उत्तम मार्दव धर्म

मंगलाचरण

श्रीमत् समस्तभुवनेश्वरन्दिताय, विध्वस्तमोहतिमिराय महोदयाय।
ज्ञानेन बोधित जगत् त्रय नित्यताय, तस्मै नमो भगवते जिनभास्कराय।।1।।
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अर्थ- सूर्य के समान तेजस्वी, अंतरंग बहिंरग लक्ष्मी रूप शोभा से सम्पन्न, समस्त भुवन के ईश्वर और मोह रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले, महान् है उदय जिनका तथा ज्ञान से तीनों लोकों के जीवों को मार्ग दिखाने वाले, ऐसे अपने अन्नतसुख से कभी च्युत न होने वाले नित्य रूप उन केवली भगवान के लिये नमस्कार हो।

मर्दाव - मृदो र्भावो मार्दवः मृदिमा मृदुत्वम् मानपरिहारः इत्यर्थः। उत्तमजातिकु लैश्वर्यरूपज्ञानतपोबल शिल्पित्वादियुक्तस्यापि मुनेस्तत्कृ तमदावेशाऽभावो मार्दवं, उत्तमजाति, उत्तमकुलं उतमरूपं, उत्तमविज्ञान, उत्तमप्रभुत्व, उत्तमबलं, उत्तमतप, उत्तमऐश्वर्यम् एतैः समुद्भवं मानं विखण्डयति तं बुधा मार्दवधर्मं कथयन्ति। मार्दवध्र्मेण भूषितो मुनीन्द्रः परमो गुणः। मार्दवधर्मा जगत्त्रये सुखनिधानं। मार्दवधर्मेण भूषितः पुरूषो जड़ोऽपि पण्डित उच्यते अष्टाविंशतिमूलगुणधारकानां साधून् मार्दवधर्मों भूषणम् गृहस्थोऽपि मार्दवधर्मेण सप्तधातुविवर्जितदेहो देवो भवति ततो जिनत्वं लब्ध्वा मुक्तिरमापतिः स्यात्।

अर्थ- मृदुता का जो भाव है उसको मार्दव कहते हैं, अथवा मान का परिहान करना मार्दव धर्म कहलाता है।

उत्तम जाति, कुल, ऐश्वर्य, रूप, ज्ञान, तप, बल, शिल्प इन आठ से युक्त होने पर भी दूसरे जीवों का तिरस्कार करनेवाले अभिमान का अभाव होना मार्दव कहलाता है।

उत्तम जाति, उत्तम कुल, उत्तम रूप, विशिष्ट ज्ञान का क्षयोपशम उत्तम प्रभुता, उत्तम बल, उत्तम तप, उत्तम ऐश्वर्य इन से उत्पन्न होने वले मान का जो खण्डन करते हैं, विद्वान उसको मार्दव धर्म कहते हैं। मार्दव धर्म के बना साधु भी असाधु हो जाता है, साधु के मार्दव धर्म ही परम गुण है, माद्रव धर्म तीनों लोकों में सुख का खजाना स्वरूप है। मार्दव धर्म से भूषित मनुष्य मूर्ख भी पंडित कहा जाता है। उठ्ठाईस मूल गुणों के धारक साधुओं के मार्दव धर्म आभूषण स्वरूप है। और गृहस्थ भी मार्दव धर्म के प्रभाव से सप्त धातु से रहित सुन्दर शरीर का धारक देव होता है, वहां से च्युत होकर मनुष्य होता है और मुनिव्रत को धारण कर मुक्तिरमा का स्वामी होता है।

धर्मांगमेतदिव मार्दवनामधेयं, जात्यादिगर्वपरिहारमुशन्ति सन्त।
तद्धर्यते किमुत बोधदृशा समस्तं, स्वप्नेन्द्रजालसदृशं जगदीक्षमाणैः।।2।।

अर्थ- जाति आदि के गर्व के परिहार को इस जगत मेें ज्ञानीजन मार्दव नामक धर्म का अंग कहते हैं क्योंकि सर्वज्ञ देव ने जाति कुल आदि को स्वप्न के इन्द्र धनुष के तुल्य बतलाया है, उनका ज्ञानियों के द्वारा अहंकार किया जाता है? अर्थात् नहीं किया जाता है।

कास्था सद्भनि सुन्दरेऽपि परितो दन्दह्यमानाग्निभिः,
कायादौ तु जरादिभिः प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरं।
इत्यालोचयतो हृदि प्रषमिनः शश्वद्विवेकोज्ज्वले,
गर्वस्यावसरः कुतोऽत्र घटते, भावेषु सर्वेष्वपि।।3।।

अर्थ- जैसे बस ओर अग्नि से जलाये जने वाले सुन्दर महल में आस्था नहीं होती है, उसी प्रकार शरीर वृद्धावस्था के द्वारा जीर्णता को प्राप्त कराया जा रहा है ऐसा विचार करने वलो विवेकी प्रशान्तात्मा के हृदय में समस्त पदार्थों के प्रति अहंकार कैसे हो सकता है, अर्थात् नहीं होता है।

मार्दवधर्मेण समस्तानि व्रतानि सम्पूर्णतां यान्ति।
मार्दवधर्मेण मुक्तिस्त्री स्वयमेव दृढालिंगन दत्ते।।4।।

अर्थ- मार्दव धर्म के होने पर सभी व्रत सम्पूर्णता को प्राप्त होते हैं और मार्दव धर्म से युक्त भव्यात्मा को मुक्तिलक्ष्मी स्वयं ही दृढ़ आलिंगन करती है।

त्रियोगशुद्धता धृतमार्दवधर्मेण धर्मिणां प्रशस्तविश्व गुणैः सार्ध विश्व-सुखदायी धर्मों भवति

अर्थ- मन, वचन, काय की शुद्धि से जिसने मार्दव धर्म को धारण किया है, उस धर्मी को सम्पूर्ण गुणों के साथ विश्वसुख दायी धर्म प्राप्त होता है।

काठिन्यपरिणमेन पापं जायते, समस्तव्रतानि क्षयं शान्ति पापहेतुः कठोरपरिणामो निन्द्योऽस्ति। मार्दवधर्म कठोर परिणामयोः ईदृक् शुभाशुभं फलं विज्ञाय त्यक्त्वा सुयत्नतो मार्दव धर्मः पालनीयः।

अर्थ- कठोर परिणामों से पाप होता है, और सभी व्रत क्षय को प्राप्त होते हैं। पाप का हेु कठोर परिणाम निन्द्य है। मार्दव धर्म का फल शुभ और कठोर परिणाम का फल अशुभ है ऐसा जानकर, कठोर परिणाम को छोड़कर, प्रयत्न पूर्वक मार्दव धर्म का पालन करना चाहिए।

सत्सूत्तमेषु सर्वेषु, सज्जात्यादिषु चाष्टसु।
मृदुभिश्चित्तवाक्कार्य, र्निहत्य तत्कृतं मदम्।।5।।

