जिनगुण सम्पत्ति विधान - अथ षष्ठ वलय पूजा
अथ स्थापना


-गीताछंद-
अतिशय अतुल चौदह सुदेवों, कृत जिनागम ख्यात हैं।
उन पूजते अतिशय अनूपम, पद मिले निर्बाध हैं।।
तीर्थंकरों के श्रेष्ठ गुण की, जो करें नित अर्चना।
वे कर्म शत्रू नाशकर, फिर से धरेंगे जन्म ना।।१।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशय जिनगुण समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।


ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशय जिनगुण समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशय जिनगुण समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

-अथाष्टवंâ


(पंचचामर छंद)-
भगीरथी१ पवित्र नीर स्वर्ण भृंग में भरूँ। पदारविंद२ नाथ के त्रिधार भक्ति से करूँ।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।१।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
सुगंध गंध चंदनादि स्वर्ण पात्र में भरूँ। समस्त दु:ख शांति हेतु चर्ण चर्चन करूँ।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।२।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
अखंड धौत श्वेत शालि३ स्वर्ण थाल में भरें। अखंड सौख्य पुंज हेतु, पुंज को यहाँ धरें।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।३।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
गुलाब केवड़ा जुही सुगंधि पुष्प को लिये। रतीपतीजयी जिनेंद्र पाद में चढ़ा दिये।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।४।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
रसादियुक्त मिष्ट१ मोदकादि थाल में भरें। निजात्म२ सौख्यस्वाद हेतु आप अर्चना करें।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।५।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कपूर ज्योति अंधकार नाश में प्रधान है। सुआरती उतारते उदोत३ ज्ञान भानु है।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।६।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
दशांग धूप ले सुगंध अग्निपात्र में जरे। समस्त पाप शत्रु आप पूजते तुरत टरें।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।७।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
अनार संतरा बदाम द्राक्ष१ थाल में भरे। जिनेंद्र को चढ़ावते, निजात्म संपदा भरें।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।८।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जलादि अष्ट द्रव्य में मिलाय रत्न अघ्र्य ले। चढ़ाय आपके समीप, तीन रत्न२ लूँ भले।।
सुरोपनीत चौदहों महातिशायि गुण जजूँ। न गर्भवास दु:ख में पुन: कदापि मैं पचूँ।।९।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशयजिनगुणसंपद्भ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


-दोहा-
सकल जगत में शांतिकर, शांतिधार सुखकार।
जिनपद में धारा करूँ, सकल संघ हितकार।।

शांतये शांतिधारा।

सुरतरु के सुरभित सुमन, सुमनस चित्त हरंत।
पुष्पांजलि अर्पण करत, मिटता दु:ख तुरंत।।

दिव्य पुष्पांजलि:।


अथ प्रत्येक अघ्र्य


-नरेन्द्र छंद-
जिन अतिशय सर्वार्ध मागधी, भाषामय सुखकारी। सुनने वाले भव्य जनों के, भव भव दु:ख परिहारी।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।१।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा सर्वार्धमागधीयभाषा देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


जात विरोधी सभी जीवगण, वैर भाव सब तजते। मैत्रीभाव धरें आपस में, बड़े प्रेम से रहते।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।२।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा सर्वजनमैत्रीभाव देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


सब ऋतु के फल पूâल फलित हों, एक साथ मन मोहें। संख्यातों योजन तक ऐसा, अतिशय अद्भुत होवे।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।३।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा सर्वर्तुफलादिशोभित तरुपरिणामदेवो-पनीतातिशयजिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


दर्पण तल सम रत्नमयी हो, पृथ्वी अतिशयकारी। प्रभु के विहरण हेतु देवगण, रचना करते सारी।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।४।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा आदर्शतलप्रतिमारत्नमयी महीदेवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


वायुकुमार देव विक्रिय बल, शीतल पवन चलाते। प्रभु विहार अनुवूâल वायु से,जन-जन मन सुख पाते।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।५।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा विहरणमनुगतवायुत्व देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


सब जन परमानंद प्राप्त कर, प्रभु के गुण गाते हैं। रोग शोक भय संकट दुख को, तुरत भूल जाते हैं।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।६।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा सर्वजनपरमानंदत्व देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


वंâटक धूली आदि दूर कर, वायु सुखद बहती है। प्रभु विहार के समय दूर तक, भूमि स्वच्छ रहती है।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।७।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा वायुकुमारोपशमित धूलिवंâटकादि देवोपनीता-तिशयजिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


मेघकुमार करें नित रुचि से, गंधोदक की वृष्टी। सौधर्मेंद्र करें नित आज्ञा, प्रभुपद में अति भक्ती।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।८।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा मेघकुमारकृत गंधोदकवृष्टि देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


श्रीविहार१ के समय प्रभू के, चरण कमल के तल में। स्वर्णकमल सौगंधित सुरगण, रचें उसी ही क्षण में।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।९।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा पादन्यासे कृतपद्मरचना देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


शाली आदिक खेती बहुविध, फल के भार झुकी हैं। देवोंकृत यह अतिशय सुन्दर, सब जन पूर्ण सुखी हैं।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।१०।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा फलभारनम्रशालि देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


शरद्ऋतू के स्वच्छ गगनसम, निर्मल अभ्र१ सुहाता। उल्कापात धूम आदी से, रहित प्रभू यश गाता।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।११।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा शरत्कालवन्निर्मलगगनत्व देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


सभी दिशायें निर्मल होतीं, शरद्२ मेघ सम दिखतीं। रोगादिक पीड़ाएँ जन को, वहाँ नहीं हो सकतीं।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।१२।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा शरन्मेघवन्निर्मलदिग्भागत्व देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


