शुम्भत्प्रभावलय-भूरिविभा विभोस्ते,
लोकत्रय-द्युतिमतां द्युतिमाक्षिपन्ती।
प्रोद्यद्-दिवाकर-निरन्तर भूरिसंख्या,
दीप्त्या जलत्यपि निषामपि सोम-सौम्याम् ।।34।।

        अन्वयार्थ - अन्वयार्थ- (लोकत्रय-द्युतिमताम्) तीनों लोकों के कान्तिमान पदार्थों की (द्युतिम्) कान्ति को भी (आक्षिपन्ती) तिरसकृत करती हुई (ते विभोः) आप-प्रभु की (शुम्भत्प्रभावलयभूरिविभा) शुभ्र-भामण्डल की विशाल प्रभा (दिप्त्या) अपनी दीप्ति से (प्रोद्यद् विदवाकरनिरंतर-भूरिसंख्या) उदय होते हुए अन्तररहित अनेक सूर्यों जैसी कान्ति से उपलक्ष्ति होकर (अपि) भी (सोम-सौम्याम्) चन्द्रमा की सौम्य-शीतल (निशाम् अपि) रात्रि को भी (जयति) जीत रही है।।34।।

पद्यानुवाद
तुम तन भामण्डल जिनचंद, सब दुतिवन्त करत है मंद।
कोटि शंख रवितेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करै अछाय।।
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अर्थ - अभिप्राय

        हे भगवन्! आपके भामण्डल की ज्योतिर्मयी प्रभा तीन जगत् के सभी ज्योति वाले पदार्थों की ज्योति को लज्जित कर देती है औरएक साथ उदित हुए सहस्त्रों सूयों के प्रकाश से अधीक प्रकाश वाली होती हुई भी वह भामण्डल की प्रभा, पूर्णमासी की शीतल चन्द्रिका को भी पराजित कर देती है। अर्थात् भामण्डल की प्रभा सहस्त्रों सूर्यों की प्रभा से अधिक होने पर भी किसी को सन्ताप नहीं पहुॅंचाती है, प्रत्युत चन्द्रमा की चाँदनी से भी अधिक शान्ति प्रदान करती है।

        भगवान जहाँ विराजमान होते हैं, वहाँ दिन-रात्रि नहीं होता, वहाँ चन्द्रमा-सूर्य की आवश्यकता नहीं होती, वह स्थान सदा प्रकाशवान रहता है। जब सन्त-महात्माओं के मुख परएक अनुपम तेज झलकता है तब तीर्थकर भगवान के परम औदारिक दिव्य देह से निकलने वाली ज्योति के क्या कहने? भगवान केी शरीर से निकलने वाली ज्योति जो गोलाकार होती है, उसे ही भामण्डल कहते हैं। आगम में उल्लिखित है भव्य जीवों को उस भामण्डल में अपने तीन अतीत, एक वर्तमान और तीन भावी-कुल सात भवों का ज्ञान हो जाता है। यदि आगामी भवों की संख्या कम हो तो कम ही भव दिखाई देेते हैं। भगवान की आत्मा जब कर्ममल से रहित हो जाती है, पूर्ण सर्वज्ञता प्रकट हो जाती है, सकल परमात्मा बन जाते हें तभी उनकी देह भी इतनी पवित्र ओर तेजस्वी हो जाती है कि उनके शरीर से प्रकाश निःसृत होता रहता है। तेरहवें गुणस्थान परइस अवस्था का प्रादुर्भाव होता है। भगवान के शरीर से निकला हुआ तेज, जो करोड़ों सूर्यों के तेज से भी तेजस्वी है फिरभी वह चन्द्रमा के प्रकाश जैसी शीतलता प्रदान करने वाला हे, आतापकारी नहीं है। उसी प्रकार भगवान की मधुर वाणी संसार की पीड़ा को हरण करने वाली तथा सुख-शान्ति को प्रदान करने वाली है।

मूल पाठ
स्वर्गापवर्गममार्ग-विमार्गणेष्टः
सद्धर्मतत्वकथनैक-पटुस्त्रिलोक्याः।
दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थसर्व-
भाषाभाव - परिणामगुणैः प्रजोज्यः।।35।।

        अन्वयार्थ -(ते) आपकी (दिव्यध्वनिः) दिव्यध्वनि (स्वर्गापवर्गममर्ग-विमार्गणेष्टः) स्वर्ग और मोक्ष को जाने वाले मार्ग को खोजने में इष्ट (त्रिलोक्याः) तीना लोक के जीवों के सद्धर्मतत्त्व-कथनैक-पटुः सम्यक् धर्मतत्त्व के कथन करने में अत्यन्त प्रवीण और (विशदार्थ-सर्व-भाषा-स्वभाव-परिणामगुणैः प्रयोज्यः) स्पष्ट अर्थ वाली समस्त भाषाओं में परिवर्तित होने वाले स्वाभाविक गुणों से प्रयुक्त सहित (भवति) होती है।।35।।

पद्यानुवाद
स्वर्ग मोक्ष मारग संकेत, परम धरम उपदेशन हेत।
दिव्य वचन तुम खिरैं अगाध, सब भाषा-गर्भित हितसाध।।
अर्थ - अभिप्राय

        हे भगवन्! आपकी दिव्य ध्वनि विलक्षण गुणसे युक्त है, स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग बताने वाली, तीन लोक के प्राणियों को सत्य धर्म का रहस्य समझाने में कुशल, स्पष्ट अर्थात् विशद् अर्थ वाली है और संसार की सभी भाषाओं में परिणत होने के कारण आति विलक्षण है।

        भगवान के नगाड़े की आवाज को सुनकर जब देव, मनुष्य और तिर्यंचगति के जीव अपने कल्याणार्थ अपने-अपने स्थान पर समवसरण में बैठे होते हैं तब ओंकाररूपी निरक्षरी वाणी खिरती है। जो सब भाषायम हो जाती है और प्राणी चाहे किसी भी भाषा का जानने वाला हो वह अपनी-अपनी भाषा में समझ लेता है। इतना ही नहीं पशु-पक्षी भी अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते हैं। भगवान की वाणी ब भाषामयी होने में उनका विशेष पुण्य निमित्त कारण है। आगम में उल्लिखित है कि भगवान की दिव्य ध्वनि एक योजन अर्थात् चार कोस तक सुनाई पड़ती है। दिव्य ध्वनि अर्थात् भगवान की वाणी भव्य जीवेम के पुण्य से दिन में चार बार-प्रातः, दोपहर, सायंकाल और अर्ध-रात्रि को बिना इच्छा के खिरा करती है। समवसरण में हजारों लाखों जीव अपने-अपने विचार, जिज्ञासाएं, शंकाएं सँजोए होते हैं। भव्य जीवों के पुण्य के उदय से जो वाणी सूक्ष्म संकेत रूप में खिरती है, उसमें सब प्राणियों की जिज्ञासा का समाधान हो जाता है। उस समय तो प्रत्येक प्राणी अपनी-अपनी योग्यता अनुसार उस वाणी को समझ लेत है। परन्तु गणधर देव उस वाणी को विस्तार से समझकर जनता-जनार्दन के हित भिन्न-भिन्न विषयों पर अलग-अलग उपदेश देते हैं जिसे द्वादशांग वाणी कहते हैं।

मूल पाठ
उन्निद्रहेम-नवपंकज-पुंजकान्ति,
पर्युल्लसन्-नख-मयूखशिखाभिरामौ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र! धत्तः,
पद्मानि तत्र विबुधाः परिकल्पयन्ति।।36।।

अन्वयार्थ -(जिनेन्द्र!) हे जिनेन्द्र! (उन्निद्रहेमनव-पंकजपुंजकान्ति) खिले हुए सोने के नवीन कमल समूह के समान कान्ति वाले तथा (पर्युल्लसन्नखमयूख-शिखाभिरामौ) चारों ओरसे शोभायमान नखों की किरणों के अग्र भाग से सुन्दर (तव) आपके (पादै) दोनों चरण (यत्र) जहाँ (पदानि) कदम (धत्तः) रखे हैं, (तत्र) वहाँ (विबुधाः) देव (पद्मानि) कमल (परिकल्पयन्ति) रच देेते हैं।।36।।

पद्यानुवाद
विकसित सुवरन कमल-दुति, नख-दुति मिलि चमकाहिं।
तुम पद पदवी जहं धरैं, तहं सुर कमल रचाहिं।।
अर्थ - अभिप्राय

        हे जिनेन्द्र! विकसित नूतन स्वर्ण-कमलों के समूह के समान दिव्य कान्ति वाले तथा सब ओर फैलने वाली नख-किरणों की ज्योति से अतीव सुन्दर लगने वाले आपके पवित्र चरण जहाँ-जहाँ टेकते हैं, वहाँ-वहाँ भक्त देवता पहले ही स्वर्ण-कमलों की रचना कर देते हैं।

        भगवान के विहार के समय देवगण पन्द्रह-पन्द्रह कल्पित स्वर्ण-कमलों की रचना पन्द्रह पंक्तियों में दो सौ पच्ची कमलों की रचना करते हैं। भगवान का चरण मध्य के कमल पर होता है। जैसे-जैसे भगवानअपना कदम आगे बढ़ाते हैं पीछे के कमलों की पंक्तियाँ सिमटकर आगे-आगे आ जाती है। इस प्रकार भगवान के प्रत्येक चरण के चारों ओर दो सौ पच्चीस कमल होते हैं। जिस प्रकार भगवान सिंहासन पर भी चार अंगुल अधर अन्तरिक्ष में विराजमान होते हैं, उसी प्रकार विहार के समय भी कमलों से चार-अंगुल अक्षर रहते हैं। तीर्थींकर भगवान केवली सर्वज्ञ होने पर कभी भी जमीन पर नहीं चलते।

मूल पाठ
इत्थं यथा वत विभूतिरभूज्जिनेन्द!
धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य।
यादृक् प्रभा विदनकृतः प्रहतान्धकारा
तादृक् कुतो ग्रह-गणस्य विकाशिनोऽपि।।37।।

        अन्वयार्थ -(जिनेन्द्र!) हे जिनेश्वरदेव! (इत्थं) इस प्रकार (धर्मोपदेशनविधौ) धर्मोपदेश के कार्य में (यथा) जैसी (तव) आपकी (विभूति) विभूति-दिवय वैभव-प्राप्ति (अभूत) हुई थी, (तथा) वैसी (न परस्यं) किसी दूसरे की नहीं हुई थी (प्रहतान्धकारा) अन्धकार को नष्ट करने वाली (यादृक्) जैसी (प्रभा) कान्ति (दिनकृतः भवति) सूर्य की होती है (तादृक्) वैसी (ग्रहगणस्यविकाशिनोऽपि) प्रकाशमान ग्रह गण की भी (कृतः) कहाँ से हो सकती है? अर्थात् नहीं हो सकती।।37।।

पद्यानुवाद
जैसी महिमा तुम विषैं, और धरे नाहिं कोय।
सूरज में जो जाति है, नहिं तारागण होय।।
अर्थ - अभिप्राय

        अहो वीतराग देव! धर्मोपदेश देते समय जैसी आपकी दिव्य-विभूति हुआ करती थीं, वैसी अन्य रागी देवों की तो कभी नहीं हुई। आपकी और दूसरे देवों की तुलना ही क्या ? अन्धकार को नाश करने वली जैसी प्रचण्ड प्रभा सूर्य में होती है, वैसी प्रभा आकाश में चमकने वाले दूसरे ग्रह नक्षत्रें में कहां होती है?

