।। धर्मभावना ।।
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भोला जगत भले ही चिन्तामणि रत्न अैर कल्पवृक्ष के गीत गता हो, उनकी तुलना धर्म से करता हो; पर धर्म की तुलना में वे कहां ठहरते हैं? चिन्तामणि रत्न और कल्पवृक्ष दोनों ही अनन्तसुख-शान्ति देनेवाले पावन धर्म की समानता नहीं कर सकते।

इसप्रकार धर्मभावना में रत्नत्रय धर्म की अचिन्त्य महिमा बताकर जीवन को धर्ममय बना लेने की पावन प्रेरणा दी जाती है।

यहां एकपश्न संभव है कि कल्पवृक्षों स दीनतापूर्वक नहीं मांगना पड़ता, अतः दीनतापूर्वक मांगने की बात क्यों कही जा रही है?

भाई! दीनता बिना मांगना संभव ही नहीं है। मांगने में दीनता आती ही है। मांगना स्वयं दीनता है, वह दीनतास्वरूप ही है। मांगने को तो मौत के समान कहा गया है -

’’रहिमन वे नर मर गये, जो नर मांगने जाँय।
उनसे पहले वे मेरे, जिन मुख निकसत नाँय।।

रहिम कवि कहते हैं कि वे व्यक्ति मानो मर ही गये हैं, जो दूसरों के घर मांगने जाते हैं; क्योंकि जिनका स्वाभिमान मर गया, वे मरे हुए के समान ही हैं; किंतु स्वाभिमान खोकर मांगने पर भी जिनके मुख से इन्कार निकलता है, वे उनसे भी पहले मर चुके हैं - यह समझना चाहिएः क्योंकि समर्थ होने परभीदेने से इन्कार करना मांगने से भी बुरा है।’’

अतः बिना मांगे अतीन्द्रियानन्द देनेवाले धर्म की तुलना में मांगने र भोगसामग्री देनेवाले कलपवृक्ष तुच्छ ही हैं।

धर्मभावना के सन्दर्भ मं पावन प्रेरणा के साथ अतिसंक्षेप में धर्म का स्वरूप स्पष्ट करनेवलो कतिपय कथन इसप्रकार हैं -

’’जो भाव मोह तैं न्यारे, दृग-ज्ञान-व्रतादिक सारे।
सो धर्म जबै जिय धारै, तब ही सुख अचल निहारे।।1

दर्शनमोह और चारित्रमोह से भिन्न जो आत्मा के सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र भाव हैं, वे ही धर्म हैं। जब यह जीव इन धर्मों को धारण करता है, तभी अचलसुख को प्राप्त करता है।

दर्शनज्ञानमय चेतना, आतमधर्म बखानि।
दया-क्ष्मादिक रतनत्रय, यामें गर्भित जानि।।2

दर्शन-ज्ञानमय ज्ञानचेतना ही आतमा का धर्म है; दया, क्षमा आदि तथा सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चाहिरत्ररूप रत्नत्रय भी इसी में गर्भित जानने चाहिए।’’

निश्चय-व्यवहार की संधिपूर्वक भी धर्मभावनाक का स्वरूप स्पष्ट कियागया है -

’’ज बतप संयम शील पुनि, त्याग धर्म व्यवहार।
’दीप’ रमण् चिद्रूप निज, निश्चय वृष सुखकार।।3
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स्वयं को सम्बोधित करते हुए पंडित दीपचन्दजी कहत हैं कि हे आत्मन्! जप, तप, शील, संयम और त्याग आदि तो व्यवहारधर्म हैं; सच्चा सुख देनेवाला निश्चयधर्म तो चैतन्यस्वरूप निजपरमात्मा में रमणता ही है।’’

इसीप्रकार का भाव आचार्य कुन्दकुन्द ने द्वादशानुप्रेक्षा में भी व्यक्त किय हैं धर्मभावना में वे कार्तिकेयानुप्रेक्षा के समान ही श्रावक और मुनिधर्म का वर्णन करने के उपरानत लिखते हैं -

निश्चयनय से यह आतमा श्रावकधर्म और मुनिधर्म दोनों से ही भिन्न है; अतः मध्यस्थभाव से एक शुद्धात्मा का ही सदा चिन्तवन करना चाहिए।’’

ज्ञानानन्दस्वाभावी निज भगवान शुद्धात्मा की आराधना ही वास्तविक धर्म है, निश्चयधर्म है; इसके बिना किया गया सर्व क्रियाकाण्ड निष्फल है, किंचित् मात्र भी कार्यकारी नहीं है - इस तथ्य का चिन्तन भी धर्मभावना ममें भरपूर किय जाता है। इस सन्दभर्् में कविवर बुधजन कृत बारह भावना का निम्नांकित छनद द्रष्टव्य है -