चतुर्निकाय देवगण सत्वर, ३आवो आवो आवो। इंद्राज्ञा से देव बुलाते, आवो प्रभु गुण गावो।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।१३।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा एतैतेति चतुर्निकायामरपरापराह्वान देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


यक्षेंद्रों के मस्तक ऊपर, धर्मचक्र चमके हैं। चार दिशा में दिव्य चक्र ये, किरणों से दमके हैं।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।१४।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असिआउसा धर्मचक्रचतुष्टय देवोपनीतातिशय-जिनगुणसंपदे मुक्तिपदकारणस्वरूपायै नम: अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


-पूर्णाघ्र्य-
देवों कृत ये चौदह अतिशय, पुण्य रत्न आकर४ हैं। इन गुण का स्मरण मात्र भी, जिनगुण रत्नाकर५ है।।
अघ्र्य चढ़ाऊँ भक्ति भाव से, जिनगुण गण मणि ध्याऊँ। अतिशय पुण्य बढ़ाके निजकी, रत्नत्रय निधि पाऊँ।।१५।।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: देवोपनीतातिशय जिनगुणसंपद्भ्य: पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।


जयमाला

-सोरठा-
तीन लोक के भव्य, तुम पद पंकज सेवते।
महापुण्य फलराशि, गाऊँ तुम जयमालिका।।१।।

-शंभु छंद-
जय जय त्रिभुवन के चूड़ामणि, जय जय तीर्थंकर गुण भर्ता। जय चिंतित दाता चिंतामणि, जय कल्पवृक्ष वांछित फलदा।।
जय समवसरण में कमलासन पर, चतुरंगुल से अधर रहें। वैभव अनंत को पाकर भी, प्रभु उससे नित्य अलिप्त रहें।।२।।

तुमने सोलह कारण भाके, तीर्थंकर वैभव पाया है। प्रभु पंचकल्याणक के स्वामी, इंद्रों ने तुम गुण गाया है।।
चौतीसों अतिशय सहित आप, वसु प्रातिहार्य के स्वामी हैं। आनन्त्य चतुष्टय से शोभित, सब जग के अंतर्यामी हैं।।३।।

प्रभु समवसरण में जन असंख्य, जिनदेव वंदना करते हैं। नर तिर्यक् सुरगण भी असंख्य, बारह कोठों में बसते हैं।।
यद्यपि वह क्षेत्र बहुत छोटा, फिर भी अवकाश सभी को है। जिनवर माहात्म्य से यह अतिशय, सब आपस में अस्पृष्ट१ रहें।।४।।

इन कोठों में मिथ्या दृष्टी, संदिग्ध विपर्यय नहिं होते। नहिं होंय असंज्ञी औ अभव्य, पाखंडी द्रोही नहिं होते।।
नहिं वहाँ कभी आतंक रोग, क्षुध तृष्णा कामादिक बाधा। नहिं जन्म मरण नहिं वैर कलह, नहिं शोक वियोग जनित बाधा।।५।।

सब सीढ़ी एक हाथ ऊँची, जो बीस हजार प्रमाण कहीं। बालक औ वृद्ध पंगु आदिक, अंतर्मुहूर्त१ में चढ़ें सही।।
अभिमानी मानस्तंभ देख, सब मान कषाय नशाते हैं। जिन दर्शन कर सम्यक्त्व निधी, पाकर निहाल हो जाते हैं।।६।।

प्रभु की कल्याणी वाणी सुन, निज भव त्रैकालिक जान रहे। अतिशय अनंतगुणश्रेणीमय, परिणाम विशुद्धी ठान रहे।।
सब असंख्यात गुग श्रेणि रूप, कर्मों का खंडन करते हैं। क्रम से वे बोधि समाधी पा, मुक्ती कन्या को वरते हैं।।७।।

निज गुण संपत्ती में प्रधान, त्रेसठ गुण मणि को लभते हैं। जिन आत्म सुधारस पीकर के, शाश्वत परमानंद चखते हैं।।
इस विध प्रभु तुम कीर्ती सुनकर, मैं चरण शरण में आया हूँ। अब जो कर्तव्य आपका हो, वह कीजे मैं अकुलाया हूँ।।८।।

प्रभु मेरी यही प्रार्थना है, मेरा सम्यक्त्व नहीं छूटे। जब तक नहिं मुक्ति मिले मुझको, नहिं तुमसे मम नाता टूटे।।
संयम का पूर्ण लाभ होवे, मरणांत२ समाधी हो मेरी। भव भव ‘सुज्ञानमती’ होवे, जब तक न मिटे भव की पेâरी।।१।।

-घत्ता-
जय जय जिन अतिशय, अनुपम निधिमय, जय जय त्रेसठ गुण पूरे।
जो पूजें ध्यावें, भक्ति बढ़ावें, जिनगुणसंपत्ति निज पूरे।।१०।।

ॐ ह्रीं देवोपनीतातिशय जिनगुणसंपद्भ्यो जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।


शांतये शांतिधारा। दिव्य पुष्पांजलि:।


-गीता छंद-
जो भव्य श्रद्धा भक्ति से, जिनगुण सुसंपति व्रत करें। व्रत पूर्ण कर प्रद्योत हेतू, यज्ञ उत्सव विधि करें।।
वे विश्व में संपूर्ण सुखकर, इंद्रचक्री पद धरें। फिर ‘ज्ञानमति’ से पूर्ण गुणमय, तूर्ण शिवलक्ष्मी वरें।। ।।

इत्याशीर्वाद: ।।