        जब तीर्थंकर भगवान के पूर्ण ज्ञान दशा प्रकट होती है अथवा केवलज्ञान की ज्योति प्रकट हो जाती है तभी सर्वज्ञ भगवान की पुण्य की भी पूर्ण पराकाष्ठा प्रकट हो जाती है, वैसा पुण्य किसी अन्य जीव का नहीं होता। जैसी विभूति आपमें है, वैसी विभूति अन्य देवी-देवता में नहीं प्राप्त होती। जैसी धर्म के स्वरूप की देशना आपके द्वारा होती हे, वैसी किसी अन्य धर्मोपदेशक की नहीं होती।

मूल पाठ
श्च्योतन्मदाविलविलोलकपोलमूल-
मत्त्भ्रमद्-भ्रमरनाद-विवृद्धकोपम्।
ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्।।38।।

        अन्वयार्थ -(श्चयोतन्-मदाविल-विलोलकपोलमूल-मत्तभ्रमद् भ्रमरनाद-विवृद्धकोपम्) झरते हुए मदजल से मलिन और चंचल गालों के मूल भाग में मत्त होकर मँडराते हुए भौंरो के गुंजार से जिनका कोप बढ़ गया है, ऐसे (ऐरावताभम्) ऐरावत हाथी की तरह (उद्धतम्) उद्दण्ड (आपतन्तम्) सामने से आते हुए (इभम्) हाथी को (दृष्ट्वा) देखकर भी (भवदाश्रितानाम्) आपके आश्रित मनुष्यों को (भयं) भय (नो भवति) नहीं होता।।38।।

पद्यानुवाद
मद-अवलिप्त-कपोल-मूल अलि कुल झंकारे,
तिन सुन शब्द प्रचण्ड क्रोध उद्धत अति धारे।
काल वरन विकराल कालवत सन्मुख आवै,
ऐरावत सौ प्रबल सकल जन भय उपजावै।
देखि गयन्द न भय करै, तुम पद महिमा लीन।
विपत्ति-रहित संपति सहित, वरतै भक्त अदीन।।
अर्थ - अभिप्राय

        युवावस्था में बने वाले मद से मलिन एवं चंचल गण्डस्थल पर मँडराने वाले मदोन्मत्त भौंरों की गुंजार से अत्यन्त क्रुद्ध हुआ इन्द के ऐरावत हाथी के समान महाविशाल मदमत्त हाथी भी यदि आक्रमण करें तो भी आपके आश्रय में रहने वाले भक्तजनों को कुछ भी भय नहीं होता है, अर्थात् वे निर्भय बने रहते हैं। आपका भक्त गजभय से विमुक्त रहता है।

        भय सात प्रकार का होता है और सम्यग्दृष्टि को यह सातों की भय नहीं होते। उसकी आत्मा शक्तिशाली हो जाती है। उसें शान्ति का स्त्रोत बहने लगता है। इसमें कोई अचम्भे वाली बात नहीं है कि आपके ऐसे भक्त के आगे वह हाथी भी अपने क्रोध को छोड़ देवे। लौकिक कथाएं प्रचलित हैं कि ध्यानस्थ मुनियों के आगे क्रूर पशु भी झुक जाते हैं। चन्दन के वृक्ष पर लिपटे सर्प मोर की आवाज सुनकर भयभीत हो जाते हैं। यह सही है कि किसी भी कार्य की सफलता पूर्व और वर्तमान के कर्मों के योग पर आधारित है फिर भी पूर्वभवों के कर्मों का ज्ञान न होने से भगवान की भक्त की महिमा निराली है। भगवान की भक्ति से असाता कासाता में संक्रमण एवं अधिक स्थिति वाले कर्मों का कम स्थिति में अपकर्षण हो जाता है।

मूल पाठ
भिन्नेभ-कुम्भ-गलदुज्ज्वल-शोणिताक्त-
मुक्तफल प्रकर-भूषित-भूमिभागः।
वद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि
नाक्रामत क्रमयुगाचलसंश्रितं ते।।39।।

        अन्वयार्थ -(मिभन्नेभकुम्भगलदुज्जवलशोणिताक्त-मुक्ता-फल-प्रकार-भूषित-भूमिभागः) फाड़े हुए हाथी के गण्डस्थल से टपकते हुए उजजवल तथा रक्त से सने हुए मोतियों के समूह से जिसने पृथ्वी के प्रदेश को विभूषित कर दिया है तथा (ब;क्रमः) जो छलांग मारने के लिए उद्यत है, ऐसा (हरिणाधिपः अपि) सिंह भी (क्रमगतम्) अपने पैरो के बीच आये हुए (ते) आपके (क्रमयुगाचल-संश्रितम्) चरण-युगलरूपी पर्वत का आश्रय लेने वाले पुरूष पर (न आक्रामति) आक्रमण नहीं करता।।39।।

पद्यानुवाद
अति मदमत्त गयन्द कुम्भथल नखन विदारै,
>
मोति रक्त समेत डारि भूतल सिंगारै।
बांकी दाढ़ विशाल वदन में रसना लोलै,
भीम भयानक रूप देखि जन थरहर डोले।।
ऐसे मृगपति पद तलैं, जो नर आयो होय।
शरण गहे तुम चरण की, बाधा करै न सोय।।

अर्थ - अभिप्राय

        जिसने दीर्घ भीमकाय हाथियों के कुम्भस्थलों को विदारण कर रक्त से सने हुए उज्ज्वल मोतियों के ढेर से भूमि-भाग को अलंकृत किया है, ऐसा भयंकर सिंह भी अपके चरण-युगलरूपी पर्वत का आश्रय लेने वाले भक्त के सामने ऐसा बन जाता है, मानो उसके पैर बांध दिये गये हों, वह उस पर आक्रमण नहीं करता है, अर्थात् आपका भक्त सिंह-भय से विमुक्त रहता है।

        जिस भयानक, विकराल बर्बर शेर ने हाथी के मस्तक की विदीर्ण कर डाला हो, ऐसे शेर के पंजे में भी कोई मनुष्य आ जाये और वह मनुष्य आपकी शरण में हो तो उसका वह भयंकर शेर भी कोई अनिष्ट नहीं कर सकता। तात्पर्य यह है कि जिन्होंने भगवान आदिनाथ की शरण ले ली, उन पर किसी प्रकार की विपदा नहीं आती। मिथ्यात्व और अज्ञानरूपी शेर ने इस जीव को चारो गतियों के भ्रमण में जकड़ रखा है। ऐसा प्राणी यदि आपके शुद्ध स्वरूप का शरण लेवे तो मोहान्धकाररूपी शेर जब उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता तब यह तिर्यंच पशु उसे कैसे हानि पहुँचा सकता है? अर्थात् आपके भक्तों पर कोई विपदा-आपदा नहीं आ सकती।

मूल पाठ
कल्पान्तकाल-पवनोद्धत-वह्निकल्पं
दावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्स्फलिंगम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं
त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेषम्।।40।।

        अन्वयार्थ -(त्वन्नामकीर्तनजलं) आपके नाम का कीत्र्तन-गुणगानरूपी जल (कल्पान्त काल-पावनोद्धत-वह्निकल्पम्) प्रलयकालीन प्रचण्ड पवन से उद्धत अग्नि के समान (ज्वलितम्) प्रज्वलित (उज्ज्वलम्) धधकती हुई उज्ज्वल (उत्स्फलिंगम्) जिसमें से चिंगारियाँ उछल रही हैं ऐसी (विश्व जिघ्त्सुम् इव) संसार को निगलना चाहती हुई-सी (सम्मुखम् आपतन्तम्) सामने से आती हुई (दावानलम्) वन की आग को (अशेष) पूर्ण रूप से (शमयति) बुझा देता है।।40।।

पद्यानुवाद
प्रलय पवन कर उठी आग जो तास पटंसर,
वमैं फुलिंग शिख-उतंग परजलैं निरंतर।
जगत् समस्त निगल्ल भस्म करहैगी मानों,
तड़तड़ात दव अनल जोर चहुँ दिशा उठानों।।
सो इक छिन ममें उपशमे, नाम नीर तव लेत।
होय सरोवर परिणमैं, विकसित कमल समेत।।

अर्थ - अभिप्राय

        प्रलयकाल की महावायु के समान, प्रचण्ड पवन से प्रज्वलित, धधकती और आकाश में उड़ रही हैं चिंगारियाँ जिससे तथा समस्त विश्व को भस्म करने के लिए उद्यत ऐसा प्रचण्ड दावानल भी आपके नामरूपी जल के प्रभाव से क्षणभर में शान्त हो जाता है। अर्थात् आपका भक्त अग्नि-भय से विमुक्त रहता है।

        भगवान के नाम का माहात्म्य अनुपम है। जिसके स्मरण से न केवल बाहृ अग्नि शान्त हो जाती है, शीतल हो जाती है, बल्कि आत्मा के अन्दर कषायरूपी आग भी शान्त हो जाती है। बस जरूरत है भगवान के नाम के स्मरण की, उनके द्वारा निर्दिष्ट पथ को हृदय में धारण करने की और उस पर आचरण करने की। इस दृष्टि से सती सीता के अग्निकुण्ड को लें तो विदित होता है कि उस प्रचण्ड अग्नि में जब सीता ने निशंक होकर प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए प्रवेश किया तो वहां एक जलाशय बन गया जिसमें कमल खिल रहे थे।

मूल पाठ
रक्तेक्षणं समदकोकिल-कण्ठनीलं
क्रोधोद्धतं फणिनमुत्फणमापतन्तम्।
आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशंक-
स्त्वन्नामनागदमनी हृदि यस्य पुंसः।।41।।

        अन्वयार्थ -(यस्य) जिस (पुंसः) पुरूष के (हृदय) हृदय में (त्वन्नामनागदमनी) आपके नामरूपी नागदमनी ओषधि मौजूद है (सः) वह पुरूष (रक्तेक्षणम्) लाल-लाल आंखों वाले (समदकोकिल-कण्ठनीलम्) मदयुक्त कोयल के कण्ठ की तरह काले (क्रोधोद्धतम्) क्रोध से प्रचण्ड और (उत्फणम्) ऊपर को फण उठाए हुए (आपतन्तम्) सामने आने वाले (फणिनम्) साँप को (निरस्तशंकः) निःशंक होकर (क्रमयुगेन) दोनों पैरों से (आकामति) आक्रान्त कर जाता है।।41।।

पद्यानुवाद
कोकिल-कंठ समान श्याम तन क्रोध जलंता,
रक्तनयन फुंकार मार विषकण उगलंता।
फण को ऊँची करै वेग ही सन्मुख आया,
तवज न हेय निशंक देखि फणिपति को आया।।
जो चांपे निज पग तलैं, व्यापै विष न लगार।
नाग-दमनि तुम नाम की, जिनके आधार।।
अर्थ - अभिप्राय

        जिसके हृदय में अपके नामरूपी नागदमनी जड़ी है, वह पुरूष लाल नेत्र वाले एवं मतवाले कोकिल के कण्ठ के समान काले, क्रोध से फुंकार करते और फन को ऊँचा उठाकर सामने झपटते-आते हुए भयंकर साँप को भी निःशंक होकर लांघता हुआ चला जाता है, अर्थात् आपका भक्त सर्प-भय से मुक्त रहता है।