अर्थ- सज्जाति आदि आठ प्रकार के मद संसार के सब प्राणियों को होते हैं। इसलिये मृदु मन-वचन-काय से उनके द्वारा किये हुये मान का मर्दन करना चाहिए।

क्रियते मृदुभावों यो - ऽखिलाहंकारवर्जितः।
शुभाशुभं विदित्वाऽहो, हत्वा कठिनमानसम्।।7।।

अर्थ- इस प्रकार कोमल और कठोर परिणाम का वास्तविक फल जानकर कठिन परिणाम को नष्ट करके, सरल परिणाम को धारण करना चाहिए।

विश्वसत्वकृपाक्रान्तं, मार्दवं सुष्ठुयत्नतः।
कुर्वन्तु मुनयो धर्म, शिवश्रीसुखवृद्धये।।8।।

अर्थ- समस्त प्राणियों में कृपा करने वाला मार्दव धर्म प्रयत्न पूर्वक पालन करना चाहिए। मोक्षलक्ष्मी के सुख की वृद्धि मुनि सदा ही मर्दाव धर्म का पालन करते हैं।

गुणरिक्तेन किं येन, मानेनार्थः प्रसिद्धयति।
तन्मन्ये मानिनां मानं, यल्लोकद्वयशुद्धिदम।।9।।

अर्थ- गुणों से रहित मान करने से क्या अर्थ की सिद्धि होती है? अर्थात् नहीं होती है। क्योंकि मानियों का मान क्या दोनों लोकों में शुद्धि को देने वाला होता है। अर्थात् नहीं होता।

अपमानकरं कम्र, येन दूरान्निषिध्यते।
स उच्चैश्चेतसां मानः परः स्वपरघातकः।।10।।

अर्थ- अपकार को करने वाला मानस्व और पर दोनो का घातक होताहै, इसलिये उदार पुरूषों के द्वारा मान दूर से ही त्याग कर दिया जाता है।

मार्दवेनापि सिद्धयन्ति, कार्याणि सुगुरूण्यपि।
यतो जलेन भिद्यन्ते, पर्वता अपि निष्ठुराः।।11।।

अर्थ- मार्दव के द्वारा बड़े-बड़े कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं जैसे पानी के द्वारा बड़े-बड़े निष्ठुर पर्वत भी भेद दिये जाते हैं।

यो नरो मृदुवाक्यः स्यात् सदर्पानपि विद्विषः।
स निहन्ति न सन्देहो, मयूरो भुजगानिव।।12।।

अर्थ- जिस व्यक्ति की मृदुवाणी है, उसके आगे दर्प से रहित शत्रु भी नष्ट हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है, जैसे मयूर की वाणी सुनकर अहंकारी सर्प स्वयमेव शांत हो जाते हैं।

मृदुत्वं सर्वभूतेषु, कार्य जीवेन सर्वदा।
काठिन्यं त्यज्यते नित्यं, धर्मबुद्धिं विजानता।।13।।

अर्थ- जीव को सब प्रणियों पर निरन्तर मृदुता रखना चाहिए, धर्म के स्वरूप को जानने वाला कठोरता को हमेशा के लिए छोड़ देता है।

कर्तव्यं मार्दवं दक्षै, र्मनोवाक्कायकोमलैः।
धर्मार्थं न च काठिन्यं, योगानां धर्मनाशकृत्।।14।।

अर्थ- बुद्धिमानों को मार्दव धर्म की प्राप्ति के लिये मन-वचन-काय को कोमल करना चाहिए। मन-वचन-काय की कठिनता धर्म के लिए नहीं किंतु धर्म को नाश करने वाली होती है।

एतेभ्योऽहं प्रकृष्ट इति मनसि चिन्तनं मनःकाठिन्यम् मत्तोऽन्यः कः श्रुतपारगः सुतपोधनः सुचरित इति वचः कथनं वचःकाठिन्यं, गात्रस्तब्धकरणं शिर उन्नमनं, उच्चासनारोहणं कायकाठिन्यं कथ्यते।
भद्रं मार्दववज्राय, येन निर्लूनपक्षतिः।
पुनः करोति मानाद्रि, र्नोत्थानाय मनोरथेः ।।15।।
’’वदन्ति जात्यादिमदाभिमान - प्रहीणतां मार्दवधर्ममार्याः’’

अर्थ- मेरे समानदूसरा कौन श्रुत का पारगामी है, तपस्वी है; सुचारित्र का पालन करने वाला है, इस प्रकार मन में चिन्तवन करना मन की काठिन्य परिणति है। यही बात वचन से कहना, यह वचन की काठिन्य परिणति है।

और गात्रस्तब्ध करना- (शरीर से अकड़कर चलना), शिर ऊँचा चलना, ऊँचे आसन पर आरोहण करना यह काय की काठिन्य परिणति जानना चाहिए। जिसने मान रूपी पर्वत पर मार्दव रूपी वज्र पटक दिया है, जिससे वह मानाद्रि निर्लून पा हो गया अर्थात् पंख रहित पक्षी के समान उड़ने में असमर्थ हो गया है पुनः मान रूपी शैल के उत्थान का मनोरथ नहीं करना तथा जाति आदि के अहंकार का अभाव होना मार्दव धर्म है ऐसा आर्य पुरूष कहते हैं।

जात्याद्यतिशयवतोऽपि सतस्तत्कृतमदावेशाभावादृमार्दव धर्म उच्चते।
भजते मदवृत्ति - मात्मवान् इवानात्महितप्रवर्तिनीं।

अर्थ- अथवा जाति आदि से अतिषयवान होकर भी मान का अभाव होना मार्दव धर्म कहलाता है।पर पदार्थों का अहंकार कौन ज्ञानीपुरूष करता है, अर्थात कोई नहीं।

मादर्व धर्म का फल

यस्मादाविर्भवति, विततिर्दुस्तरापन्नदीनां,
यस्मिन् शिष्टाभिरूचितगुण-ग्रामनामापि नास्ति।
यश्चव्याप्तं वहति वधधीधूम्यया क्रोधदावं,
तं मानाद्रिं परिहर दुरा- रोहमौचित्यवृत्ते।।16।।

अर्थ- मान रूपी पर्वत से बड़ी विशाल, दुस्तर जिसका तैरना बड़ा मुश्किल है ऐसी आपत्ति रूपी नदी उत्पन्न होती है। और उस मान रूपी पहाड़ में सदाचार का नाम भी नहीं होता है। जिसमेें क्रोध रूपी दावानल और हिंसा रूपी धुआं व्याप्त रहता है, जिस पर आरोहण करना अत्यंत कठिन है, उस मान रूपी पर्वत को सदाचारी व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए।

स ज्ञानी कुरूते दोष-मपमानकरं न यः।
न कुर्वाणः पुनर्मान-मपमानविवर्द्धकम्।।17।।

अर्थ- अपमान को बएत्राने वाले मान को नहीं करता हुआ ज्ञानी अपमान को करने वाले दोष को भी नहीं करता है।।17।।

