।। नवध भक्ति ।।

श्रावक दस प्रकार की पूर्वोक्त शुद्धियों का ध्यान रखते हुए वयं के लिए भोजन तैयार करता हैं, वह श्रावक अपने छह कत्र्तव्यों का पालन करने में सदैव संलग्न रहता है। जब उसे सातिशय पुण्य सेउसे सच्चे देव-शास्त्र-गूरू तीनों का सान्निध्य प्राप्त होता है तो अपने भाग्य की सराहना करते हुए कत्र्तव्य पालन करने में संलग्न हो जाता है। सत्पात्रों में उत्तम पात्रों को आहर दान देने का इच्छुक वह दाता मुनिराजों की शुद्धि हेतु अपने चैके से शुद्ध प्रासुक (24 घंटे की मर्यादा वाला गर्म) पानी शुद्ध वस्त्र पहिन कर मुनिराजों के पास ले जाता है। पुनः मुनिराज शुद्धि करके श्री जिनेन्द्र भगवान के सामने सिद्ध व योग भक्ति करने के पश्चात अपने मन में नियम लेकर आहार चर्या हेतु आहार मुद्रा में (दायें हाथ को अपने कंधे पर रखकर बांय हाथ में पिच्छी-कमण्डल लिये हुए अथवा सामान्य मुद्रा में, कदाचित् मुद्रा चैके के सामने भी ग्रहण कर सकते हैं) निकलते हैं। दाता नवधा भक्ति से युक्त होता हुआ आहार दान हेतु प्रवृत्त होता है। नवधा भक्ति का अर्थ है - नौ प्रकार से भक्ति (मन, वचन, काय-कृत, कारित, अनुमोदन से भक्ति) करना। अथवा नौ प्रकार की निम्नांकित भक्ति नवधा भक्ति कहलाती है।

1 - पड़गाहन

2 - उच्चासन

3 - पाद प्रक्षालन

4 - अर्चना / पूजन

5 - नमस्कार

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6 - मन शुद्धि

7 - वचन शुद्धि

8 - काय शुद्धि

9 - आहार-जल शुद्धि

1 - पड़गाहन - आचार्य, उपाध्याय, साधु अथवा तीर्थंकर आदि महापुरूष, द्वादशांग के पाठी श्रुत केवली, शैच्य, वादी-प्रतिवादी मुनिराज परमतप को धारण करनेवाले दिगम्बर साधुओं को आहार हेतु सामने से आते देखते ही बोलना प्रारम्भ करें -

‘‘हे स्वामिन् नमोऽस्तु................. नमोऽस्तु................. नमोऽस्तु................. जब निकट आ जाएं तब बोले अत्र................. अत्र.................. तिष्ठ.............. अत्र तिष्ठ.....ं मुनिराज सामने अपना नियम देखते हैं। मन्दिर जी से जब आहार हेतु निकले थे तब कुछ नियम सोच कर/संकल्प लेकर निकले थे..................। उनका वह नियम वहां मिल जाएगा तो वे वहां खड़े रह जाएं.....।

तब दाता शुद्धि बोलते हुए अत्यन्त प्रसन्नता के साथ भाव विभोर हुआ तीन परिक्रमा लगाये। जिनके द्वारा नियम मिला है वे परिक्रमा लगायें कदाचित सभी लगा सकते हैं। परिक्रमा लगाते समय ध्यान रखें कि पैर किसी जीव पर न पड़े हरी घास आदिया कच्चेपानी पर अथवा किसी गंदे पदार्थ कपड़ों की चिन्दी या प्लास्टिक के गंदे टुकड़ों परभी न पड़े, बिना शोला वाले सभी दूर हरें। पड़गाहन हेतु खड़े होने से पहले ही उस स्थान की शुद्धि कर लेनी चाहिए वहां मांगलिक स्वरूप चैक आदि भी पूर लेनाचाहिए। यह विशेष भक्ति का प्रतीक है। तीन परिक्रमा लगाकर पुनः शुद्धि बोलें! हे स्वामिन्! मन शुद्धि वचन शुद्धि-काय शुद्धि-आहार जल शुद्ध है। मम गृह प्रवेश कीजिए। पुनः मार्ग शुद्धि बोलते हुए मुनिराज के आगे-आगे चलें। किन्तु साइड में चलें उन्हें पीठ करके न चलें। राई में प्रवेश करने के पूर्व अपने पैर शुद्ध जल से धै लें। तब पुनः शुद्धि बोलते हुए पड़गाहन करने वाले एवं चैके के अन्दर विद्यमान श्रावक व श्राविकाएं महाराज श्री से निवेदन करें- ‘‘हे स्वामिन् भोजनशाला में प्रवेश कीजिए।’’ इस प्रकार पड़गाहन करना प्रथम भक्ति है।