        हे प्रभु! कोयल के कंठ समान वाला, क्रोध से जिसका शरीर जल रहा हो, आंखें लाल हो, फुंकार मारते हुए जसके मुख से जहर के करण निकल रहे हों, अर्थात् बहुत ही गुस्से में हो यदिऐसासर्प भी आपने फण को ऊँचा उठाए, तेजी से सामने आ जाये तो हे भगवन्! आपका भक्त ऐसे डरावने भयानक सर्प को अपनी ओर आता हुआ देखकर, निडर, अर्थात् भयरहित हो जाता है। जिस प्रकार नागदमनी बूटी से बड़े-बड़े जहरीले सर्प निस्तेज हो जाते हैं, उसी प्रकारश्रद्धा, भक्ति, पवित्रता से आपका नाम स्मरण करने वाले को सर्प का कोई भय नहीं रहता। लौकिक दृष्टि में तो इन मंत्रों या जड़ी-बूडियों से यह विष उतर जाता है, लेकिन जिसने आपके उपदेश से आपने स्वरूप को जान लिया है उसके द्वारा भावपूर्वक आपके नाम का स्मरण किया गया हो उसका संसार का जन्म-मरणरूपी विष भी उतर जाता है। यानि वह संसार के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाता है।

मूल पाठ
वल्गत्तुरंग-गजगर्जित-भीमनाद-
माजौ बलं बलवतामपि भूपतीनाम्।
उद्यद्दिवाकरमयूख-शिखापविद्धं
त्वत् कीर्तनात् तमः इवाशु भिदामुपैति।।42।।

        अन्वयार्थ -(त्वत्कीर्तनात्) आपके गुणकीत्र्तन से (आजी) युद्ध क्षेत्र में (वल्गत्-तुरंग-गज-गर्जित भीमनादम्) उछलते हुए घोड़ों और हाथियों की गर्जना से जिसमें भयंकर आवाज हो रही है, ऐसी (बलवतां भूपनीतां अपि) शक्तिशाली तेजस्वी राजाओ की भी (बलम्) सेना (उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शेखापविद्धम्) उगते हुएसूर्य की किरणों के अग्र भाग से छिन्न-भिन्न हुए (तमः इव) असोरे की तरह (आशु) शीघ्र ही (भिदाम् उपैति) विनष्ट हो जाती है, हार जाती है।।42।।

पद्यानुवाद
जिस रनमाहिं भयानक शब्द कर रहे तुरंगम,
धन से गज गरजाहिं मत्त मनो गिरि जंगम।
अति कोलाहल माँहि बात जस नांहि सुनीजै,
राजन को परचण्ड देखि बल धीरज छीजै।।
नाथ तिहरे नाम तैं, अघ छिनमाहिं पलाय।
ज्यों दिनकर परकाशतें, अंधकार विनशाय।।
अर्थ - अभिप्राय

        जिस सेना में घोड़े हिनहिना रहे हों और हाथी चिंघाड़ रहे हों, भयंकर कोलाहल हो रहा हो तो ऐसी शत्रु राजाओं की सेना भी आपके नाम का उच्चारण करने से ऐसी छिन्न-भिन्न हो जाती है, जैसे सूर्य के उदित होते ही उसकी किरणों से रात्रि का अन्धकार शीघ्र ही भिन्न-भिन्न हो जाता है, अर्थात् आपके भक्त को शत्रु-सेना का भय नहीं रहता।

        हे जिनदेव! जिस प्रकार उगते हुए सूर्य की किरण-समुहके सामने गहन अन्धकार भी नहीं टिकने पाता,उसी प्रकार संग्राम में आपके गुणों का गान करनेसे चैकड़ी भरते हुए घोड़ों की हिनहिनाहट अैर हाथियों की भीषण चिंघाड़ से भयंकर युद्धरत बलशाली राजाओं की सेना भी देखते-देखते नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। इस प्रकार जिसने एक अति शक्तिमान शुद्धात्मा-परमात्मा का सहारा लिया उसके सामने निर्बल शक्तियाँ क्षणभर भी नहीं टिकतीं।

मूल पाठ
कुन्ताग्रभिन्नगज-शोणितरारिवाह-
वेगावतार-तरणातुरयोध-भीमें।
युद्धे जयं विजितदुर्जयजेयपक्षा-
स्त्वतपद-पंकजवनाश्रयिाणो लभन्ते।।43।।

        अन्वयार्थ -(त्वत्पाद-पंकज-वनाश्रयिणः) आपके चरण-कमलरूपी वन का आश्रयम लेने वाले पुरूष (कुन्ताग्र-भिन्नगज-शोणितवारिवह-वेगवतार-तरणातुर-योधभीमे) भालों की नोंक से फाड़े हुए हाथियों के रक्तरूपी जल-प्रवाह को वेग से उतरने और तैरने में व्यग्र योद्धओं से भयंकर (युद्धे) युद्ध में (विजितदुर्जय-जेयपक्षाः) दर्जय शत्रुओं के पक्ष को जिन्होंने जीत लिया, ऐसे दुर्दान्त होकर (जयम्) विजय (लभन्ते) पाते हैं।।43।

पद्यानुवाद
मारे जहाँ गयन्द, कुम्भ हथियार विदारे,
उमगे रूधिर प्रवाह वेग जलसम बिस्तारे।
होंय तिरन असमर्थ महाजोधा बलपूरे,
तिस रन में जिन तोर भक्त जे हैं नस सूरे।।
दुर्जनअरि कुल जीत के, जय पावैं निकलंक।
तुम पद पंकज मन बसें, ते नर सदा निशंक।।
अर्थ - अभिप्राय

        हे जिनेश्वर! आपके चरण-कमलों की सेवा करने वाले भक्तजन दुर्जय शत्रु का मानमर्दन कर उस भयंकर महायुद्ध में विजय-वैजयंती फहराते हैं जिसमें भालों की नोंकों से विदीर्ण हुए हाथियों के रूधिर प्रवाह के वेग को वेग से पार करने के लिए योद्धागण आति आतु रहते हैं। सच है, आत्मस्थ आत्माओं को शरीर से किंचित् भी मोह नहीं होता। अतएव वे जी-जान से लड़कर शत्रु का मानमर्दन कर दे ंतो कौन बड़ी बात है?

        यदि हम इस युद्ध को अपने अष्ट कर्मों से तुलना करें जिन्होंने हमें संसार में तरह-तरह की यातनाएँ दे रखी हैं, कहीं भी सुख-शांति नहीं है ऐसा प्राणी भी जब आपकी तत्त्व-ज्ञानरूपी शरण लेता है तो वह संसार-सागर से पार हो जाता है। यह युद्ध तो उसके आगे कोई मतलब नहीं रखता। भगवान की भक्ति से ऐसा प्रबल पुण्य का बन्ध होता है कि अब्बल तो ऐसी मुसीबत आती नहीं, दैवयोग से आ भी जावे तो उस पर विजय प्राप्त कर लेता है।

मूल पाठ
अम्भोनिधौ क्षुभितभीषणनक्रचक्र-
पाठीन-पीठभयदोल्वणवाडवाऽग्नौ।
रंगत्तरंग-शिखरस्थित-यानपात्रा-
स्त्रासं विहाय भवतः स्मरणाद् व्रजन्ति।।44।।

        अन्वयार्थ -(क्षुमितभीषणनक्रच क-पाठीन-पीठ-भयदोल्वणवाडवाऽग्नौ) जिसमें क्षुब्ध हुए भयंकर मगरमच्छों के झुण्ड हैं, मछलियों के द्वारा भय-उत्पादक है तथा विकराल वड़नानल है, ऐसे (अम्भोनिधौ) समुद्र में। रंगत्-तरंग-शिखर-स्थित-यानपात्राः) चंचल लहरों के अग्र भाग पर जिनके जलयान स्थित है, ऐसे लोग (भवतः) आपके (स्मरणात्) स्मरण से (त्रासं) डर (विहाय) छोड़कर (व्रजन्ति) चले जाते हैं-यात्रा करते हैं।।44।।

पद्यानुवाद
नक्र चक्र मगरादि मच्छ करि भय उपजावे।
जामें बढ़वा अग्नि दाहतैं नीर जलावै।
पार न पावैं जास थाह नहिं लहिए जाकी।
गरजे अत गम्भीर लहर की गिनति न ताकी।।
सुख सों तिरैं समुद्र को, जे तुम गुण सुमराहिं।
लोल कलोलन के शिखर, पार यान ले जाहिं।।
अर्थ - अभिप्राय

        हे जगन्नाथ! जिसमें विशालकाय भयंकर मछलियाँ, मगर और घ्डि़याल मुंह बायें इधर-उधर लहरा रहे हैं और महाभयावनी बाड़वाग्नि अपना अत्यन्त प्रचण्ड रूप धारण किये हुए है। ऐसे तूफानी समुद्र में अत्यन्त ऊँची उछलती विकराल तरंगों से जिनके जहाज डगमग-डगमग हो उठते हैं। आपका स्मरण कर वे निर्भयता के साथ समुद्र पार हो जाते हैं। अर्थात् आकस्मिक विपत्तियाँ भी आत्मस्थ होने से विलीन हो जाती है।

        भगवान के नाम के स्मरण की महिमा को फिर बताया है कि भगवान के नाम के स्मरण से सागर के मध्य भयंकर तूफान भी मनुष्य का कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सकतां इतना ही नहीं, बल्कि इस भवसागर में जहाँ यह प्राणी चैरासी लाख योनियों में तरह-तरह के कष्टों को उठा रहा है उससे पार होने में भी हे प्रभु! भावपूर्ण आपके नाम का स्मरण सहायक है। आशय यह है कि अपनी अज्ञानता से इष्ट-अनिष्ट की कल्पान करते हुए जीव संसार में सुख-दुख भोगता है। जब तक यह जीव अपने स्वरूप को नहीं जान लेता, तब तक इस संसाररूपी जेल से छुटकारा नहीं मिलता। यह संसार भी एक बहुत बड़ा समुद्र है, उसमें यह प्राणी चारों गतियों में उछल-कूल कर रहा है। उससे पार होने का एक मात्र उपाय आपके नाम का स्मरण ही है। आपके नाम का स्मरण भी वही प्राणी करेगा जिसने आपको द्रव्य-गुण-पर्याय से जाना हो।

मूल पाठ
उद्धूतभीषणजलोदर-भारभुग्नाः
शोच्यां दशामुपगताश्च्युतजीविताशाः!
त्वत्पाद-पंकजरजोऽमृतदिग्धदेहाः
मत्र्याः भविन्त मकरध्वजतुल्यरूपाः।।45।।

        अन्वयार्थ -(उद्भूतभीषणजलोदर-भारभुग्नाः) उत्पन्न हुए भयंकर जलोदर रोग के भार से झुके हुए (शोच्यां दशाम्) शोचनीय अवस्था को (उपगताः) पहुँचे हुए और (च्युत-जीविताशाः) जिन्होंने जीने की आशा ही छोड़ दी हो (मत्र्याः) मनुष्य (त्वत्पाद-पंकज-रजोऽमृतदिग्ध-देहाः) आपके चरण-कमलों की राजरूपी अमृत से लिप्त शरीर वाले होकर (मकरध्वज तुल्यरूपाः) कामदेव के तुल्य रूप वाले (भवन्ति) हो जाते हैं।।45।।

पद्यानुवाद
महा जलोदर रोग, भारत पीडि़त नर जे हैं,
वात, पित्त, कफ, कुष्ट आदि जो रोग गहे हैं।
सोचत रहैं उदास नाहिं जीवन की आशा,
अति घिनावनी देह धरैं दुर्गन्ध निवासा।।
तुम पद पंकज धूल को, जो लावै निज अंग।
ते नीरोग शरीर लहि, छिन में होंय अनंग।।
अर्थ - अभिप्राय