औचित्याचरणं विलुप्यति-पयोवाहं नभस्वामिन,
प्रध्वंसं विनयंनयत्यहिरिव, प्राणस्पृशां जीवितं।
कीर्ति कैरविणीं मतंगज इव, प्रोन्मूलयत्यंजसा,
मानो नीच इवोपकारनिकरं, हन्ति त्रिवर्गं नृणाम्।।18।।

अर्थ- मान श्रेष्ठ आचरण को नष्ट कर देता है, जैसे मेघ, सूर्य के तेज को लुप्त कर देता है, मान, विनय को नष्ट कर देता है, जैसे सर्प प्राणियों के जीवन को नष्ट कर देता है, मान, कीर्ति को नष्ट कर देता है, जैसे हाथी कमलिनी को जडत्र से उखाड़ कर नष्ट कर देता है, उसी प्रकार मान मनुष्य के त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) को नष्ट कर देता है जैसे नीच पुरूष उपकार के समूह को नष्ट कर देता है।

ज्ञानरत्नमपाकृत्य, गृहणात्यज्ञानपन्नगम्।
गुरूनपि जनो मानी, विमानयति गर्वतः।।19।।

अर्थ- मानी पुरूष गर्व से गुरू का भी अपमान करता है, उस मान करने वाले व्यक्ति को आचार्य कहते हैं कि वह ज्ञान रूपी रत्न को फेंकर अज्ञान रूपी सर्प को ग्रहण करता है।

प्रोत्तुगंमानशैलाग्र-वर्तिभि र्लुप्तबुद्धिभिः।
क्रियते मार्गमुल्लंड.य पूज्यपूजाव्यतिक्रम।।20।।

अर्थ- बहुत ऊंचे मान रूपी पर्वत की चोटी पर स्थित नष्ट बुद्धि वाला व्यक्ति पूज्य और पूजा का व्यतिवम का मोक्ष मार्ग को नष्ट कर देता है।

करोत्युद्धतधी र्मानाद् विनयाचारलंगनम्।
विराध्याराध्यसनतानं, स्वेच्छायाचारेण वर्तते।।21।।

अर्थ- उद्धतबुद्धि वाला पुरूष मान से विनयाचार का उल्लंघन करके और आराध्य की परिपाटी का विराधन करे स्वेच्छाचार पूर्वक प्रवृत्ति करता हे।

मानमालम्ब्य मूढात्मा, विघत्ते कर्म निन्दितं।
कलंकयति चाशेष, चरणं चन्द्रनिर्मलम्।।22।।

अर्थ- मूढ़त्मा मान का अवलम्बन लेकर निन्दित कर्म को करता है और चन्द्रमा के समान निर्मल चारित्र को भी कलंकित कर देता है।

मानग्रन्थि मनस्युच्चै, र्यावदास्ते दृढस्तदा।
तावद् विवेकमाणिक्यं, प्राप्तमप्यसर्पति।।23।।

अर्थ- जब तक मान रूपी ग्रन्थि- (गांठ) मन में दृढ रूप में लगी है, तब तक प्राप्त हुआ भी विवके रूपी मणि दूर भाग जाता है।

लुप्यते मानतः पुंसां, विवेकाऽमललोचनं।
प्रच्यवन्ते ततः शीघ्रं, शीलशैलाग्रसंक्रमात्।।24।।

अर्थ- प्राणियों के विवके रूपी निर्मल नेत्र मान करने से बंद हो जाते हैं तब वे शील रूपी पर्वत के अग्रभाव से शीघ्र ही च्युत हो जाते हैं।

क्व मानो नाम संसारे, जन्तु व्रजविडम्बके।
यत्र प्राणी नृपो भूत्वा, विष्ठामध्ये कृमि र्भवते्।।25।।

अर्थ- संसार की विडम्बना में प्राणियों का मान कहां रहता हैं, जहां पर राजा भी मरकर विष्ठा में कीडा हो जाता है।

अहंकार हि यः कुर्या - दुष्टोभेदं कुदुःख्दम्।
विनाश्य दर्शनं सोऽपि, नीचो नीचगतिं व्रजेत्।।26।।

अर्थ- जे पुरूष दुख को देने वाले आठ प्रकार के अहंकार को करता है, वह नीच सम्यग् दर्शन को नष्ट करके नीचगति को प्राप्त होता है।

हीनयोनिषु बंभ्रम्यो, चिरकालमनेकधा।
उच्चगोत्रे सुकृत् प्राप्ते, कोऽन्यो मानं समुद्वहेत्।।27।।

अर्थ- चिरकाल से अनेक प्रकार की हीन योनियों में भ्रमण करके, पुण्य के उदय से उच्च गोत्र केप्राप्त होने पर ऐसा कौन होगा जो मान को धारण करेगा।

जातिरूपकुलैश्वर्य - शीलज्ञानतपोबलैः।
कुर्वाणाऽहंकृतिं नीचं, गोत्र, बध्नाति मानवः।।28।।

अर्थ- जाति, पूजा, रूप, कुल, ऐश्वर्य, शील, ज्ञान, तप, बल इन आठ पदार्थों का मद करने वाला प्राणी नीच गोत्र का बन्ध करता है।

आठ प्राकर का गर्व करना सभी अनर्थों का मूल है।

यस्तु प्राप्याप्युत्तमत्वं कुलाद्यैः, अन्यान् बुद्य्या मन्यमानो विशिष्टान्।
अन्यान् कांश्चित् नावजानाति धीमान्, नीचैर्वृत्या युज्यते वाधिकेषु।।29।।
पृष्टोऽप्यन्यै र्नान्यदोषान् ब्रवीति, नात्मानं वा स्तौति निर्मुक्तमानः।
उच्चैर्गोत्रं नाम कर्मैष धीमान्, बध्नातीष्टं जन्मवासे प्रजानाम्।।30।।

अर्थ- उच्चगोत्र के बंध के कारण - जो उत्तम कुल आदि को पाकर, बुद्धि से अन्य लोगों केा विशिष्ट मानता हुआ भी किसी का अपमान नहीं करता है और नम्रवृत्ति से सहित है।

दूसरों के द्वारा किसी अन्य के दोष पूंछें जाने पर भी नहीं कहता है और मान से रहित होकर, अपनी प्रशंसा भी नहीं चाहता है, ऐसा धीमान् पुरूष उच्च गोत्र का बन्ध करता है।

अथ मानाद् महतामपि महतीं स्वार्थक्षतिं ज्ञात्वा तदुच्छेदाय मार्दवभावनां मुमुक्षोरवश्यकर्तव्यंतथोपदिशति।

अर्थ- मान से महापुरूषों की भी बहुत बड़ी क्षति होती है ऐसा जानकर उस मान को नष्ट करने के लिए, मुमुक्षु को निरंतर ही मार्दव धर्म की भावना अवश्य भाना चाहिए।

सत्यं वाचि मतौ श्रतुं हृदि दया, शौर्य भुजे विक्रमो,
लक्ष्मी र्दानमनूनमर्थि निचये, मार्गे गतिर्निर्वृते।
येषां प्रागजनीह तेऽपि निरहं-काराः श्रुते र्गोचराः,
चित्रं संप्रति लेशतोऽपि न गुणा, स्तेषां तथाऽप्युद्धताः।।31।।

