।। चैबीस तीर्थंकर एवं विद्यमान बीस तीर्थंकर ।।

प्रश्न 90 - सबसे बड़े समवसरण का विस्तार कितना होता है?

उत्तर - सबसे बड़े समवसरण का विस्तार 12 योजन होता है।

प्रश्न 91 - सबसे छोटे समवसरण का विस्तार कितना होता है?

उत्तर - सबसे छोटा समवसरण 1 योजन का होता है।

प्रश्न 92 - समवसरण किसे कहते हैं?

उत्तर - तीर्थंकर की धर्मसभा के स्थान को समवसरण कहते हैं। समवसरण का शाब्दिक भाव है, जो स्थान संसार के समस्त जीवों को शरण देने में समर्थ है वह समवसरण कहलाता है।

प्रश्न 93 - समवसरण में स्थित भगवान का दर्शन कौन करते हैं?

उत्तर - समवसरण में स्थित भगवान का दर्शन केवल सम्यग्दृष्टि जीव ही करते हैं। मिथ्यादृष्टियों की भावना ही नहीं होती है। कुछ मिथ्यादृष्टि जीव मानस्तम्भ तक पहुंचकर सम्यग्दृष्टि बन जाते हैं।

प्रश्न 94 - समवसरण में कितनी सीडि़यां होती हैं?

उत्तर - समवसरण में बीस हजार सीडि़यां होती हैं।

प्रश्न 95 - मसवसरण की प्रत्येक सीड़ी की ऊंचाई कितनी होती है?

उत्तर - समवसरण की प्रत्येक सीड़ी की ऊंचाई 1 हाथ होती है।

प्रश्न 96 - समवसरण में कौन-सी गति के जीव जाकर धर्मामृत का पान करते हैं?

उत्तर - नारकियों को छोड़कर शेष मनुष्य तिर्यंच, देव सभी भगवान की दिव्य ध्वनि का पान करते हैं।

प्रश्न 97 - कितनी इन्द्रियों के धारक जीव समवसरण में भगवान की दिव्य ध्वनि सुनते हैं।

उत्तर - केवल संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव।

प्रश्न 98 - समवसरण की आठ भूमियों के नाम क्रम से बताइये।

उत्तर - 1- चैत्य प्रासाद भूमि, 2- खाातिक भूमि, 3- लता भूमि, 4- उपवन भूमि, 5- ध्वज भूमि, 6- कल्पवृक्ष भूमि, 7- भवन भूमि एवं, 8- श्री मंडप भूमि।

प्रश्न 99 - चैत्यप्रसाद भूमि कैसी है?

उत्तर - चैत्य प्रासाद भूमि में एक-एक जिनमन्दिर के अंतराल के पांच देव प्रासाद रहते हैं ये तीर्थंकरों से 12 गुने ऊंचे होते हैं। चारों दिशाओं में एक-एक मानस्तम्भ एक-एक बाबड़ी होती है। इसमें पृथक-पृथक गलियों में दो-दो नाट्यशालायें होती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में 32-32 रंगभूमियां होती हैं। प्रत्येक रंग भूमि में 32-32 देवियां। नृत्य करती हुईं तीर्थंकरों का गुणगान करती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में दो-दो धूप घट रहते हैं।

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प्रश्न 100 - खातिका भूमि कैसी होती हैं?

उत्तर - ये खातिका भूमि एक प्रकार की खाई होती है जो अपने तीर्थंकर की ऊंचाई के चतुर्थ भाग होती हैं।

प्रश्न 101 - तीसरी लता भूमि कैसी होती है?

उत्तर - ये एक प्रकार का लता वन है इसमें लताएं रहती हैं।

प्रश्न 102 - चैथी उपवन भूमि की रचना किस प्रकार की है?

