।। आस्त्रवभावना ।।

समयसार में तो यहां तक कहा है -

’’जाव ण वेदि विसेसंतरं तु आदासवाण दोह्णंपि।
अण्णणी तावदु सो कोहादिसु वट्टे जीवो।।
कोहादिसु वट्टंतस्स तस्स कम्मस्स संचओ होदि।
जीवस्सेवं बंधो भणिदो खलु सव्वदरिसीहिं।।
जइया इमेण जीवेण अप्पणो आसवाण य तहेव।
णादं होदि विसेसंतरं तु तइया ण बंधो से।।1

जबतक यह जीव आत्मा और आस्त्रव - इन दोनों में परस्पर अन्तर और भेद नहीं जानता है; तबतक वह अज्ञानी रहता हुआ क्रोधादिकरूप आस्त्रवभावों में ही प्रवर्तित रहता है।

क्रोधादिक में प्रवर्तमान जीव के कर्मों का संचय होता है। जीव को कर्मबंधन की प्रक्रिया सर्वज्ञदेव ने इसीप्रकार बताई है।

जब यह जीव आत्मा और आस्त्रवों का अन्तर और भेद जातना है, तब उसे बंध नहीं होता।’

अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि हम आत्मा और आत्मा की ही पर्याय में उत्पन्न मोह-राग-द्वेषरूप-पुण्य-पापरूप आस्त्रवभावों की परस्पर भिन्नता भली-भांति जानें, भली-भांति पहिचानें तथा आत्मा के उपादेयत्व एवं आस्त्रवों के हेयत्व का निरंतर चिन्तन करें, विचार करें, क्योंकि निरन्तर किया हुआ यही चिंतन,यही विचार आस्त्रवभावना है।

ध्यान रहे उकत चिन्तन, विचार तो आस्त्रवभावना का व्यावहारिकरूप है अर्थात! यह तो व्यवहार- आस्त्रवभावना है। निश्चय- आस्त्रवभावना तो आस्त्रवभावों से भिन्न भगवान आत्मा के श्रृद्धान, ज्ञान व ध्यानरूप परिणमन है।

यह आस्त्रवभावना स्वयं संवररूप होने से आस्त्रवभावों की निरोधक और वीतरागभावों की उत्पादक है।

आस्त्रवभावों की निरोधक एवं वीतरागभावों की उत्पादक इस आस्त्रवभावना का निरंतर चिन्तन कर आस्त्रवभावों से भिन्न भगवान आत्मा के श्रद्धान, ज्ञान एवं ध्यानरूप परिणमन कर सम्पूर्ण जगत वीतरागी सुखशान्ति को प्राप्त करें - इस पावन भावना से विराम लेता हूँ।

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