        जो भयंकर जलोदर रोग के भार से झुक गये हैं, अर्थात् पीडि़त है। लगातार औषध-सेवन करते रहने पर भी उत्तरोत्तर रोग के बढ़ने से जिन्होंने अपने जीने की आशा छोड़ दी है, ऐसे अत्यन्त दयनीय अवस्था को प्राप्त पुरूष भी यदि आपके चरण-रजरूपी अमृत अपने शरीर पर लगाते हैं तो वे नीरोग हों, कामदेव के समान सुन्दर शरीर वाले हो जाते हैं, अर्थात् आपके चरण-रज से असाध्य रोगी भी निरोग हो जाते हैं।

        संसारी प्राणी अपनी ही अज्ञानता से नामकर्म के द्वारा तरह-तरह के शरीररूपी जेल को धारण करता हुआ भवरूपी संसार में जन्म-मरण के चक्कर में फँसा हुआ है, तरह-तरह की विपदाओं को सहन करता हे। जहां से निकलना भी मुश्किल है और कोई सहारा देने वाला भी नहीं है। ऐसेसमय में हे प्रभु केवल आपके नाम का सहारा ही काफी है जो प्राणी को बन्धन से मुक्त करने में सहायक होता है। आशय यह है कि जिसने वीतराग भगवान सर्वज्ञ प्रभु को द्रव्य गुण और पर्याय से जान लिया है, मान लिया है और उसी रूप में अनुभव कर लिया है, उसे इस शरीर आश्रित वेदनाओं का कष्ट मालूम नहीं होता और समय के साथ-साथ अपनी आत्मा के स्वरूप में लीन होकर संसार के आवगमरन के चक्कर से छूट जाता है। पराधीन से स्वाधीन हो जाता है।

मूल पाठ
मत्तद्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्धनोत्थम्।
तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव
यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते।।47।।

        अन्वयार्थ -(यः) जो (मतिमान्) बुद्धिमान मनुष्य (तावकम्) आपके (इवम्) इस (स्तवम्) स्तोत्र को (अधीते) पढता है (तस्य) उसका (मत्तद्विपेन्द्र-मृगराज-दवानलाहि-संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्धनोत्थम्) मतवाले हाथी, सिंह, दावानल, सर्प, युद्ध, समुद्र, जलोदर और बन्धन आदि से उत्पन्न हुआ (भयम्) डर (भिया इव) मानों भय से डरकर ही (आशु) शीघ्र (नाशम् उपयाति) नष्ट हो जाता है, भाग जाता है।।47।।

पद्यानुवाद
महामत्त गजराज और मृगराज दवानल,
फणपित रण परचण्ड नीरनिधि रोग महाबल।
बन्धन ये भय आठ डरपकर मानों नाशैं,
तुम सुमरत छिनमाहिं अभय थानक परकाशैं।।
इस अपार संसार में, शरन नाहिं प्रभु कोय।
तातैं तुम पद-भक्त को, भक्ति सहायी होय।।
अर्थ - अभिप्राय

        हे प्रभु! जो बुद्धिमान जन आपके इस स्तोत्र का अध्ययन-मनन करता है उसके उन्मत्त हाथी, सिंह, दावानल, सर्प, संग्राम, समुद्र, महोदर रोग और बन्धन जनत भय स्वतः डरे हुए की भांति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। सच ही है, आपकी परम गाढ़ भक्ति जब कर्मभय से ही मुक्त कर शिव सुख देने में सम्र्थ है, तब सांसारिक क्षणिक् भय उसके सामने किस तरह टिक सकते हैं?

        जिनको सुबुद्धि आ गई है, अपनी अत्मा के द्रव्य गुण पर्याय को जानने की रूचि पैदा हो गई है,उसको जानने के मार्ग पर चल पड़े हैं, साथ-साथ अनुभव और आचरण भी करते जाते हैं। उनको ही समयक्त्व प्राप्त होता है। सम्यग्दृष्टि कोसात प्रकार का भय नहीं होता। वह आत्मोन्नति करते हुए आठों कर्मों पर विजय प्राप्त करके पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करता है, अर्थात् मोक्षपद प्राप्त करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जो भी व्यक्ति भाव-भक्ति से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके पास सात या आठ प्रकार के भय कभी फटकते ही नहीं। जिसने अपने पूर्ण स्वभाव की भक्ति की, वही भव के भय से मुक्त हो गया।

मूल पाठ
स्तोत्रस्त्रजंत व जिनेन्द्र! गुौर्निबद्धां,
भक्त्या मया रूचिरवणर््विचित्रपुष्पायम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठगतामजस्त्रं
तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः।।48।।

        अन्वयार्थ -(जिनेन्द्र!) हे जिनेन्द्रदेव! (इह) इस संसार में (यः जनः) जो मनुष्य (मया) मेरे द्वारा (भक्त्या) भक्तिपूर्वक (गुणैः) प्रसाद, माधुर्य, ओज आदि गुणों से- माला के पक्ष में डोरों से (निबद्धाम्) गूँथी हुई-रची हुई (रूचिरवर्ण-विचित्रपुष्पाम्) मनोहर अक्षररूपी विचित्र फूल वाली, माला पक्ष में सुन्दर रंगों वाले कई तरह के फूलों सहित (तव) आपकी (स्तोत्रस्त्रजम्) स्तुतिरूपी माला को (अजस्त्रम्) निरन्तर (कण्ठगताम् धत्ते) कण्ठस्थ कर लेता है-माला पक्ष में-गले में धारण कर लेता है (तम्) उस (मानतुंगम्) सम्मान से उन्नत पुरूष अथवा स्तोत्र-रचयिता आचार्य मानतुंग को (लक्ष्मीः) स्वर्ग-मोक्ष आदि रूपी लक्ष्मी-विभूति (अवशा) विवश होकर (अधीनता को) (समुपैति) प्राप्त हो जाती है।।48।।

पद्यानुवाद
यह गुणमल विशाल नाथ तुम गुणन संवारी,
विविध वर्णमय, पुहुप गूंथू मैं भक्ति विथारी।
जो नर पहिरैं कण्ठ, भावना मन में भावें,
मानतुंग ते निजाधीन शिवलक्ष्मी पावें।।
भाषा भक्तामर कियो, ‘हेमराज’ हित-हेत।
जो नर पढ़ें सभावसों, ते पावैं शिवखेत।।
अर्थ - अभिप्राय

        हे प्रभु! जिस प्रकार चित्र-विचित्र मनोहर और सुगन्धित पुष्पों से गूँथी हुई पुष्पमाला धारण करते से शोभा का प्राप्त होना अनिवार्य है, उसी प्रकार परम गाढ़ भक्तिपूर्वक आपके पवित्र ज्ञानादि अनंत गुणों से अथवा प्रसाद, माधुर्य आदि गुणों सहित मनोज्ञ अकारादि वर्णों के श्लेष , यमक, अनुप्रासादि रूप मनोहारी पुष्पों से मेरे द्वारा रची हुई आपकी इस स्तोत्ररूपी माला को संसार में जो पुरूष अपने कण्ठ में सदैव धारण करते हैं, उन उन्नत हृदय वाले पुरूषों को या मुझ मानतुंग मुनि को राज्य वैभव स्वार्गादि और परम्परा से मोक्ष लक्ष्मी विवश होकर प्राप्त होती है। आपकी चमत्कारमयी अत्यन्त गाढ़ भक्ति में जो सतत जागरूक रहता है, उसकी आत्म-ज्योति का दिव्य प्रकाश आत्मा के प्रदेश-प्रदेश में व्याप्त हो जाने के कारण चिरवासी कर्मचोर को छिपने का स्थान नमिलने के कारण भागते ही बन पड़ता है और तब चिररूपी मुक्तिश्री चिदानन्द राजा को पा चिरस्थायी चिरसुख की एक मात्र अधिकारिणी हो जाती है। आशय यह है कि जो इसका नियमित पाठ करता है, उसे संसार में यश और कीर्ति मिलती है, सर्व सम्पदाओं की प्राप्ति होती है।  

तृतीय अध्याय

मक्तामर: पंचांग स्वरूप

(ऋद्धि, मंत्र, यंत्र विधि एवं फलागम)

मंत्र, यंत्र और भक्तामर: एक चिन्तन

(पंचांग-स्वरूप)

        भारतवर्ष अनादिकाल से ज्ञान-विज्ञान की गवेषण, अनुशीलता एवं अनुसंधान की भूमि रहा है। विद्याओं की विभिन्न शाखाओं मे भारतीय मनीषियों, ़ऋिषियों, एवं अध्येताओं ने जो कुछ किया, निःसन्देह वह यहाँ की विचार-विमर्श एवं चिन्तन-प्रध्न मनोवृत्ति का द्योतक है। दर्शन, व्याकरण, साहित्य, न्याय,गणित, ज्योतिष आदि सभी विद्याओं में भारतीय का कृतित्व और व्यक्तित्व अपनी कुछ ऐसी विशेषताएं लिए हुए है जो अनेक दृष्टियों से असाधारण है। इसी गवेषणा के परिणामस्वरूप मंत्र, यंत्र, तंत्र साधनाओं का प्रस्फुटन हुआ।

         मंत्र की अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र सत्ता है। जीवन में पार्थिव-अपार्थिव, चेतन-अचेतन, निष्क्रिय और सक्रिय जीव में मंत्र की सर्वोपरि महत्ता है। बिना मंत्र के जीवन का अस्तित्व सम्भव ही नहीं। हमारे जीवन में जो कुछ भी घटित हो रहा है। इसके मूल में मंत्र की सत्ता विद्यमान है। बिना मंत्र के हमारे जीवन का कोई अस्तित्व नहीं। मानव जो कुछ बोलता है वह अपने आप में शब्द है और जब शब्द का सम्बन्ध अर्थ से हो जाता है तो वह कलयाणमय बन जाता है। वे शब्द निरर्थक होेते हैं, जिनके मूल में अर्थ विद्यमान नहीं रहता। मानव के मुँह से जो भी शब्द निकलता है वह ‘मन्त्रमय’ होता है।

        मंत्र में ध्वनियाँ होती है और ध्वनियों के समूह को मंत्र कहा जाता है। व्याकरण की दृष्टि से मंत्र शब्द ‘मन्’ धातु (दिवादे ज्ञाने) से ‘ष्ट्रन’ (त्र) प्रत्यय लगाकर बनाया जाता है। जिसके द्वारा आत्मादेश का निजानुभव किया जाये वह मंत्र है। दूसरी प्रकार तनादिगणीय (तनादि अवबोधे जव बवदेपकमत) ‘मन्’ धातु से ‘ष्ट्रन’ प्रत्यय लगाकार मंत्र शब्द बनता है। इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसके द्वारा आत्मादेश पर विचार कियो जावे वह मंत्र है। तीसरे प्रकार से सम्मानार्थक ‘मन्’ धातु से ‘ष्ट्र्र’ प्रत्यय लगाकर मंत्र शब्द बनता है। इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसके द्वारा परम पद में स्थित पंच उच्च आत्माओं का अथवा शासन देवों का सत्कार किया जावे वह मंत्र हैं। मन के साथ जिन ध्वनियें का घर्षण होने से दिव्य-प्रकट होती है, उन ध्वनियों के समुदाय को मंत्र कहा जाता है। मंत्रो का बार-बार उच्चारण किसी सोते हुए को बार-बार जगाने के समान है। यह प्रक्रिया इसी के समान है, जिस प्रकार किन्हीं दो स्थानों के बीच बिजली का सम्बन्ध जोड़ दिया जावे। साधक की विचार शक्ति, ‘सिवच’ का काम करती है और मंत्र शक्ति विद्युत् लहर का। जब मंत्र सिद्ध हो जाता है तब आत्मिक शक्ति से आकृष्ट देवता मांत्रिक के समक्ष अपना आत्म-समर्पण कर देता है ओरउस देवता की सारी शक्ति उस मांत्रिक में आ जाती है, अतः मंत्र अपने आप में देव है।उच्च कोटि के मंत्र का पूजन-अर्चन करने के लिए यंत्र होता है। मंत्र देव है तो यंत्र देवगृह है,ऐसा माना जाता है। मंत्रविदों का कहना है कि तपोधन ऋषि-मुनियों द्वरा जो रेखाकृति बनाई जाती है, मनोरथ पूर्ण करने की जो शक्ति बीजाक्षरो में है उसे स्वयं ही मंत्र सामथ्र्य से रेखाकृतियों (यंत्रों) में भर देते हैं। मंत्र और मंत्र देवता, इन दोनों का शरीर यंत्र कल्प में होता है, कारण यंत्र इन मंत्र और मंत्र देवता का शरीर होता है।