उत्तर - चैथी उपवन भूमि में पूर्वदिदिशा के क्रम से, अशोक, सप्तच्छद चंपक एवं आम्रवन हैं। इनके बीचों-बीचों एक-एक चैत्य वृक्ष जिसके मूलभाग में चारों दिशाओं में जिन प्रतिमायें विराजमान हैं। इस उपवन भूमि की बाबडि़यों में लोग अपने सात भव देख लेते हैं। इस वन भूमि की गलियों के दोनों पाश्र्व भागों में दो-दो नाट्यशालयें हैं इस वन भूमि को घेरे हुए वेदी पर यक्षेन्द्र देव पहरा देते हैं।

प्रश्न 103 - समवसरण की पांचवी भूमि की रचना बताइये।

उत्तर - पांचवतीं भूमि में, सिंह, गज, वृषभ, गरूड़, मयूर, चन्द्र, सूर्य, हंस, कमल और चक्र दशचिन्हों से युक्त प्रत्येक चिन्ह की प्रत्येक दिशा में 108-108 ध्वजायें होती है इनमें भी प्रत्येक ध्वजा की 108-108 परिवार ध्वजायें रहती हैं इसको घेरकर चांदी के परकोटे पर द्वार रक्षक देव भवनवासी देव हैं।

प्रश्न 104 - समवसरण की छठी भूमि की रचना किस प्रकार की है?

उत्तर - समवसरण की छठी भूमि का नाम कल्पवृक्ष भूमि है इसमें 10 प्रकार के कल्पवृक्ष रहते हैं। ये सब नाम के अनुसार ही फल-वस्तुएं प्रदान करते हैं। इस भूमि में पूर्वादि दिशा के क्रम से नमेरू मंदार, संतानक तथा पारिजात ये चार सिद्धार्थ वृक्ष होते हैं इनमें चारो तरफ चार सिद्ध प्रतिमायें विराजमान रहती हैं।

प्रश्न 105 - दश प्रकर के कल्पवृक्ष कौन-कौन से हैं?

उत्तर - दश प्रकार के कल्पवृक्षों के नाम इस प्रकार हैं-

1- पानांग, 2- तूर्यांग, 3- भूषणांग, 4- वस्त्रांग, 5- भोजनांग, 6- आलयांग, 7- दीपांग , 8- भाजनांग , 9- मालांग एव, 10 तेजांग

प्रश्न 106 - पानांग जाति के कल्पवृक्ष क्या फल प्रदान करते हैं?

उत्तर - पानांग जाति के कल्पवृक्ष मधुर सुस्वाद छहों रसों युक्त पुष्टि कारक बत्तीस प्रकार के पेय पदार्थों को प्रदान करते हैं।

प्रश्न 107 - तूर्यांग जाति के कल्पवृक्ष क्या फल प्रदान करते हैं?

उत्तर - तूर्यांग जाति के कल्पवृक्ष उत्तरम बाजा, पट्, पहट, मृदंग आदि वादि यंत्रों को प्रदान करते हैं।

प्रश्न 108 - भूषणांग जाति के कल्पवृक्षाों का कार्य बताइये।

उत्तर - भूषणांग जाति के कल्पवृक्ष- कंकण, कटि सूत्र हार, माला मुद्रिका आदि भूषणों को प्रदान करते हैं।

प्रश्न 109 - वस्त्रांग जाति के कल्पवृक्ष जीवों को क्या प्रदान करते हैं?

उत्तर - वस्त्रांग जाति के कल्पवृक्ष, चीनपट्टु, क्षौमादि वस्त्रों को प्रदान करते हैं।

प्रश्न 110 - भोजनांग जाति के कल्पवृक्षों का कार्य बताइये।

उत्तर - भोजनांग जाति के कल्पवृक्ष सोलह प्रकार के आहार, सोलह प्रकार के व्यंजन, चैदह प्रकार की दालें, एक सौ साठ प्रकार के खाद्य पदार्थ, 363 प्रकार के स्वाद्य पदार्थ, एवं त्रेषठ प्रकार के रसों को देते हैं।

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