।। षष्ठ आवश्यक कर्म: दान ।।

दाता के गुण
श्रद्धा भक्तिस्तुष्टिर्विज्ञानमलुब्धता क्षमा शक्तिः।
यत्रैते सप्तगुणाः दातारं तं प्रशंसन्ति।।

श्रद्धा, भक्ति, तुष्टि, विज्ञान, अलुब्धता क्षमा और शक्ति; यह सात गुण दाता के हैं।

श्रद्धागुण

अपने मन में ऐसी श्रद्धा करना कि यह पात्र मेरे समस्त पापों को नष्ट करने में समर्थ है और मेरी दरिद्रता आदि दुखों को दूर करने में समर्थ है, दुर्बुद्धि को हरण करने वाला है। इस प्रकार पात्र से अद्वितीय प्रेम करना; यही कहलाता है श्रद्धागुण।

भक्ति गुण

साधु जब तक आहार करते हैं तब तक उनके समीप स्थिर रहना और आहार के दोषों का परिशोधन कर बड़ी भक्ति भावना से आहार देना तथा भोजनशाला में मार्जार कीट इत्यादि जन्तुओं को न आने देने क लिए भवन निरीक्षण करना, भोजन के अंत में साधुओं को भक्ति सहित नमस्कार करना, आभ्यन्तर परिणामों से साधु के मन को तृप्त करना और पात्र की सेवा में आभ्यनतर भावों से लवलीन रहना तथा पात्रों में अटूट प्रेम भावों का होना; यही है भक्तिभाव।

तुष्टिगुण

जिस प्रकार चन्द्र के उदय होने से समुद्र वृद्धि को प्राप्त होता हैं, परम आल्हादित होता है, उसी प्रकार मुनि रूपी चन्द्र का उदय होने पर दाता के हृदय का सन्तोषरूपी समुद्र आल्हाद से परिपूर्ण हो जावे इसी को कहते हैं तुष्टिगुण।

विज्ञानगुण

जो दोष को षमन करने वाला अर्थात, वात, पित, कफादि दोषों को शमन करने वाला, यथासाध्य व्याधि का हरण करने वाला, पात्र की प्रवृत्ति के अनुकूल ओर स्वस्थता को प्रदान करने वाला, निद्रा सदी-गर्मी आदि के उपद्रवों को नाश करने वाला, हल्का, पथ्यरूप, निरन्तर स्वाध्याय को वृद्धिगत करने वाला, ऐसा आहार अपने ज्ञान से, समस्त प्रकार के विचरों से पात्र की अनुकूलतापूर्वक अपने हाथ से दान करता हैं, कराता है, वह दाता का विज्ञानगुण है।

अलुब्धतागुण

दाता अपने भावों से अपनी समस्त विभूति और समस्त सामग्री पात्र के लिए प्रदान करने में भावों में संकोच करता है, बल्कि पात्र में धन का सदुपयोग होने पर अपने भावों से आल्हादित होकर निर्ममत्व भाव को प्रकट करता हैं; वह है अलुब्धतागुण दाता का।

क्षमागुण
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जो दाता संक्लेश परिणाम और क्रोध परिणामों का त्याग करता है, भय और हठ का परित्याग करता है, दुर्वचन तथा दुर्भावों का परित्याग करता है और कषयों से होने वाली दुश्चेष्टा का परित्याग करता है; वही दाता है।

शक्तिगुण

पात्र को सहज देखने मात्र से ही जिनके मन में पात्र लाभ की उमंग सहसा वृद्धिंगत होती है और अपनी शक्ति को नहीं छुपाकर निरंतर पात्रदान करने के लिए जो दाता समुद्यत रहता है वही शक्तिगुण को धारण करने वाला है। इस प्रकार दाता के सप्त गुणों का विवेचन किया। दाता के और भी बाहृ शुद्ध आदि अनेक गुण होते हैं।

उत्तमपात्र-दान-विधि
उत्तम नवधा भक्ति से, मध्यमपद के योग्य।
देते जो नर दान हैं, भोगभूमि हो योग्य।।93।।

