|| दशलक्षण महापर्व ||

पर्वों की चर्चा जब भीचलती है, तब-तब उनका संबंध प्रायः खाने-पीने और खेलने से जोड़ा जाता है, जैसे-रक्षाबंधन के दिन खीर और लड्डू खोय जाते हैं, भौंरे खेले जाते हैं, राखी बांधी जाती है; होली के दिन अमुक पकवान खाये जाते हैं, रंग डाला जाता है, होली जलाई जाती है; दीपावली के दिन पटाखे चलाये जाते हैं; आदि-आदि।

पर अष्टाहिन्का और दशलक्षण जैसे जैनपर्वों का संबंध खाने और खेलने से न होकर खाना और खेलना त्यागने से है। ये भोग के नहीं, त्याग के पर्व हैं; इसलिए महपर्व हैं। इनका महत्व त्याग के कारण है, आमोद-प्रमोद के कारण नहीं। पर किसी भी जैन से पूछिये क दशलक्षण महापर्व कैसे बनाया जाता है तो वह यही उत्तर देगा कि इन दिनों लोग संयम से रहते हैं, पूजन-पाठ करते हैं, व्रत-नियम-उपवास रखते हैं, हरित पदार्थों का सेवन नहीं करते। स्वाध्याय और तत्व-चर्चा में ही अधिकांश समय बिताते हैं। Read More...