        मंत्र-यंत्र की स्थापन के बाद उनके विधि-विधान और क्रम के लिए तंत्र अर्थात् शास्त्र की रचना होती है। शास्त्र के अर्थ में तंत्र को लेकर उसे यंत्र-मंत्र के समकक्ष अर्थ में समझना होगा। किसी विशेष समय में किसी वस्तु विशेष को विधिपूर्वक लाकर उपयोग करना तंत्रशास्त्र के अंतर्गत आता है, अर्थात् दिन, पक्ष, नक्षत्र, मास, लग्न आदि का ध्यान रखकर किसी वस्तु को विधिपूर्वक लाना तथा उद्देश्यानुसर उपयोग करना उसे तंत्र विद्या कहा जाता है। तंत्र विद्या में मंत्र7साधना की आवश्यकता नहीं होती। यदि फिर भी उससे सम्बन्धित कोई मंत्र हे तब उसे सिद्ध कर लेने में तंत्र अधिक गुणकारी हो जाता है। तंत्रौषधि भी अपने आप मे देव मानी जाती है। अतः मंत्र-यंत्र जितना गुणकारी हे, उतनी ही तंत्र विद्या भी गुणकारी है। आचार्यों ने मंत्र को देव, यंत्र को उसका शरीर तथा तंत्र को उसकी प्रिय वस्तु माना है।

        मंत्र, यंत्र और तंत्र के क्रमशः इस प्रकार समझा जा सकता है। जो विशिष्ट प्रभावक शब्दों द्वारा निर्मित किया हुआ वाक्य होता है, वह मंत्र कहा जाता है। बार-बार जाप करने पर शब्दों के पारस्परिक संघर्षण के कारण वातावरण में एक प्रकार की विद्युत् तरंगे उत्पन्न होने लगती है तथा साधक की इच्छित भावनाओं को बल मिलने लगता है। फिर वह जो चाहता है, वही होता है। मंत्रों के लिये उनके हिसाब से जाप की संख्या, शब्द, बीजाक्षर, अक्षर तथा विभिन्न मंत्रों के लिये विभिन्न प्रकार के पदार्थों से बनी मालाएं, विभिन्न प्रकार के फल-फूल, विभिन्न आसन, दिशाएं, क्रियाएं इत्यादि पहले से ही निर्धारित होती है।

        जिसमें सिद्ध किये मंत्रों अभिमंत्रित भोजपत्र व कागज को अथवा किसी विशिष्ट प्रकार के निर्धारित अंको, शब्दों, और आकृतियों से लिखित पत्र की चाँदी, सोनाया ताँबेआदि के विशेष धातु के बने ताबीज में रख दिया जाता है अथावा या किसी की बाँह में बाँध दिया जाताहै, गले में लटका दिया जाता है, किसी धातु विशेष के पत्रों पर लिखकर उचित स्थान पर रख दिया जाताहै या चिपका दिया जाता है, वह यंत्र कहा जाता है। इससे कार्य-सिद्धि होती है। इन यंत्र और मंत्रों के अधिष्ठता देव-देवियाँ चैबीस तीर्थंकरों की सेवा करनेवलो चैबीस यक्ष-यक्षिणियाँ मानी गई है। तीर्थींकर तो मुक्त हो जाते है, वीतराग होने से वे कुछ देते-लेते नहीं। धर्म-प्रभावना की दृष्टि सेयक्ष-यक्षियाँ आदि शासनदेवता मंत्र-मंत्र साकों को लाभान्वित करते हैं। इससे साधक का पुण्य-पाप करण बनता है।

        तंत्र-मंत्र-विद्या काएक प्रमुख विशिष्ठ अंग है। तंत्रों का सम्बन्ध विज्ञान से है। इसमें कुछ ऐसी रासायनिक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है, जिनसेएक चमत्कारपूर्ण स्थिति पैदा की जा सके। मानवीय शक्ति प्राप्त करने के लिए मंत्र यंत्रगार्भत विशिष्ट प्रयोगों का वैज्ञानिक संचयन तंत्र है। विद्वानों ने तंत्र शब्द की व्याख्या में दो आशयों को मुख्यतया रखा है। एक दृष्टिकोण इसे उस ज्ञान के मार्गदर्शक के रूप में व्याख्यायित करता है, जिससे लौकिक द्रष्टा को असाधारण शक्ति, चमत्कार तथा वैशिष्ट्य का लाभ होता है। दूसरा दृष्टिकोण, अलौकिक या मोक्षपरक है, इसलिए तंत्र की चरम सिद्धि उस ज्ञान की बोधिका है, जिससे जन्म-मरण के बन्धन से उत्मुक्त होकर जीवन सन्-चित्-आनन्दमय बनजाये, मोक्षगत हो जाये यासिद्धत्व प्राप्त कर ले। मंत्र और यंत्र से यह विषय विशेषतया सम्बद्ध है, अतः तदनुरूपअ अभ्यास और साधनों से कार्य सिद्धिदायक हैं। तंत्रों में मंत्र भी प्रयोग में आते हैं और यंत्र भी। तंत्र में मंत्र का प्रयोग कभी-कभी आवश्यक भी होता है क्योंकि उससे तंत्र की शक्ति द्विगुणित हो जाती है। बाहृ दृष्टि सेमंत्र तंत्र के द्वारा आकष्रण, मोहन, मारण, वशीकरण, उच्चाटनादि किया जाताहै।

        तंत्रशास्त्र में अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ, पंच गव्य, पंचमकार आदि का भी प्रयोग किया जाता है, इस कारण तंत्र की उपादेयता और अहिंसा, शौच आदि दृष्टियों से उसकी शुद्धि विवादास्पद हो जाती है। इसी कारण हमने तंत्र प्रयोग को वहाँ सर्वथा

        आधुनिकता के परिप्रक्ष्य में कतिपय उदाहरणों द्वारा यह समझेंगे कि भारतीय मंत्र-विद्या मात्र कपोल-कल्पना नहीं, अपितु इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक सिद्धान्त काम करते हैं। मंत्र में शब्द होते हैं और शब्दों के घर्षण में सूक्ष्म शक्ति होती है। स्थूल शरीर में कुछ भी शक्ति नहीं हैं अपितु हमारे सूक्ष्म शरीर (आत्मा) में अनेक प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान है, जिनको मंत्र की सूक्ष्म शक्ति से जगाकर हम असाधाण कार्यों का भी सम्पादन कर सकते हैं। यह नियम है कि सूक्ष्म जगत् में सूक्ष्य की ही पहुँचसम्भव होसकती है स्थूल वस्तुओं का प्रवेश वहाँ निषिद्ध है। मंत्रों का आधारा जब शब्दों का उच्चारण होते है तो उससे कम्पन ईथर के माध्यम से विश्व की यात्रा में अनुकूल कम्पनी के साथ मिलते हैं, अनुकूलता में एकता का सिद्धान्त है। उन कम्पनों का पुँज बन जाता है और अपने केन्द्र तक (साधक) लौटते-लौटते अपनी पर्याप्त शक्ति बढ़ा लेते हैं और यह कार्य इतनी तीव्र गति से होता है कि साधक को इसका अनुभव भी नहीं हो पाता कि शब्दों के उच्चारण मात्र से कैसे चमत्कार उत्पन्न हो रहे हैं। संसार में शब्दों के अनेक चमत्कारप्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलते हैं। मेघ मल्हार से वर्षा की जाती हे, दीपक राग से बुझे हुए दीप जालाए जाते हैं। ढोल अथवा थाली बजाकर मंत्र पढ़ते हुए सर्प-बिच्छू आदि का जहर उतारा जाता है।

        आज से तीन दशक पूर्व लखनऊ के वैज्ञानिक श्री सी.टी.एम. सिंह ने स्लाइडों के माध्यम से यह सिद्ध कया कि संगीत की स्वर-लहरी सुनाकर गायों एवं भौंसो से अपेक्षाकृत अधिक दूध प्राप्त होता है। कटक और दिल्ली के कृषि अनुसंधान केन्द्रों मे भी ऐसे ही परीक्षण किया गया है। विदेशों में भी ऐसे ही परीक्षणों का पता चला है कि राग-रागिनियों से गन्ने, धान और नारियल आदि की खेती प्रभावित होती है। ग्राहम और नील नामक दो वैज्ञानिकों ने आस्ट्रेलिया के मेलबोर्न नगर की एक भारी भीड़ वाली सड़क पर शब्द-शक्ति का वैज्ञानिक प्रयोग किया और सार्वजनिक प्रदर्शन में सफल रहे। परीक्षण का माध्यम थी एक निर्जीव कार जिसे अपने इशारों पर नचाना चाहते थे और यहसिद्ध करना चाहते थे कि शब्द-शक्ति की सहायता से बिना किसीचालक के कार चल सकती है। हजारों की संख्या में लोगां ने देखा कि संचालक के कार सटार्ट करते ही कार चलना प्रारम्भ हो गई और ‘गो’ के सुनते ही गति पकड़ ली। लोग देखते ही रहे कि निर्जीव कार के भी कान होते हैं जैसे-थोडी दूर जाकरसंचालक ने ‘हाल्ट’ का आदेश दिया तो वह कारतुरन्त रूक गई। यह कोई हाथ की सफाई का काम नहीं था, वरन् इसके पीछे विज्ञान का निश्चित सिद्धान्त काम कर रहा था। ग्राहम के हाथ में एक छोटा सा ट्रांजिस्टर था जिसका काम यह था कि आदेशकत्र्ता की ध्वनि को एक निश्चित फ्रीक्वेन्सी पर विद्युत-शक्ति के द्वारा कार में ‘डेश बोर्ड’ के नीचे लगे ‘नियन्त्रण कक्ष’ तक पहुँचा दें। उसके आगे ‘कार रेडियो’ नाम का एक दूसरा यंत्र लगा हुआ था। इस यंत्र से जब शब्द की विद्युत् चुम्बकीय तरंगे टकराती तो कार के सभी पूर्जे अपने आप संचालित होने लगते थे। लोगों ने चमत्कार की संज्ञा दी पर वास्तव में यह शब्द-शक्ति का विकसित प्रयोग था जिसे आधाुनकि सिज्ञान के सिद्धान्तों का आधार प्राप्त था। इस प्रकार और भी कई आधुनिक विज्ञान के प्रयोग शब्द-शक्ति के सम्बन्ध में हैं जो प्राचीन शास्त्रों में वर्णित शब्द-शक्ति का समर्थन करते हैं। फ्रांस की एक प्रसिद्ध महिला वैज्ञानिक फिनोलिंग ने शब्द विज्ञान पर परीक्षण किये थे और उसने सिद्ध किया था कि शब्द के साथ मन और हृदय का सम्बन्ध रहता है। यह शब्द तरंगों के जिस चमत्कारिक प्रभाव का वर्णन वैज्ञानिक परीक्षणों से किया गयाहै उनका संचालन विद्युत-शक्ति के द्वारा होता है। आधुनिक विज्ञान के परिप्रक्ष्य में शब्द की सामथ्र्य को सभी भौतिक शक्तियों से बढ़कर सूक्ष्म और विभेदन क्षमता वाली पाया तथा इसी बात की निश्चित जानकारी हमारे ऋषि-मुनियों के दिव्य ज्ञान में झलकती थी जिसके कारा उन्होंने मंत्र-विद्या, यंत्र-विद्या तथा तंत्र-विद्या का विकास किया जिस पर अनेक ग्रंथों का प्रणयन हुआ जिसमंे मंत्रो-तंत्रों की विपुल विवेचना महनीय है।