अर्थ- वाणी में सत्यता, बुद्धि में श्रुत, हृदय में दया, भुजाओं में शूरता, भिक्षार्थिओं के लिये इच्छित दान को लक्ष्मी, मोक्ष मार्ग में गमन, जिनके पास ये सब थे, फिर भी वे अहंकार से रहित थे ऐसा आगम में कहा है। किंतु आश्चर्य की बात यह है कि, आज उपर्युक्त गुण अंश मात्र भी नहीं है फिर भी लोग उदण्डता करते हैं।

भावयन् जातिकुलाभिरूप्य-विभूतिधीशक्तितपोर्चनाभिः।
स्वोत्कर्षमन्यस्य सधर्मणो वा, कुर्वन् प्रघर्षं प्रदुनोति दृष्टिम्।।32।।

अर्थ- जाति कुल रूप धन ज्ञान, शक्ति तप पूजा के द्वारा, अपना अथवा दूसरे साधर्मीयों का उत्कर्ष करके अहंकर करने वाला अपने सम्यग्दर्शन को मलिन करता है।

जाति मद

माता की अपेक्षा जाति ग्रहण करना चाहिए। वह जाति चार प्रकार की होती है। दिव्याजाति, विजयाजाति, परमाजाति, स्वजाति। पिता की अपेक्षा से कुल ग्रहण किया जाता है। मेरी माता संघपति की बेटी है। सुलोचना, सीता, चन्दनबाला आदि के समान शीलवती है। जैसे जाति कुल से शुद्ध मेरे माता-पिता है वैसे अन्य के नहीं है इस प्रकार जाति कुल आदि के मद से आविष्ट पुरूष तिर्यंचादि योनियों में भ्रमण करता हुआ भिनन भिन्न जातियों की स्त्रियों का समुद्र के पानी से भी अधिक दूध पिया और और अनन्त तिर्यग् मनुज नारियों के वियोग सेउत्पन्न हुए शोक से इतनी अश्रु धारा छोड़ी कि यदि उनको संग्रह किया जाय तो समुद्र के पानी से भी अधिक हो जाय। इस प्रकार उच्च नीच गोत्र में उत्पन्न होकर अन्नत माता-पिता से संबंध हुआ है ऐसा जानकर मन-वचन-काय से जाति, कुल आदि का मद नहीं करना चाहिए।

अब जातिमद का निराकरण कैसे किया जाता है, उसका कथन करते हैं भी आत्मन्! जो उच्च जाति तुमने प्राप्त की है, सो वह जीव का स्वभाव नहीं है। यह जाति कर्मोदय से प्राप्त हुई है। इस जीव ने मनुष्य भव में अनेक जातियां प्राप्त की हैं, जैसे चाण्डाली, शावरी, मालिनी, दासी, घीवरी इत्यादि।

हे आत्मन्! तेरे द्वारा तिर्यंच गति में शूकरी, कूकरी (कुतिया) गर्दभी, गधी, श्रृगाली, महिषी (भैंस), घोडी, ऊष्ट्री, हस्तिनी, सिंहनी, गाय, बकरी इत्यदि नीच पर्यायों को अनेक बार प्राप्त किय और अनेक बार हीन जातियों को प्राप्त करके एक बार उच्च जाति को प्राप्त किया है।

कर्म की गति विचित्र है, कुत्ता देव हो जाता है, देव कुत्ता हो जाता है। राजा भी कीड़ा हो जाता है और कीड़ा राजा हो जाता है, चण्डाल देव हो जाता है, देव चण्डाल हो जाता है। इसलिये जाति मद को छोड़कर मार्दव धर्म को धारण करना चाहिए।

कुलमद

पितृपक्ष को कुल कहते हैं मेरे पिता का वंष अत्यंत उज्ज्वल है ब्रह्महत्या, ऋषिहत्या आदि दोषों से रहित है। प्रसिद्ध, विशाल, उन्नत कुल में, मैं उत्पन्न हुआ हूं। मेरे समान अन्य का कुल नहीं है। उच्च कुलीन मनुष्य भी कर्मोदय वश हीन कुल में उत्पन्न हो जाता है। स्वर्ग का ऋद्धि धारक देव भी चण्डाल हो सकता है। हे आत्मन्! तुम आत्म स्वरूप को समझे विना माता के रज और पिता के वीर्य से उत्पन्न हुये शरीर में मिथ्या अभिमान करके सम्यग्दर्शन को मलिन क्यों करते हो?

बहुत भारी पुण्य के उदय से तुमने उत्तम कुल प्राप्त किया है इसलिये संयम शीलव्रत तप के द्वारा उसे सफल करना चाहिए। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह, अभक्ष्य भक्षण, रात्रि भोजन आदि हीन कर्म कभी नहीं करना चाहिए। वही उच्च कुल का गौरव है। इत्यादि चिन्तवन द्वारा कुलमद का निराकरणहोने से मार्दव धर्म होत है।

रूप मद

जैसा रूपवान मैं हूं, वैसा पृथ्वी तल में अन्य कोई नहीं है। काम देव के रूप से भी अधिक रूपवान मैं हू। इस प्रकार रूपक ा मद नहीं करना चाहिए। मेरे जैसे रूपवान पुरूष संसार में अनेक है, मैं ते कुरूप और विनाशीक रूप से ुक्त हूं। इस प्रकार चिनतर करने वाला रूप मद से रहित होता है।

यह शरीर का रूप विनाशीक है, चिदानन्द आत्मस्वरूप से भिन्न है। ऐसी भावना करने वले मुनि के रूपक ा मद कैसे हो सकता है अर्थात नहीं हो सकता। यह रूप प्रतिक्ष्ण विध्वंसी, रोग वियोग दारिद्रय, जरा (बुढ़ापा) आदि से अल्प काल में सुन्दर रूप भी विरूप हो जाता है। इसलिय हड्डी चर्म मय शरीर के रूप में मद करना महा अनर्थकारी है। परमार्थ से तो केवलज्ञान ही आत्मा रूप है। जिस केवलज्ञान में लोक अलोक प्रतिबिम्बित होता है। अतः रूप मद को छोड़कर मार्दव की सिद्धि के लिये अविनाशी ज्ञान स्वरूप की वृद्धि करना चाहिए।

ऐश्वर्य मद

मेरे समान हाथी, घोड़ा, रथ, सेना, धन, धान्य, पुत्र, पौत्र आदि सम्पदा अन्य के पास नहीं है। मैं ही सब ऋद्धियों से युक्त हूं। मेरे पास लाखों, करोड़ो की गिनती का धन है, फिर भी मेरे द्वारा छोड़ दिया गया, अन्य मुनि अधर्मी होते हुये दीक्षा को ग्रहण किया। इस प्रकार का गर्व कभी नहीं करना चाहिए। किंतु ऐसा विचार करना चाहिए।