’’जिय न्हान-धोना तीर्थ जाना धर्म नाहीं जप-जपा।
तन नग्न रहना धर्म नाहीं धर्म नाहीं तप-तपा।।
वर धर्म निज आतमस्वभावी ताहि बिन सब निष्फला।
बुधजन धर्म निज धार लीना तिनहिं कीना सब भला।।

जीव का धर्म नहाना-धेना, तीर्थयात्रा करना, जप-तप करना, नग्नतन रहना नहीं है। श्रेष्ठ धर्म तो आत्मस्वभाव की रमणता ही है; उसके बिना नहाना-धोना, तीर्थयात्रा करना, जप-तप करना, नग्न रहना सभी निष्फल हैं, अकार्यकारी हैं। महाकवि बुधजन कहते हैं कि वही बुद्धिमान है ‘- विद्वान है, जिसने निजात्मा की आराधनारूप निजधर्म धारण कर लिया है; उसने ही अपना और पराया सबका भला किया है।’’

इसीप्रकार का भाव पंडित सदासुखदासजी ने भी व्यक्त किया है, जो इसप्रकार है संसार में ’धर्म’ ऐसा नाम तो समस्त लोक कहता है; पंरतु धर्म शब्द का अर्थ तो ऐसा हे कि जो नरक-तिर्यंचादि गति में परिभ्रमणरूप दुःख से आत्मा को छुड़ाकर उत्तम, आत्मिक, अविनाशी, अतीन्द्रिय मोक्षसुख में धरता है, वह धर्म है।

सो ऐसा धर्म मोल नहीं आता है; जो कि धन खर्च करनके दान-सम्मानादिक द्वारा प्राप्त किया जावे। तथा किसी के द्वारा दिया नहीं जाता जो कि सेवा-उपासना से राजी करनके लिया जावे। तथा मन्दिर, पर्वत, जल, अग्नि, देवमूर्ति व तीर्थादिकों में नहीं रखा है; जो कि वहां जाकर लाया जावे। तथा उपावा , व्रत, कायक्लेशादि तप एवं शरीरादि कृश करने से भी नहीं मिलता है। तथा देवाधिदेव के मन्दिर मं उपकरणदान, मण्डलपूजनादि से, गृह छोड़कर वन-शमशान में बसने से एवं परमेश्वर के नाम जपने से भी धर्म प्राप्त नहीं होता है।

धर्म तो आत्मा का स्वभाव है। पर में आत्मबुद्धि छोड़कर अपने ज्ञाता-दृष्टारूप स्वभाव का श्रद्धान, अनुभव तथा ज्ञायकस्वभाव में ही प्रवर्तनरूप आचरा ही धर्म है। जब उत्तमक्षमादि दशलक्षणरूप अपने आत्मा का परिणमन तथा रत्नत्रयरूप परिणति तथा जीवों की दयारूप आत्मा की परिणति होती है, तब आत्मा स्वयं ही ार्मरूप होगा; परद्रव्य-क्षेत्र कालादिक तो निमित्तमात्र हैं। जब यह आत्मा रागादिरूप परिणति छोड़कर वीतरागरूप होता है, तब मन्दिर, प्रतिमा, तीर्थ, दान, तप, जप-समस्त ही धर्मरूप हैं; और यदि अपना आत्मा उत्तमक्षमादि वीतरागरूप सम्यग्ज्ञानरूप नहीं परिणमे तो कहीं भी धर्म नहीं है।

यहां शुभराग हो, वहां पुण्यबन्ध होता है। जहां अशुभराग-द्वेष-मोह हो वहां पापबन्ध होता है। जहां शुद्ध श्रद्धान-ज्ञान-स्वरूपाचरणरूप धर्म है, वहां बन्ध का अभाव है। बन्ध क अभाव होने पर ही उततम सुख होता है; अतः वही धर्म है1’’

योगीन्दुदेव योगसार में लिखते हैं -

’’जई-जर-मरण-करालियउ तो जिय धम्म करेहि।
धम्म-रसायणु पियहि तुहुं जिय अजारमर होहि।।
धम्मु ण पढियइं होहि धम्मु ण पोत्था-पिछियइं।
धम्मु ण मढिय-पएसि धम्मु ण मत्था-लचियइं।
राय-रोस बे परिहरिवि जो अप्पाणि वसेइ।
सो धम्मु वि जिण-उत्तियउ जो पंचम-गइ णेइ।।1
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