        भारतीय मंत्रशास्त्र की इस विशाल परम्परा में जैनधर्म में मंत्र, यंत्र एवं तंत्र से सम्बन्धित शास्त्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। जैनदर्शन की प्रत्येक विद्या का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सम्बन्ध वीर-वाणी से संश्लिष्ट है। विद्यानुवाद पूर्व नामक पूर्व में मंत्र, यंत्र और तंत्र का विस्तारपूर्वक विश्लेषण विवेचन हुआ जिसके आधार पर वर्तमान में उपलब्ध मंत्र साहित्य निर्मित है।

        भक्तामर स्तेात्र मंत्र-गर्भित स्तोत्र है। ऋद्धि, मंत्र और यंत्रों से इसकी चमत्कारिकता विश्रुत है। भक्तामर के चमत्कारों की सैकड़ों कथाएँ प्रसिद्ध है। भक्त वीतराग-भक्ति की अतल गहराई में डूबकर निष्कलुष भाव से अनन्य प्रीति एवं आस्था के साथ इष्टदेव प्रथम तीर्थंकर प्रभु ऋषभदेव का स्मरण करता है, उसके बन्धन टूटते हैं। यह स्तोत्र भक्ति से मुक्ति और मुक्ति से शान्ति प्राप्त करने का सबल साधन है। वस्तुतः भक्तामर स्तोत्र भक्त को अमरपदपर प्रतिष्ठित करने वाला सोपान है। श्रद्धा में अनन्त बल है। असंभव को संभव बनाने की शक्ति है। भक्तामर का शुद्ध, नियमित एवं श्रद्धापूर्ण पाठ समस्त भय, विघ्न, बाधा, रोग, शोक, दुःख, दरिद्रता और अन्तस् के विकारों को नष्ट करने में पूर्ण समर्थ है। स्तोत्र के प्रणेता आचार्य मानतुंग ने प्रभावशाली मंत्रों के बीज इस स्तोत्र में अच्दे चातुर्य से निविष्ट कर दिये हैं। अतः यह समग्र स्तोत्र ही मंत्र रूप है। इस स्तोत्र के प्रत्येक काव्य-छन्द का पृथक्-पृथक् यंत्र तथा मंत्र अपयुक्त मंत्र व्याकरण के अनुसार विनिर्मित है। प्राचीन मंत्रशास्त्र में भक्तामर स्तोत्र का दूसरा नाम मंत्रशास्त्र प्रसिद्ध है। इसके प्रत्येक श्लोक के प्रत्येक चरण में बीज मंत्र इतनी विलक्षणता से गुँथे हुए हैं कि वे अनजाने ही अपना चमत्कारिक फल दिखाते हैं। हमारे समक्ष आज ऐसे मंत्रशास्त्र नहीं हैं जो इतनी विशुद् विवेचना कर सकें और हमें भक्ताम्बर के श्लोेकों में छिपे बीज-मंत्रों का ज्ञान दे सकें, परंतु इतना तो निश्चित है कि इस स्तोत्र के पाठ से अपनी-अपनी श्रद्धा-भक्ति के अनुसार भक्तजन विविध चमत्कारों का अनुभव करते हैं।

        श्वेताम्बर परम्परा में श्री हरिभद्रसूरि कृत भक्तामर के मंत्र एवं यंत्रमकएक विस्तृत ग्रन्थ प्रसिद्ध है। उस ग्रन्थ में 48 श्लोकों के 48 यंत्र दिये गये हैं। यंत्र-रचना की विधि भी बताई गई है और उसके अनुसार यंत्रों की आकृतियाँ भी प्राप्त होती है।

        यंत्रों की आकृतियाँ दो प्रकार की शैली में मिलती हैं। एक परम्परा के चतुष्कोण शैली में मंत्र आकृतियों में उनके ऋद्धि एवं मंत्र को विविध बीज मंत्रों से वेष्टत किया गया है। हमने उन्हीं सर्व प्रचलित यंत्रों को यहाँ प्रस्तुत किया है।

        दूसरी परम्परा में यंत्रों की कोई एक आकृति मिलती, कोई चतुष्कोण, कोई वर्तुल आकार में भी मिलती है। उनकी रचना में भी मूल काव्य नहीं है, केवल ऋद्धि, मंत्र एवं बीजाक्षरों से वेष्टन किया गया है।

        प्रस्तुत है यहाँ भक्तामर स्तोत्र का ऋद्धि, मंत्र, यंत्र विधि एक फलयुक्त पंचाग स्वरूप है। यहाँ तंत्र का विषय जानबूझकर छोड़ दिया गया है। यंत्रों के चित्र इस अध्याय के अन्त में दिये गये हैं।

काव्य 1 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं णमो अरिहंताणं णमो जिणाणं हृां हृीं हृूं हृौं हृः अ सि आ उ सा अप्रतिचक्रे फट् विचक्राय झ्रौं झ्रौं स्वाहा।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां हृीं हृूं श्रीं क्लीं ब्लूं क्रैं ऊँ हृीनम$ स्वाह।’’

विधि-विधान- श्वेत वस्त्र पहनकर, सफेद आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पवित्र मनोभावों के साथ प्रतिदिन प्राःतः एक सौ आठ बार प्रथम काव्य, ऋद्धि तथा यंत्र का आराधना करते हुए एक लाखजप सम्पन्न करना चाहिए।

फलागम- प्रथम यंत्र को भूर्ज पत्र पर केशर से लिखकर सुगन्धित धूप की धूनी देकर अपने पास रखने से उपद्रव नष्ट होते हैं, सौभाग्य की प्राप्ति होती है और लक्ष्मी का लाभ होता है। यह महाप्रभावक है।

काव्य 2 .

ऋद्धि-‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं ब्लूं नमः।’’

विधि-विधान- कालेवस्त्र पहनकर, काली माला लेकर, काले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके दंडासन मारकर इक्कीस या तीस दिन तक प्रतिदिन एक सौ आठ बार अथवा सात दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि तथा मंत्र का स्मरण किया जाता है।

फलागम- यंत्र को पास में रखने और द्वितीय काव्य एवं ऋद्धि मंत्र के स्मरण करने से शत्रु तथा सिर की पीड़ा (शिरोशूल) नाश होती है, दृष्टि-बन्ध अर्थत् वह क्रिया जिससे देखने वालों की दृष्टि में भ्रम हो जाये, दूर होता है। आराधक को मंत्र-साधन तक एकासना करना चाहिए।

काव्य 3 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो परमोहि-जिणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं सिद्धेभ्यो बुद्धेभ्यः सर्वसिद्धिदायकेभ्यो नमः स्वाहा।’’
‘‘ऊँ नमो भगवते परमतत्त्वार्थ भावकार्यसिद्धि हृां हृीं हृदूंे हृं असरूपाय नमः।’’

विधि-विधान-अंजलिभर जल को उक्त मंत्र से मंत्रित कर इक्कीस दिन तक मुख पर छींटे देने से सब लोग प्रसन्न होते हैं। यंत्र को पास में रखने तथा तीसरा काव्य, ऋद्धि, मंत्र स्मरण करने से शत्रु की नजर बन्द हो जाती है। दृष्टि दोष भी दूर होता है।

काव्य 4 .

ऋद्धि-‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सव्वोहि-जिणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं जलयात्रा जलदेवताभ्यों नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- अशुद्धि से निवृत्त होकर स्वच्छ सफेद वस्त्र पहनकर यंत्र स्थापित करे तथा यंत्र की पूजा करे पश्चात् स्फटिक मणि की माला द्वारा सात दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि तथा मंत्र का जाप करना चाहिए। दिन में एक बार भोजन और रात्रि में पृथ्वी का शयन तथा ब्रह्मचर्य-पालन करना चाहिए।

फलागम- यंत्र को पास में रखकर चैथा काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का जप करने से मंत्र-आराधक जल में नहीं डूबता और तेज बहाव वाले पानीसे बच निकलता है। जल उपद्रव शांत होता है।

काव्य 5 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो अणंतोहि-जिणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं क्रौं सर्व संकट निवारणेभ्यः सुपाश्र्व यक्षेभ्यो नमो नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान-पवित्र होकर पीले वस्त्र पहने, यंत्र स्थापित कर पूजा करे, पश्चात् पीले आसन पर बैठकर पीले रंग के फूलों अथवा चावल को केशर से रँगकर सात दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि तथा मंत्र का शुद्ध भाव से जाप किया जाता है।

फलागम- यंत्र को पास रख्ने और काव्य ऋद्धि मंत्र द्वारा मंत्रित जल को कुएं में डालने से लाल रंग के कीड़े पैदा नहीं होते। जिसकी आंखों में दर्द हो, भयानक पीड़ा होउसे सारे दिन भूखा रखकर सांयकल मंत्र द्वारा इक्कीस बार मंत्रित कर बतासों को जल में घोलकर पिलाने और अंाखों पर छींटने से दर्द दूर होता है।

काव्य 6 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो कोट्ठबुद्धीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रां श्रीं श्रूं श्रः हं सं थः थः थः ठः ठः सरस्वती भगवती विद्याप्रसादं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर लाल वस्त्र पहने, यंत्र स्थापित कर पूजा करे, पश्चात लाल आसन पर बैठकर इक्कीस दिन तक प्रतिदिन ऋद्धि तथा मंत्र का एक हजार बार जप करे। हर बार कुंदरू की धूप क्षेपण करे। दिन में एक बार भोजन और रात में पृथ्वी पर शयन करना चाहिए।

फलागम- छठवाँ काव्य तथा उक्त मंत्र को प्रतिदिन स्मरण करने से तथा यंत्र को पास में रखने से स्मरण-शक्ति बढ़ती है, विद्या बहुत शीघ्र आती है तथा बिछुड़े हुए व्यक्ति से मिलाप होता है।

काव्य 7 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो बीजबुद्धीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं हं सं श्रां श्रीं श्रीं क्रौं क्लीं सर्व दुरित-संकट-क्षुद्रोपद्रव कष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।’’
‘‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं नमः।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर हरे रंग के वस्त्र धारण कर हरे रंग के आसन पर बैठकर हरी माला से इक्कीस दिन तक प्रतिदिन एक सौ आठ बार सातवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र की जाप जपते हुए लोभान की धूप का क्षेपण किया जाता है।

फलागम- भूर्ज पत्र पर हरे रंग से लिखा यंत्र पास में रखने सेसर्प विष दूर होता है। दूसरे विष भी प्रभावशील नहीं होते। विशेष विधि से नाग भी कीलित हो जाता है।

काव्य 8 .