मेरे से भी ज्यादा धन ऋद्धि से युक्त राज सम्पदा अधिक होती है उससे भी बलभद्र चक्रवर्ती आदि की सम्पदा अधिक होती है उससे भी इन्द्र अहमिन्द्र की सम्पदा और अधिक होती है, उससे अर्हन्त भगवान् की सम्पदा उत्तरोत्तर अधिक-अधिक होती जाती है। इस प्रकार चिन्तवन करनेवाले के ऐश्वर्य मद का अभाव होता है।

राज्य के दोष
वह्वपायमिदं राज्यं, त्याज्यमेव मनस्विनां।
यत्र पुत्राः ससोदर्या, वैरायन्ते निरन्तरम्।।33।।

अर्थ- यह राज्य बहुत पाप का कारण है, इसलिये त्याज्य ही है। जिस धन के लिए सगा पुत्र भी शत्रु बन जाता है। धन के लोभ से ज्ञानी भी दोषी धनवान् का आश्रयकरते हैं।

वयोवृद्धास्तपोवृद्धा, ये च वृद्धा बहुश्रुताः।
सर्वे ते धनवृद्धस्य, द्वारि तिष्ठन्ति किंकराः।।34।।

अर्थ- उम्र में वृद्ध, तप में वृद्ध, ज्ञान वृद्ध ये सभी धनवान के द्वार पर किंकर बन कर बैठते हैं। महापुरूषों का वैभव विकार का हेतु नहीं होता।

औद्धत्यं नवनिधिभिः प्रदीयमानैः, न द्रव्यैरपरिमितैः स संप्रपेदे।
तोयौघैरिव जलधि र्नदोपनीतैः, धीरणां न हि विभावो विकारहेतुः।।35।।

अर्थ- नवनिधियों के द्वारा दी जाने वाली बहुत भारी द्रव्य से जो घमण्ड को प्राप्त नहीं हुये, ऐसे धीर पुरूषों को वैभव विकार का कारण नही ंहोता। जैसे नदियों से लाये हुए जल से समुद्र विकार को प्राप्त नहीं होता।

सुखं प्राप्तुं बुद्धि र्यदि गतमलं मुक्तिवसतौ,
हितं सेवध्वं भो जिनपतिमतं पूतरूचितम्।
भजध्वं मा तृष्णां कतिपयदिनस्थायिनि धने।
यतो नायं भव्य! कमपि मृतमन्वेति विभवः ।।36।।

अर्थ- निर्दोष मुक्ति रूपी नगर के सुख प्राप्त करने की इच्छा है तो, हें भव्य! पवित्र और हितकारी जिनेन्द्र भगवान के मत की सेवा करो। कुछ दिन स्थिर रहने वाले धन में तृष्णा मत करो, क्योंकि मरने के बाद वैभव तुम्हारे पीछे जाने वाला नहीं है।

इन्द्रचापनिभा लक्ष्मी रधु्रवा मोहमातृका।
अतृप्तिजननी निन्द्या, कथं स्याद् रतये सतां।।37।।

अर्थ- लक्ष्मी इन्द्र धनुष के समान अध्रुव है, मोह के उत्पन्न करने वाली है। अतृप्तिकारी है, निन्द्य है, ऐसी नश्वर लक्ष्मी से सज्जनों को प्रीति कैसे हो सकती है अर्थात् नहीं हो सकती।

सम्पदो जलतरंगवल्लोला, लक्ष्म्या, कोऽपि न वल्लभः।
’’निर्द्रव्यो धनचिन्तया धनपति-स्तद्रक्षणे चाकुलः’’ ।।38।।

अर्थ- सम्पत्ति जन तरंग के समान चंचल है लक्ष्मी का कोई स्वामी नहीं होता। गरीब को धन की चिंता होती है और धनवान को उसकी रक्षा करने की आकुलता होती है।

मन को हरनेवाली स्त्रियां जिनकी, सहृदय, और बान्धव अनुकूल है और ज की वाणी सुनकर किंकर नम्रीभूत हो जाते हैं। जहां हाथियों का समूह गर्जना कर रहा हो, अनेक घोड़े हों इत्यादि अनेक प्रकार की सम्पदा हो किंतु नेत्रों के बन्द होने पर कुछ भी नहीं है।।61।।

अर्थ- यह ऐश्वर्य क्षण भंगुर है चतुर्गति के भ्रमर का कारण है। इन्द्रअहमिन्द्र आदि के ऐश्वर्य भी नष्ट होने वाले हैं, यहां तक कि चक्रवर्ती नारयण बलभद्र आदि के वैभव भी जब नष्ट हो जाते हैं तो अनरू की क्या कथा इसलिए ऐश्वर्य मद का त्याग करने से मार्दव धर्म होता है।

खुली आंख में दिखने वाले मन को हरण करने वाली स्त्रियां अनुकूल भाई - बन्धु नम्री भूत नौकर, गरजत हुए हाथी, चंचल घोड़े आंख बंद होने पर कुछ भी नहीं है।

’’ज्ञान मद का फल’’

मेरी बुद्धि तीक्ष्ण है, सर्वत्र अप्रतिहत है वेद, न्याय, सिद्धान्त आदि मेरे द्वारा पढ़े गये हैं, इसलिये मैं विद्वान हूं, शास्त्री हूं, कवि हूं, गमक हूं, चतुर हूं, मैं वादी हूं, मेरे समान कोई विद्वान शास्त्री, कवि आदि नहीं है इस प्रकार जो मद नहीं करता है और विचार करता है मेरे से भिन्न अनेक ज्ञानी इस संसार में है उनके आगे मैं क्या हूं। श्रुत ज्ञानियों के ज्ञान से अवधि ज्ञानियों का ज्ञान विशेष अधिक है उससे मनः पर्यय ज्ञानियों का ज्ञान और अधिक होता है उससे भी केवल ज्ञानियों का ज्ञान विशेष अधिक है अर्थात् सर्वोत्कृष्अ है। उनके आगे मैं अल्पज्ञ हूं इस प्रकार जब चिन्तन होता है तब ज्ञान मद का निराकरण होता है।

शिल्पि मद भी नहीं करना चाहिए, मेरे समान चित्र बनाने वाला, लेप कार्य करने वाला अन्य नहीं है। मेरे समान महल आदि की रचना करना कोई अन्य नहीं जानता, और रथादि के बनाने में जैसा मेरा अभ्यास हैवैसाअन्य का नहीं है, इस प्रकार के मद के निराकरण करने के लिये ऐसा विचार करना चाहिए मुझसे भी अच्छी चित्र क्रिया में कुशल, महल और रथ आदि बनाने वाले अनेक लोग हैं, उनके आगे तो मैं लेश मात्र भी शिल्पि क्रिया को नहीं जानता हूं। इस प्रकार अपनी आलोचना करके जब निर्मद पने को प्राप्त होता है तब शिल्पिमद का अभाव होता है।

’’बल मद’’

