
छत्रत्रयं तव विभाति शशांककान्त-
मुच्चैः स्थितं स्थगितभानुकरप्रतापम्।

मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्धशोभं,
प्रख्यापयत्त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्।।३१।।

पदच्छेद - छत्र त्रयम् तव विभाति शशांक कान्तम्, उच्चैः स्थितम् स्थगित भानुकर-प्रतापम्, मुक्ताफल प्रकर-जाल विवृद्ध-शोभम्, प्रख्यापयत् त्रिजगतः परमेश्वरत्वम्।

शब्दार्थ - छत्र = छत्र, त्रयम् = तीन, तव = आपका, विभाति = शोभायमान होता है, शशांक = चन्द्र, कान्तम् = कांतियुक्त। उच्चैः = ऊँचा, स्थितम् = विराजमान, स्थगित = रुका हुआ, भानुकर = सूर्य-किरण, प्रतापम् = प्रभाव। मुक्ताफल = मोती, प्रकरजाल = समहू, विवृद्ध = बढ़ते हुए, शोभम् = शोभा को, प्रख्यापयत = प्रकट करते हुए, त्रिजगतः = तीन लोक, परमेश्वरत्वम् = स्वामीपना को।।३१।।

अन्वय - उच्चै स्थितं (तव) छत्रत्रयम् मुक्ताफलप्रकरजाल विवृद्ध शोभम्, शशांककान्तम्, स्थगित भानुकरप्रतापम् तव त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् प्रख्यापयत् विभाति।

श्लोकार्थ- आपके शीर्ष पर तीन छत्र सुशोभित हैं जो चन्द्रमा के समान कांतियुक्त हैं और श्वेत मोतियों के समूह/माला से शोभायमान हैं। सूर्य कि किरणों के आतप को रोकते हुए ये तीनों छत्र आपके तीनों जगत के परमेश्वरत्व को प्रकट करते हैं अर्थात् तीनों छत्रों से ऊध्र्व-मध्य-पाताल तीनों लोकों का स्वामित्व प्रकट हो रहा है। (चतुर्थ प्रातिहार्य - तीन छत्र)

शशि समान रमणीय प्रखर रविताप-निवारणहारे।
मुकतन की मंजुल रचना सों, अतिशय शोभा धारे।
तीन छत्र ऊँचे तुव सिर पर, हे जिनवर, मन भावैं।
तीन जगत की परमेश्वरता, वे मानो प्रगटावैं।।३१।।

The three-fold moon like umbrellas raised high above your head, greatly beautified by the pearl frills, and keeping off the heat of the sun’s rays, proclaim your paramount supremacy, omnipotence over the three worlds.