अभी तक श्रावक के कुछ गुणों का विवेचन किया। अब किया जाता है कथन इस बात का कि किस पात्र को कैसे दान देना चाहिए। सुबह नौ बजे के बाद अपने द्वार पर हाथ में कुछ लोटा, नारियल आदि मांगलिक वस्तु लेकर खड़े हो जानाचाहिए। जब मुनिराज आवें तब हर्षित होते हुए उनका पडद्य़गाहन करें अर्थात उन्हें आते देखकर मधुर और मंद आवाज में इसप्रकार बोलें - हे स्वामिन्! नमोस्तु नमोस्तु, अत्र अत्र, तिष्ठ तिष्ठ आहार जल शुद्ध है। अगर उन मुनिराज की विधि मिलेगी तो वे आपके पास आकर रूक जायेंगे। उनको रूकते देख कर बोलें कि मन शुद्धि , वचन शुद्धि, काय शुद्धि, आहार जल शुद्ध है गृह-प्रवेश कीजिए। इतना कहकर भूमि-शुद्धि करे हुए आगे हो जायें। अपने आंगन में किसी काष्ठ की चैकी को पहले ही बिछा ाजयें। आंगन में आते ही मुनिराज को बेलें ‘‘हे! स्वामिन् उच्च आसन पर विराजिये।’’ जब मुनिराज आसन पर बैठ जाये ंतब एक लोटा में शुद्ध जल लेकर उनके चरण प्रक्षालित करें और गन्धोंदक मस्तिष्क से लगायें। तदनन्तर आष्ट द्रव्य से उनका पूजन करें और तीन प्रदक्षिणा देवें तथा पंचांग नमस्कार करें। इसके पश्चात बोलें- ‘‘मनशु;ि, वचनशुद्धि, कायशुद्धि आहार-जल शुद्ध है, हे स्वामिन्! भोजनशाला में प्रवेश कीजिये।’’ मुनिराज खड़े होकर प्रवेश कर दें भोजनशाला में। वहां उनको बिछे हुएपाटे की ओर इशारा करते हुए कहें-स्वामिन।उच्च आसन पर विराजिये।’जब मुनिराज विराजमान हो जाये ंतब चैके में बनाई हुई समस्त वस्तुओं को एक थाली में लगाकर मुनिराज के सामने लावें और एक-एक वस्तु के नाम बतायें। फिर मुनिराज जिसे निकलवायें उसे निकाल देना चाहिए, बची हुई शेष वस्तुओं को किसी ऊंची टेबल पर रखें और एक लोटे में जल भरकर फिर से शुद्धि बोलें तथा उनके हाथ धुलावें। जब मुनिराज सिद्धभक्ति बोलकर खड़े हो जाये ंतब सर्वप्रथम उन्हें पानी,दूध देना चाहिए। उसके बाद क्रम से सभी वस्तुओं को देना चाहिए। बीच-बीच में पानी भी दिखाते जाना चाहिए। जब मुनिराज का आहार सानन्द हो जाये ंतब आनन्दित होकर भजन-विनती आदि बोलना चाहिए। किसी कपड़े से उनके हाथ-पैर साफ करें, फिर उनको कुछ समय अपने आंगन में आसन पर विराजमान कर उनके मुख से आशीर्वचन सुनें। उनके कमण्डलु में अठपहरा पानी भरें और उनको यथास्थान पहुंचाने जायें।

मध्यमपात्र-विधि

जिस प्रकार से उत्तम पात्र को आहार दिया जाता है उसी प्रकार से मध्यम पात्र को भी आहार दिया जाता है। आर्यिका माताओं की आहार-विधि प्रायः मुनिराज के समान होती हे, कुछ-2 क्रियओं में थोउ़-बहुत अंतर होता हैं। जब ऐलक या क्षुल्लक आहार लेने के लिए आवें तो उनको देखकर इस प्रकार बोलें- ‘हे स्वामिन्! इच्छामि, अ-अत्र तिष्इ-तिष्ठ, आहार-जल शुद्ध है’। तदतन्तर शुद्धि बोलकर गृह-प्रवेश करावें और आंगन में उच्चासन पर बिठाकर उनके पैर धुलावें। कहीं-कहीं अध्र्य चढ़ाने को भी बताया है। भक्ति के साथ शुद्धि बोलकर, नमस्कार कर भोजनशाला में प्रवेश करावें। अगर क्षुल्लक जो हैं तो एक छोटा साबर्तन उनके हाथ में दे दें। अगर वे अपना बर्तन लाये हों तो देने की आवश्यकतानहीं है। मुनि महाराज की तरह भक्तिपूर्वक उन्हें आहार करवें। अगर ब्रह्मचारी आदि व्रती श्रावक होवें तोउनको पहले दि नही निमन्त्रण देना चाहिए और दूसरे दिन उन्हें सविनय बुलाकर लाना चाहिए। भोजन की थाली सामने लाकर ‘आहार-जल शुद्ध है; भोजन ग्रहण कीजिए’ ऐसा कहकर वन्दना करें और उनके समीप बैठकर उन्हें भक्ति से भोजन करावें।

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