मैं महावली शतभट् सहस्रभट, लक्षभट, कोटिभट हूं बहुत से जनसमूह से भी जिसका बल अनिवार्य है, सर्वशत्रु समूह को नष्ट कराने वाला हूं, मुझ से अन्य कोई बलवान नहीं है इत्यादि प्रकार से जो मद नहीं करता है, वह विवेकी जीव सोचता है कि मुझसे अन्य अनेक शक्ति शाली पुरूष इस लोक में विराजमान है, उनके सामने मैं क्या हूं।

तीर्थंकर, चक्रवर्ती और महर्षियों का अपरिमित बल होता है। इनके महाबल को जानकर अपने बल का मद नहीं करना चाहिए।।59।।

गद्य- बारह मनुष्यों का बल एक बैल में होता है, बारह बैलों का बल एक घोड़ा में होता है, बारह घोड़ों का बल एक भैसा में होता है, सौ भैसों का बल एक हाथी में होता है, सो हाथियों का बल एक सिंह में होता है, सौ सिंहो का बल एक बलभ्रद में होता है और सौ हाथियों का बल एक सिंह में होता है, सौ सिंहो का बल एक बलभ्रद में होता है और सौ बलभद्रों का बल एक नारायण में होता है, सौ नारायणों का बल एक चक्रवर्ती में होता है और सौ चक्रवर्तियों का बल एक तीर्थंकर में होता है, इसलिये बलवान पुरूषों को अपने सू दूसरों का अधिक बल जानकर बल का मद नहीं करना चाहिए।

’प्रशंसनीय बल’’

जिस बल से कर्मशत्रुओं को जीता जाता है तथा काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों को जीता जात है, वह बल प्रशंसनीय है किंतु निर्बल अनाथ आदि जीवों को मारना, परधन हरण करना, कुशील सेवन करना, छेदन भेदन करना, दुराचर में प्रवृत्ति करना, शिकार करना इत्यादि कार्यें में बल का उपयोग करना नरक तिर्यंच गति के बन्ध का कारण है तथा जैसा बल मेरे में है वैसा दूसरों में नहीं है इत्यादि परिणामों का होना बलमद कहा जाता है इसलिये बलमद के परिहार से ही मार्दव धर्म होता है।

’’तप मद’’

गद्य- ख्याति पूजा लाभादि से रहित अनशन अवमौदर्य आदि तप को करने वाला मैं ही हूं अथवा पंचमहाव्रत आदि त्रयोदश प्रकार के चारित्र को पालन करने वाला हूं अथवा सामायिक आदि चारित्र का रक्षक मैं ही हूं। मैं ही साधु हूं इस प्रकार का मद जो नहीं करता है और अपने मन में विचार करता है कि अन्य तपस्वी बहुत चारित्रवाल है उनके आगे मेरा तप कितना सा है? इस प्रकार विचार करने पर तप मद का अभाव होता है। बड़े-बड़े योगियों ने महा घोर तप किया है ऐसा जान कर तप मद को नष्ट करना चाहिए।

पूजामद

मैं अपने कुटुम्ब के मध्य में प्रतिष्ठित हूं। मुझ पर नगर और देष्ज्ञ के लोग विश्वास करते हैं, जहां कहीं भी जाता हूं, वहां सत्कार पूर्वक सम्मान को प्राप्त होता हूं इस प्रकार के पूजा मद को करने वाला व्यक्ति अधोगति का पात्र होता है।

उत्तम मार्दव धर्म कथानक

लक्ष्मीमति की कथा-

मगध देश के लक्ष्मी नामक ग्राम में सोमदेव नाम का ब्राह्मण रहता था,उसकी पत्नि का नाम लक्ष्मी मति था वह रूप और सौभाग्य की मानो साक्षात् मूर्ति थी किुंतु यौवनावस्था से ही उसका मन उन्मत्त था। वह हमेशा विप्रपने के गर्व से मण्डित रहती थी। एक बार पक्षोपवास आदि तपों की खान स्वरूप समाधिगुप्त नामक मुनि आहार हतु नगर में आये विप्र ने उनको भक्ति पूर्वक दान देने के लिए पत्नि से कहा कि है प्रिये! गुणवन मुनिराज को भोजनकराओ। ऐसा कह कर वह ब्राह्मण घर से बाहर चला गया ओर कार्य में व्यस्त हो गया। लक्ष्मीमति मुनि के मलिन शरीर को देखकर ग्लानी करने लगी और किवाड़ बन्द करके बैठ गई इस प्रकार की निंदा से वह भयंकर नरक की वेदना को प्राप्त हुई वहां से निकल कर कुष्ट रोग वाले श्रीर को प्राप्त हुई उस पाप के कारण परिवार के लोगों ने उसे घर से निकाल दिया, वह कुष्ट रोग को सहन करने में असमर्थ होने के कारण अग्नि में लकर मर गई, फिर धेबी के यहां गधी हुइ्र, वहां पर भी दूध न मिलने से मरकर शूकरी हुई। फिर कुतिया हुई, आश्चर्य है हलाहल विष खाने से प्राणी काएक ही भव कष्टदायी होता है, किंतु मुनि की निंदा करने से भव भव में दुख होता है बाद में वह भृगुकच्छ नामक देश मंें नर्मदा के तट परधीबर की पुत्री दुर्गन्धा हुई, वहां पर नाव को तारती हुई काल व्यतीत करने लगी। एक बार नदी के तीर पर मुनि को देखकर प्रणाम किया और कहा, कि भगवान् मेरे पिछले भ्व बताने का कष्ट करें। मुनि राज ने सके पूर्व भव का वर्ण किया। यह सुनकर बोली ’हे भगवान! पड़ती हुठ्र कुयोनियों से मेरी रक्षा करो। मुनि ने उसे क्षुल्लिका के व्रत प्रदान किये उसके फलस्वरूप वह स्वर्ग गयी। वहां से आकर कुण्ड नगर में राजा भीष्म की पुत्री हुई जो रूप गुण से सम्पन्न थीं, उस कन्या का रूकमणी नाम पड़ा जो कि श्री कृष्ण की पटरानी हुई। इस प्रकार पुण्य पाप मान अपमान के को जान कर मार्दव धर्म की रक्षा करना चाहिए।

’’ज्ञान मद’’

सुना जाता है कि एक विद्वान जो कि बनारस से अनेक भाषाओं पर अधिकार प्राप्त करके आया था, नदी पार करके अपने स्थान पर जाना चाहता था।नौका पर सवार हुआ ओरआगे बढा विद्वान ने नाविक सेपूछा क्या आप संस्कृत भाषा जानते हो? नाविक ने उत्तर दिया नहीं। विद्वान ने कहा कि आपका पच्चीस प्रतिशत जीवन बेकार है। इतना कह कर पुनः दूसरा प्रष्न पूंछा- क्या आप इंग्लिश का भी नालेज नहीं रखते? नाविक ने कहा नहीं विद्वान ने उपेक्षा करे हुए कह - तब ो आपकी पचास प्रतिशत जिन्दगी बेकार है, बेचारा नाविक चुप था। उसने कभी स्कूल का मुख नहीं देखा था, नाव नदी के बीच में पहुंच चुकी थी, बीच में तूफान आ गया नाव डगमगाने लगी, तब नाविक ने पूंछा आप तैरान तो जानते होंगे, क्योंकि हो सकता है, तूफान से नाव पलट जाय। पंडित जी ने उत्तर दिया भैया मैं तेरान नहीं जानता हूं नाविक ने कहा भैया मेरी तो पचास प्रतिशत जिन्दगी बेकार थी, आपकी ते सौ प्रतिशत जिन्दगी बेकार है। भाग्य से तूफान आ गया नाव पलट गई, पंडित जी डूबने लगे ब नाविक बड़ी मुश्किल से उनको बचा पाया। नाविक ने काह जीवन का क्या भरोसा यह तोपानी में उठे हुये बुलबुले के समान है, इसलिये किसी भी विद्या का घमण्ड नहीं करना चाहिए।