2 - उच्चासन- महाराज श्री जब चैके में आ जाए त बनके बैठने के लिए लकड़ी का पाटा लगा दें। निवेदन करें, ‘‘हे स्वामिन्! उच्चासन ग्रहण कीजिए।’’ (ध्यान रखें, पाटा समनाइका आदि का न हो अथवा फेवीकाॅल, सरिस आदि से निर्मित न हो। न ही चैके में सनमाइका या फेवीकाॅल आदि के प्रयोग से निर्मित चैकी आदि ही रखें क्योंकि ये वस्तुएं अशुद्ध होती है। पाटे के रखने से पहले देख लें कि उसके नीचे कोई जीव जंतु न हो तथा वह पाटा बैठने/खड़े होने से हिले नहीं क्योंकि पाटे के हिलने से जीव वद्य की संभावना रहती है।

3 - पाद प्रक्षालन - जब परम पूज्य आचार्य श्री/उपाध्याय श्री/मुनि श्री उच्च आसन, पाटे या चैकी पर विराजमान हो जाएं, तब प्रासुक जलादि से उनके चरण कमल धोवें। पुनः गंधोदक/चरणोदक अपने उत्तमांगों में लगाएं.....। उस थाली एवं गिलास को अलग रख दें उन बर्तनों का प्रयोग भाोजन के लिए न करें व स्वच्छ कपड़े से उनके पैर पोंठ दें।

4 - अर्चना/पूजन- दिगम्बर साधुओं की अष्ट द्रव्य से पूरी पजन करनी चाहिए। पूजन करते समय आचार्य श्री/उपाध्याय श्री/मुनि श्री का नाम मालूम न हो अथवा यह भी ज्ञान न हो कि आचार्य परमेष्ठी हैं। उपध्याय परमेष्ठी हैं या साधु परमेष्ठी, तब मुनि श्री (मुनीन्द्राय) कहकर उनकी पूजा कर लेनी चाहिए। पूजा की विधि निम्नांकित हैं.........ऐसे भी पूजन कर सकते हैं -

आहवानन छंद
‘‘विषय कषाय आरंभ परिग्रह परिग्रह, रहित मोह से है! मुनिवर।
ज्ञान ध्यान तप लीन निरंतर, स्वपर हितैषी हे ! गुरूवर।।
भक्ति भाव से तुम्हें बुलाऊं, हृदय कमल में आजाओ।
हे पावन परमेश्वर मेरे, भवदधि पार करा जाओ।।
दोहा-
आह्वान करता गुरू-मन मंदिर हो वास।
सत्य समर्पण भक्तिवश-तुम्हें पुकारे दास।।--

नोट- थाली, ठौना, कलश पर स्वस्तिक बना लें।

1 - हथ में पीले चावल या लवंग आदि से आह्वानन-स्थापना व सन्निधि करण करें।

2 - आचार्य श्री की पूजन के समय ऊँ ह्मौं.............../मुनि श्री पूजन के समय ऊँ ह्मः बीजाक्षरों का प्रयोग करना चाहिए।)

ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (महाराज श्री का नाम मालूम हो तो यहां नाम लें) अत्र अवतर अवतर! संवौषट् आह्वानम्
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (महाराज श्री का नाम मालूम हो तो यहां नाम लें)
अत्र अवतर अवतर! संवौषट् आह्वानम्
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम............) अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनाम्।
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम..........) अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणं।
पुष्पांजलि क्षिपामि...............। (पीले चावल/लौंग क्षेपण करें)
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम..............) महाराजाय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। (तीन बार जल धरा पूर्वक जल चढ़ाना चाहिए)
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम..............) महाराजाय संसार ताप विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। (चन्दन अनामिका उंगली से चढ़ाना चाहिए)
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम..............) महाराजाय अक्ष्ज्ञय पद प्राप्ताये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा। (अक्षत सफेद चावल चढ़ाना चाहिए)
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम..............) महाराजाय कामवाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। (पुष्प/पीले चावल चढ़ाना चाहिए)
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम..............) महाराजाय क्षुध रोग विनाशाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। (नैवेद्य/सफेद चटक आदि चढ़ान चाहिए)
ऊँ ह्मूँ/ ह्मौं/हः प0 पू0 मुनीन्द्र श्री (नाम..............) माहोन्धकार विनाशानाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। (दीपक/पीली चटक चढ़ना चाहिए)

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