ऋद्धि-‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो हरिहंताणं णमो पयाणुसारीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां हृीं हृूं हृः अ सि आ उ सा अप्रतिचक्रे फट् विचक्राय झ्रौं झ्रौं स्वाहा। पुनः ऊँ हृीं लक्ष्मणरामचन्द्र देव्यै नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान-अरिष्ट अर्थात् अरीठा के बीज की माला से उन्तीस दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि तथा मंत्र जाप जपते हुए घृत मिश्रित गुग्गल की धूप का क्षेपण किया जाता है। गृहस्थ नमक की डली से होम भी करते हैं।

फलागम-यंत्र को पास में रखने से तथा आठवाँ काव्य ऋद्धि मंत्र के आराधना से सब प्रकार के अरिष्ठ अर्थात् आपत्ति-विपत्ति पीड़ा आदि दूर होते हैं। नमक के सात टुकड़े लेकरएक-एक को एक सौ आठ बार मंत्र कर पीडि़त अंग को झाड़ने से पीड़ा दूर होती है।

काव्य 9 .

ऋद्धि-‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो हरिहंताणं णमो संभिण्णसोदराणं। ’’
‘‘हृां हृीं हृूं हृः फट् स्वाहा।’’
‘‘ऊँ ऋद्धये नमः।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृींश्रीं क्रौं क्लीं रः रः हं हः नमः स्वाहा।’’‘‘ऊँ नमो भगवते जय यक्षाय हृीं हूं नमः स्वाहा। ’’

विधि-विधान-नौवाँ काव्य, ऋद्धि और मंत्र का प्रतिदिन एक सौ आठ बार जाप जपना चाहिए।

फलागम- इस काव्य, ऋद्धि और मंत्र के बार-बार स्मरण करने तथा यंत्र को पास में रखेन से मार्ग में चोर-डाकुओं का भय नहीं रहता। चार कंकडि़यों को लेकर प्रत्येक कंकरी को एक सौ आठ बार मंत्र कर चारों दिशाओं में फेैंकने से मार्ग कीलित हो जाता है।

काव्य 10 .

ऋद्धि-‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सयं-बुद्धीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां हृों हृौं हृः श्रीं श्रूं श्रः सिद्ध-बुद्ध कृतार्थों भव-भव वषट् सम्पूर्ण स्वाहा।’’

(जन्मसध्यानतो जन्मतो वा मनोत्कर्ष-धृतावादिनोर्या-नाक्षान्ता भवे प्रत्यक्ष-बुद्धान्मनो)
ऊँ हृीं अर्हं णमो शत्रु विनाशनाय जय-पराजय उपसर्गहराय नमः।’’

विधि-विधान- पीले रंग के वस्त्र पहनकर, पीले रंग की माला से सात या दस दिन तक प्रतिदिन एक सौ आठ बार दसवाँ काव्य ऋद्धि तथा मंत्र का आराधना करते हुए कुंदरू की धूप क्षेपण किया जाता है।

फलागम-यंत्र को पास में रखने से कुत्ते के काटने का विष उतर जाता है। नमक की सात डली लेकर प्रत्येक को एक सौ आठ बार मंत्र कर खाने से कुत्ते का विष असर नहीं करता।

काव्य 11 .

ऋद्धि-‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सयं-बुद्धीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं श्रां श्रीं कुमति-निवारिण्ये महामायायै नमः स्वाहा। ऊँ नमो नगवते प्रसिद्धरूपाय भक्ति-युक्ताय सां सीं सौं हृां हृीं हृौं क्रौं झ्रौं नमः।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर सफेद वस्त्र पहनकर शुद्ध भावों से जप करे। एकान्त भाग में बैठकर या खड़े होकर प्रसन्न चित्त से सफेद माला द्वारा या लाल रंग की माला से इक्कीस दिन तक प्रतिदिन गयारहवाँ काव्य ऋद्धि तथा मंत्र काएक सौ आठ बार आराधना करते हुए कुंदरू की धूप का क्षेपण किया जाता है।

फलागम- यंत्र को पास में रखने से जिसे आप बुलाना चाहते हों वह आ जाता है। मुट्ठी सफेद सरसों को उक्त मंत्र से बारह हजार बार मंत्र कर ऊपर उछालकर फेंकने से जलवृष्टि होती है।

काव्य 12 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो बोहिबुद्धीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ आं आं अं अः सर्वराजा प्रजामोहिनी सर्वजनवश्यं कुरू कुरू स्वाहा।’’
ऊँ नमो भगवते अतुलबलपराक्रमाय आदीश्वर यक्षाधिष्ठाय हृां हृीं नमः।’’
ऊँ हृीं श्रीं क्लीं निजधर्मचिंताय झ्रौं क्रौं रं हृीं नमः।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर लाल रंग के वस्त्र पहनकर लाल रंग की माला द्वारा बयालीस दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि तथा मंत्र का आराधना करते हुए दशांग धूप दिया जाता है।

फलागम-बारहवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र स्मरण करने तथा यंत्र को पास में रखने से और एक सौ आठ बार तेल को उक्त मंत्र द्वारा मंत्रित कर हाथी को पिलाने सेउसका मद उतर जाता है। बार-बार मंत्र स्मरण से पति-पत्नी का गृह-कलह शान्त हो जाता है।

काव्य 13 .

ऋद्धि-‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो बोहिबुद्धीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्री हं सः हृौ हृां हृीं द्रां द्रीं द्रौं द्रः मोहिनी सर्व वश्यं कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ भाना अष्टसिद्धि क्रौं हृौं ह्म्ल्र्यूं युक्ताय नमः। ऊँ नमो भगवते सौभाग्य रूपाय हृी नमः।’’

विधि-विधान-पवित्र होकर पीले वस्त्र पहनकर पीली माला द्वारा सात दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि तथा मंत्र का स्मरण करते हुए कुंदरू की धूप क्षेपण की जाती है। साधनाकाल में दिन में एक बार भोजन एवं रात मेें पृथ्वी पर शयन करना चाहिए।

फलागम- तेरहवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र के स्मरण से एवं यंत्र पास रखने और सात कंकरी लेकर हरेक को एक सौ आठ बार मंत्र कर चारों दिशाओं में फेंकने से चोर चारी नहीं कर पाते तथा मार्ग में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता।

काव्य 14 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो वउलमतीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो भगवती गुणवती महामानसी स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर सफेद वस्त्र धारण कर स्फटिक मणि की माला द्वारा प्रतिदिन तीनों काल एक सौ आठ बार चैदहवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का आराधना करे, दीपक जलाकर, धूप प्रक्षेपण करे।

फलागम- यंत्र पास रखने से तथा सात कंकरी लेकर प्रत्येक को इक्कीस बार मंत्रित कर चारों ओर फेंकने से अधि-व्याधि और शत्रु का भय नाश होता है। लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तथा बुद्धि का विकास होता है। सरस्वती देवी प्रसन्न होती है।

काव्य 15 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो दसपुव्वीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो भगवती गुणवती सुसीमा पृथ्वी वज्रश्रृंख्ला मानसी महामानसी स्वाह।’’
‘‘ऊँ नमो अचिन्त्यबल-पराक्रमाय सर्वार्थकामरूपाय हृां हृीं क्रौं श्रीं नमः।’’

विधि-विधान- स्नान करके लाल रंग के वस्त्र धारण कर लाल आसन पर बैठकर मूँगा की लाल माला द्वारा चैदह दिन तक प्रतिदिन पन्द्रहवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का स्मरण करते हुए दशांग धूप क्षेपण किया जाता है तथा प्रतिदिन एकाशन करना चाहिए।

फलागम- उपरोक्त ऋद्धि मंत्र द्वारा इक्कीस बार तेल मंत्र कर मुख पर लगाने से राजदरबार में प्रभाव बढ़ता है, सम्मान प्राप्त होता है और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इस ऋद्धि मंत्र के बारम्बार स्मरण से तथा भुजा पर यंत्र बाँधने से स्वप्नदोष कभी नहीं होता।

काव्य 16 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो चउदसपुवीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमः सुमंगला सुसीमा नामदेवी सर्वसमीहितार्थ वज्रश्रृंखलां कुरू कुरू स्वाह स्वाह।’’

विधि-विधान- स्नान द्वारा पवित्र होकर नौ दिन तक प्रतिदिन हरे रंग की माला से एक हजार सोलहवाँ काव्य ऋ़द्धि तथा मंत्र स्मरण करते हुए कुंदरू की धूप क्षेपण किया जाता है।

फलागम- यंत्र कोपास में रखने से तथा एक सौ आठ बार शुद्ध भावों से ऋद्धि मंत्र का स्मरण कर राजदरबार में पहुँचने पर प्रतिपक्षी पराजित होता है और शत्रु काभय नहीं रहता। पुनश्च इसी ऋद्धि मंत्र द्वारा जल मंत्र कर छींटने से हर प्रकार की अग्नि शान्त हो जाती है।

काव्य 17 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो महानिमित्त-कुसलाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ णमो णमिऊण अट्ठे मट्ठे क्षुद्र विधट्ठे क्षुद्रपीड़ां जठरपीड़ां भंजय-भंजय सर्वीपड़ां सर्वरोग-निवारणं कुरू कुरू स्वाह।’’
‘‘ऊँ णमो अजित शत्रु पराजयं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र भावों से सात दिन तक प्रतिदिन सफेद माला द्वारा एक हजार बार सत्रहवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र स्मरण करते हुए चंदन की धूप क्षेपण करना चाहिए।

फलागम- यंत्र को बाँधने तथा अछूता शुद्ध जल ऋद्धि मंत्र द्वारा इक्कीस बार मंत्र कर पिलाने से उदर की असाध्य पीड़ा, वायुगोला, वायुशूल आदि रोग दूर होते हैं।

काव्य 18 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो विउयणयड्ढि पत्ताणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो भगवते जय विजय मोहय मोहय स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा। ऊँ नमो शास्त्र ज्ञानबोधनाय परमर्द्धि प्राप्ति हृां हृीं क्रौं श्रीं नमः। ‘‘ऊँ नमो भगवते शत्रु सैन्य निवारणाय यं यं यं क्षुर विध्वंसनाय नमः क्लीं हृीं नमः।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर लाल रंग की माला द्वारा सात दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार अठारहवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र स्मरण करते हुए दशांग धूप क्षेपण किया जाता है। दिन में एक बार शुद्ध भोजन करना चाहिए।

फलागम- यंत्र को पास में रखने से तथा एक सौ आठ बार ऋद्धि मंत्र के स्मरण से शत्रु की सेना का स्तम्भन होता है। इस मंत्र का आराधना करने वाले आराधक के मन में व्यर्थ के संकल्प-विकल्प पैदा नहीं होते। चिन्ता, कोप, दुध्र्यान, मोह, मिथ्यात्व का नाश होता है तथा धर्मध्यान में चित्त स्थिर रहता है।

काव्य 19 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो विज्जाहरणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां हृीं हृूं हृः य क्ष हीं वषट् नमः स्वाह।’’