’’बल मद’’

अर्ध चक्रवर्ती रावण तीन खण्ड का आधिपत्य प्रापत करके भी दुर्गति का पात्र हुआ। रावण ने सीता हरण करके अपने कुल में दाग लगा लिया, विभीषण ने रावण को अनेक प्रकार से समझाया, किंतु अपनी शक्ति का घमण्ड होने के कारण उसने किसी की बात को स्वीकार नहीं किया, और युद्ध करने का संकल्प कर ही लिया। युद्ध से सारी सेना का बलिदान को गया। कुम्भकरण, इन्द्रजीत आदि महापुरूष बन्धन में पड़े रहे, किंतु फिरभी समझ में नहीं आया, स्वयं रण क्षेत्र में आया, राम-लक्ष्मण से युद्ध किया अंत में सुदर्शन चक्र भी लक्ष्मण को मारने के लिए छोड़ दिया, सुदर्शन चक्र लक्ष्मण जी की तीन परिक्रमा देकर रूक गया। तब लक्ष्मण ने पुनः कहां कि दशानन अब भी सीता जी को वापिस दे दो, लेकिन रावण नहीं माना, तब लक्ष्मण जी ने वही सुदर्शन चक्रउसके ऊपर चला दिया देखते-देखते रावण धराशायी हो गया। मनुष्य अल्प शक्तिवाला है, जब बल का मान होवें तब ऐसा विचार करना चाहिए कि हमसे अनन्त गुणी अधिक शक्तिवाला देव होता है, वह यदि चाहे तो एक अंगुली मात्र से जम्बूद्वीप को पलट सकता है फिर अपने पास क्या है। ऐसाविचार करने से बल का मद चूर होता है।

’’शरीर मद’’

महा भारत के निर्माता दुर्योधन ने अपने वंश को ही नष्ट कर डाला, उसको अपने शरीर का मान था, कृष्ण जी ने शांति दूत बनकर दुर्योधन से संधि करने को कहा किंतु वह नहीं माना, ओर महाभारत रच ही लिया, जल, धन की हानि हुई और अन्त में स्वयं मारा गया और दुर्गति का पात्र हुआ। कहा भी है ’तन का मान किया दुर्योधन मिट्टी से मिल गई जवानी’’ तोरी थोड़ी जिन्दगानी, ऐसा विचार कर बल का मद नहीं करना चाहिए।

दान मद’’

हस्तिनापुर नगर में राजा बलि ने सात सौ मुनियों के ऊपर घोर उपसर्ग किया। जैन मुनियों पर उपसर्ग करने कीप्रसन्नता परदान शाला खोल दी अैर विप्रो के लिए किमिच्छिक दान बांटा जाने लगा। विष्णु कुमार महामुनिराज को इस उपसर्ग का ज्ञान हुआ तो अपने ध्यान को छोड कर मुनियों की रक्षा हेतु हस्तिनापुर आये। विप्र का वेश बनाकर बलि राजा से तीन पग जमीन की याचना की उसने कहा कि कुछ ओर मांग लीजिए महाराज्! तब विष्णु कुमार विप्र वेश धारी ने उत्तर दिया कि मैं इससे अधिक नहीं चाहता, कितु तना जरूरी है कि उस तीन पग जमीन को मैं स्वय नापूंगा बलि ने स्वीकार कर लिया, तब विष्णु कुमार ने अपनी विक्रिया से एक पैर में लवण समुद्र तक नाप लिा, दूसरे पैर से मानुषेत्तर पर्वत तक का क्षेत्र नाप लिया अब तीसरा पैर रखने की जगह नहीं, तब बलि की पीठ पर पैर रखा यह आश्चर्य देख कर ’बलि’ आदि चारों मंत्रीयों का मदचूर हुआ। मुनि ने विष्णु कुमार मुनियों के उपसर्ग को दूर किया। तभी से रक्षा बंधन का पर्व प्रारंभ हुआ।

धन का मद

भरत चक्रवर्ती दिग्विजय पूर्ण होने के बाद वृषभाचल पर्वत पर प्रशास्ति लिखने गये, वहां पर उनका नाम लिखने के लिए भी खाली जगह नहीं थी, तबउनका मान खण्डित हो गया। सोचने लगे कि हमारे पर्वू में अनेक चक्रवर्ती हो गये, मैं अपनी विभूति का क्या घमण्ड करूं।

लघुता

आचार्य श्री विद्यासागर जी की सभा में लोगों ने जिनेन्द्र वर्णी जी से बोलने को कहा तब वर्णी जी ने कहा - मैं तुच्छ, नगण्य इतने बड़े आचार्य के साामने कैसे बोलूं। ये कहलाती है विनय ’’ज्ञाने मौनं, क्षमा शक्तौं’’ ज्ञान के होने पर मोन धारण करना और शक्ति होने पर भी क्षमा करना यह निरभिमानी के वश की बात है।

एक बार जिनेन्द वर्णी जी रामटेक में भी आचार्य श्री के दर्शनार्थ पधारे थे तब भी यह प्रसंग बना, आचर्य श्री स्वाध्याय करा रहे थे, आप सभी में आकर सामान्य व्यक्ति की तरह बैठ गये। स्वाध्याय के बाद आप आचार्य श्री के समझ जाकर चरणों में सादर नमोऽस्तु कया तब किसी ने परिचय कराया कि ये जिनेन्द वर्णी जी हैं। तब आचार्य श्री ने वर्णी जी को शूभाशीर्वाद देते हुये कहा कि थोड़ी देर आप व्याख्यान करो तब वर्णी जी ने उत्तर दिया - हे भगवन्! मैं छोटा सा बालक आपके सामने कैसे बोलने का साहस जुटाऊऊं। यही वास्तविक गुरू भक्ति एवं घमण्ड का अभाव कहलाता है।

विनय से विद्या

राजगृही नगर की बात है। एक झील की स्त्री को असमय में आम खाने का दोहला उत्पन्न हुआ। भील ने अनेक जगह आम खोजे किन्तु प्राप्त5 नहीं हुये, एक दिन राजा श्रेणिक के बगीचे में आम मिल गये तोड कर ले आया झील के पास अंतर्धान नाम की विद्या थी जिसके कारण वह सबाके देखता था किंतु उसको कोई नही देख पाता था। माली परेशान हो गया, रोज आम बगीचे से जाने लगे। राजा से शिकायत की गई, रजा ने अनेक सैनिक पहरे पर लगा दिये। एक दिन भील पकड़ा गया। राजा के पास उपस्थित किया गया। राजा ने पूछा तुम्हारे पास कौन सी विद्या है, जिसके बल से तुम आम चुरा लेते हो और लोग देख नहीं पाते। भील ने कहा हमारे पास अंतर्धान नाम की विद्या है जिसके बल में मैं सबाके देखता हूं मुझे कोई नहीं देख पाता राजा ने कहा वह विद्या यदि हमें सिखा दोेगे तो मैं तुम्हें दण्ड नहीं दूंगा। भील ने कहा कि हुजूर मैं विद्या सिखाने को तैयार हूं। पढ़ाना शुरू किया राजा ऊपर बैठा था भील नीचे थ, वह बार-बार कोशिश कर रहा था लेकिन राजा को विद्या सिद्ध नहीं हो रही थी। उसी समय श्रेणिक का पुत्र अभय कुकार आया और राजा से कहा कि आप गुरू बन कर विद्या सीखना चाहते हो या शिष्य? आप नीचे बैठे और गुरू को ऊपर बैठाये क्योंकि यह विद्या ग्रहण करने का मूल मंत्र है जैसे हीराजा स्वयं नीचे बैठा औरउसको ऊपर बैइाया तब क्षण मात्र में विद्या सिद्ध हो गयी, इसलिए विनय गुण ही सर्व सम्पदाओं को देने वाला है, ऐसा विचार कर कभी भी घमण्ड नहीं करना चाहिए।

मार्दवधर्म - अमृत बिन्दु

1. उत्तम मार्दव धर्म को पालने वाला व्यक्ति महान होता है।

2. फल से लदे हुये वृक्ष की तरह गुणवान् व्यक्ति नम्र होता है।

3. धर्म सबसे पहले झुकने का पाठ सिखाता है।

4. अभिमान आत्मा का स्वभाव नहीं है।

5. हृदय में कोमलता का न आना अहंकार है।

6. भक्त को पत्थर नहीं दिखाता, और अहंकारी को भगवना नहीं दिखाते हैं।

7. श्रमणों के पास आने में श्रम को तो करना पड़ता है किंतु भ्रम मिट जाता है।

8. ऊँट को ऊँचाई का भान पहाड़ के नीचे जाने पर ही होता है।

9. समस्त बालेां में पूर्वाेपार्जित पुण्य प्रबल है।

10. सारी दुनिया को पानी पिलाने वाला भी प्यासा मर जाता है। जैसे कृष्ण जी फिर प्राणी किसका घमण्ड करता है।

11. अहंकार के कारण आपस में भी मन मुटाव हो जाता है।

12. द्रव्य दृष्टि वाला पर्याय का अहंकार नहीं करता है।

13. दांत कड़े होते हैं, इसलिए बाद में आते हैं और पहले चले जाते हैं। जिह्वा कोमल और नम्र होती है, इसलिए जीवन के अंत तक साथ रही है।

14. कुंए के अन्दर जब बर्तन झुकता है तभी पानी भरता है अन्यथा नहीं।

15. गिरे हुए पत्ते से अपने धरासाई होने की शिक्षा ले सकते हैं।

16. भरत चक्रवर्ती को वृषभाचल का नाम लिखने कोई जगह नहीं मिली थी।

17. मान पत्र को हषर् से लेते हैं, पर क्रोध पत्र को नहीं लेना चाहता है।

18. गामा नाम का पहलवान अपने हाथ के बल से चलती हुई बस को रोक देता था, किंतु अंत में मुख पर बैठी हुई मक्खी को भी उड़ा नहीं सक था।

19. मान संसार को बढ़ाने वाला है, मार्दव संसार परिभ्रमण का छेद करने वाला है।

20. अभिमानी का व्रत शील संयम स्वाध्याय सब निष्फल है।

21. मार्दव धर्म पंचेन्द्रिय और मन को दण्डित करने वाला है।

22. अहंकार से अनेक कुबुद्धियां उत्पन्न होती हैं। मार्दव धर्म से अनेक विद्याये प्राप्त होती है।

23. अभिमानी के निपराध बैरी होेते हैं, निंदा मिलती है, और सब लोग उसका पतन चहाते हैं।

24. अभिमानी पिता से पुत्र, पुत्र से पिता, गुरू से शिष्य, शिष्य से गुरू, स्वामी से सेवक दूर हो जाता है अर्थात् छोड़ देता है।

25. विनयवान पुत्र शिष्य को देखकर, पिता और गुरू प्रसन्न होते हैं।

26. प्राणी कर्मों से कम कषायों से ज्यादा दुखी होते हैं।

मार्दव धर्म -अमृत दोहावली

भाव विशुद्ध हुये विना कैसा त्याग विराग।
मान करो मत त्याग का, करो मन का त्याग।।1।।

समझाने में है नहीं, है समझे में सार।
समझाने वाले कई, पडे वीच मझधार।।2।।

विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्ति परेषां पर पीडनाय।
खस्य साधे विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणय।।3।।

विद्या ददाति विनयं विनायाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनाद् धर्म ततः सुखम्।।4।।

नानक नन्हें वन रहो, जैसे नन्ही दूव।
बडे झाड़ कट जात हैं, दवू रहत है खूव।।5।।
v कंचन तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह।
मान बढ़ाई ईष्र्या, दुर्लभ तजती ऐह।।6।।

जो रहा किसी दिन बादशाह, वह पथ का आज भिखारी है।
जो रोटी को मुताज रहा, वह बना राज दरबारी है।।7।।

जिनकी पैदाईश में खुशियां, प्रातः आकाश गुंजाती थी।
कुछ देर बाद मैंने देखा, वे हा - हा कार मचाती थी।।8।।

अयं निजः परो वेत्ति, गणना लघुचेतसाम्।
उदार चरितानांतु - वसुधैव कुटुम्बकम्।।9।।
यत्र विद्वज्जनों नास्ति श्लाध्यस्तत्राल्पधीरपि।
निरस्त पादपे देशे, एरण्डोऽपि द्रुमायते।।10।।

आयु हीन नर को दवा, औषधि लगे न लेश।
त्यो ही मानी पुरूष को, वृथा धरम उपदेश।।11।।
मरघट में जाकर जगे, हर मन में वैराग्य।
हर नाते को फूक दे, वह मरघट की आग।।12।।

कर्मों की गति मन क्या जाने, सबको नाज नचावे।
अपने-अपने कर्मों का फल, तीर्थंकर भी पावे।।13।।

कारज धीरे हाते है काहे होत अधीर।
समय पाय तरूवर फले, केतक सीचो नीर।।14।।

शुद्धहृदय से कीजिए, मंदिर माँहि प्रवेश।
शुद्ध भाव से कीजिए, दर्शन वीर जिनेश।।15।।

।।ऊँ ह्रीं उत्तममार्दव धर्मांगाय नमः।।
इति उत्तम मार्दव धर्म