विधि-विधान- प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें तथा मन को एकाग्र करके उन्नीसवां काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का एक सौ आठा बार स्मरण करना चाहिए।

फलागम- यंत्र को पास में रखने से आराधक पर प्रयोग किये हुए दूसरे के मंत्र, विद्या, टोटका, जादू, मूठ आदि का प्रभाव नहीं पड़ता और न ही उच्चाटन का भय रहता है। यदि कोई भाग्यहीन पुरूष इस ऋद्धि मंत्र का सतत स्मरण करे तो उसकी आजीविका सुचारू रूप से चलने लगती है। सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध होने लगते हैं।

काव्य 20 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो चारणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां श्रीं श्रूं श्रः शत्रु-भय-निवारणय टः ठः नमः स्वाहा। ऊँ नामो भगवते पुत्रार्थसौख्यं कुरू कुरू स्वाहा, हृीं नमः।’’

विधि-विधान-प्रातः पवित्र होकर शु़द्ध वस्त्र पहनकर यंत्र स्थापित कर पूजा करें, पश्चात् पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर नौ बार णमोकार मंत्र पढ़े, तदुपरान्त बीसवां काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का एक सौ आठ बार स्मरण करे।

फलागम- यंत्र को पास में रखने से तथा ऋद्धि मंत्र का एक सौ आठ बार स्मरण करने से सन्तान की प्राप्ति होती है, लक्ष्मी का लाभ, सौभाग्य की वृद्धि, विजय प्राप्ति तथा बुद्धि का विकास होता है।

काव्य 21 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो समणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमः श्रीमणिभ्रद जय-विजय अपराजिते सर्वभौभाग्यं सर्वसौक्ष्यं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर लाल वस्त्र धारण कर लाल माला द्वारा बयालीस दिन तक प्रतिदिन एक सौ आठ बार इक्कीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का स्मरण करना चाहिए।

फलागम-यंत्र पास में रखने तथा काव्य, ऋद्धि और मंत्र का स्मरण करते रहने से सर्वजन, स्वजन और परिजन अपने अधीन होते हैं। सभी अनुकूल एवं वशीभूषण होते है।

काव्य 22 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं अगास-गामिणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमः श्री वीरेहिं जृम्भय जृम्भय मोहय मोहय सस्तम्भय स्तम्भय अवधारणं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर शुद्ध वस्त्र धारण यंत्र स्थापित कर उसकी पूजा करे। मंगलकलश रखे, प्रज्वलित दीपक सामने रख पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर प्रतिदिन एक सौ आठ बार बाईसवाँ काव्य ऋद्धि तथा मंत्र का स्मरण करना चाहिए।

फलागम- यंत्र को गले में बाँये से तथा हल्दी की गाँठ को इक्कीस बारऋद्धि मंत्र द्वारा मंत्र कर चबाने से डाकिनी, शाकिनी, भूत, पिशाच, चुडैड आदि की बाधाएं दूर होती हैं।

काव्य 23 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो आसी-विसाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमः भगवती जयावती मम समीहितार्थ मोक्ष सौख्यं कुरू कुरू स्वाहा।’’ ऊँ हृीं श्रीं क्लीं सर्व सिद्धाय श्रीं नमः।’’

विधि-विधान- शुभ योग में पवित्र हो सफेद वस्त्र धारण कर उत्तराभिमुख यंत्र स्थापित कर मंगलकलश रखे, दीपक जलावे तथा यंत्र की पूजा करे, पश्चात् सफेद माला द्वारा चार हजार बार ऋद्धि मंत्र का आराधनकरके मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम- सर्वप्रथम स्वशरीर की रक्षा के लिए एक सौ आठ बारतेईसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र स्मरण कर पश्चात् जिसे भूत-पे्रेत की बाधा हो उसे यंत्र बाँधे तथा मंत्र द्वारा झाड़े तो प्रेत बाधा दूर होती है।

काव्य 24 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो दिट्ठि-विसाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमः भगवती वड्ढमाण सामिस्ससर्व समीहिंत कुरू कुरू स्वाहा।’’
ऊँ हृां हृीं हृूं हृौं हृः अ सि आ उ सा झ्रौं झ्रौं स्वाहा

विधि-विधान- पवित्र होकर गेरूवा रंग के वस्त्र पहने, यंत्र स्थापित कर पूजा करें, दीपक जलावे, अरती उतारे, पश्चात् प्रतिदिन एक सौ आठ बार अथवा सात दिन तक प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि मंत्र का आराधना करना चाहिए।

फलागम- इक्कीस बार राख मंत्र पर दुखते हुए शिर पर लगाने से और यंत्र को पास में रखने से आधाशीशी, सूर्यवात, मस्तक का वेग आदि शिर सम्बन्धी सब तरह की पीड़ाएं दूर होती हैं।

काव्य 25 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां हृीं हृौं हृः अ सि आ सि आ उ सा झ्रौं झ्रौं स्वाहा। ऊँ नमः भगवते जय विजयापराजिते सर्व सौभाग्यं सर्वसौख्यं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर लाल रंग के वस्त्र पहनकर यंत्र स्थापित कर उसकी पूजा करे, आरती उतारे। रात्रि केसमय किसी एकान्त स्थान में निर्भय होकर चार हजार बार ऋद्धि मंत्र का स्मरण कर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम- पच्चीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र को स्मरण एवं यंत्र को पास में रखने से धीज उतरती है। नजर उतरती है। दृष्टिदोस से बचता है, अग्नि का प्रभाव नहीं पड़ता तथा मारने के लिए उद्यत शत्रु के हाथ से शस्त्र गिर पड़ता है, वह वार नहीं कर पाता।

काव्य 26 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो ऊँ हृीं श्रीं क्लीं हृूं हृूं परजन-शान्ति व्यवहारे जयं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर लाल रंग के वस्त्र धारण करउत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित करे, आरती उतारे,यंत्र का पूजन करे, पश्चात् अर्द्ध-रात्रि से अपराहन्न काल तक बारह हजार बार ऋद्धि मंत्र का जाप जपकर मंत्र सिद्ध करे।

फलागम- यंत्र को पास में रखने से तथा ऋद्धि मंत्र द्वारा एक सौ आठ बार तेल मंत्र का शिर पर लगाने से अर्धकपाली (आधे शिर की पीड़ा) नष्ट होती है। मंत्रित तेल की मालिश तथा मंत्रित जल को पिलाने से प्रसूता की पीड़ा दूर होती है। इस मंत्र के प्रभाव से प्राणान्तक रोग भी शान्त हो जाते हैं।

काव्य 27 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो चक्रेश्वरी देवी चक्रधारिणी चक्रेण-अनुकूलं साधय साधय शत्रून् उन्मूलय उन्मूल्य स्वाहा। ऊँ नमो भगवते सर्वार्थ सिद्धार्थ सिद्धाय सुखाय हृीं श्रीं नमः।

विधि-विधान- पवित्र होकर काले वस्त्र पहने, रक्त चन्दन से यंत्र लिखकर स्थापित करे, यंत्र की पूजा करे, पश्चात करे, पश्चात् 21 दिन तक प्रतिदिन काले रंग की माला से एक सौ आठ बार सत्तईसवाँ काव्य, ऋद्ध तथा मंत्र का जाप करते हुए एक सौ आठ पुष्प चढ़ाना चाहिए। बिना नमक काएक बार भोजन करना चाहिए।

फलागम- यंत्र को पास में रखने तथा ऋद्धि मंत्र का बार-बार स्मरण करते रहने से शत्रु मंत्र आराधना में कोई बाधा नहीं पहुँचा सकता। वह पराजित हो जाता है।

काव्य 28 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो महातवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो भगवते जये विजये, जृम्भय, जृम्भय, मोहय मोहय, सर्वसिद्धि सम्पत्ति-सौख्यं कुरू कुरू स्वाह।’’

विधि-विधान-पवित्र होकर पीले वस्त्र धारण करे, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित कर उसकी पूजा करे, पश्चात् पीले आसन पर बैठकर पीली माला द्वारा प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि मंत्र का आराधन कर बारह हजार जप पूरा करे। पीले फूल चढ़ावे।

फलागम- यंत्र पास में रखने तथा प्रतिदिन अट्ठाईसवाँ काव्य,ऋद्धि तथा मंत्र के आराधना करते रहने से व्यापार में लाभ, सुख-समृद्धि, यश, विजय, सम्मान तथा राजदरबार में प्रतिष्ठा बढ़ती है।

काव्य 29 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो घोर-तवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ णमो णमिऊण पास विसहर फुलिंग मंतो विसहर नाम रकार मंतो सर्वसद्धि-मीहे इह समरंताणं मण्णे-जागई कष्पदुमच्चं सर्वसिद्धिः ऊँनमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- स्नान करके आसमानी रंग के वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित करे, आरती उतारे, पूजा करे, मंत्र सिद्धि पर्यन्त प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि मंत्र की आराधना करनी चाहिए।

फलागम- यंत्र पास में रखने तथा उन्तीसवाँ काव्य, ऋद्धि और मंत्र द्वारा एक सौ आठ बार मंत्र कर जल पिलाने से नशीले स्थावर पदार्थ, जैसे-भांग, चरस, धतूरा आदि नशे का प्रभाव दूर होता है तथा दुखती आँख की पीड़ा दूर होती है। बिच्छू का विष भी उतर जाता है।

काव्य 30 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ (हृीं श्रीं श्री पाश्र्वनाथाय हृीं धरणेन्द्र पद्मावती सहिताय) नमो अट्ठे मट्ठे क्षुद्रान् स्तम्भय स्तम्भय रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान-स्नान करके सफेद वस्त्र धारण कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित करे, यंत्र की पूजा करे, सफेद चढ़ावे, आरती उतारे, पश्चात् सफेद आसन पर पद्म सेन बैठकर स्फटिक मणि की माला द्वारा प्रतिदिन एक हजार बार ऋद्धि मंत्र का आराधना कर उसे सिद्ध करना चाहिए।

फलागम- उपरोक्त ऋद्धि मंत्र के बार-बार स्मरण करने तथा यंत्र को पास में रखने से शत्रु का स्तम्भन होता है। बियावन वन में चोर सिंहादिक हिंसक पशुओं का भय नहीं रहता। सब प्रकार के भय दूर भागे जाते है।

काव्य 31 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं-परक्रमाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ उवसग्गहरं पासं वंदामि कम्म-घण-मुक्कं। विसहर विसंणिण्णासं मंगल-कल्लाण-आवासं ऊँ हृीं नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर रक्त वर्ण के वस्त्र धारण कर यंत्र स्थापित करे, यंत्र की पूजा करे, जल से परिपूर्ण कलश रखे, पश्चात् उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर पद्मासन लगाकर प्रतिदिन ऋद्धि मंत्र का जाप जपते हुए सात हजार पाँच सौ जाप पूरा करे।

फलागम- प्रतिदिन एक सौ आठ इकतीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र स्मरण करने और यंत्र कोपास में रखने राजदरबार में सम्मान मिलता है, राजा वश में होता है तथा सब तरह के चर्म रोगों से छूटकारा हो जाता है।

काव्य 32 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो घोर गुणबंभचारिणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां हृीं हृूं हृौं हृः सर्व-दोष-निवारणं कुरू कुरू स्वाहा। सर्व सिद्धिं वृद्धिं वांछों पूर्ण कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान-पवित्र होकर पीत वर्ण के वस्त्र धारण कर यंत्र स्थापित करे, पाश्र्व भाग में मंगलकलश रखे, यंत्र की पूजा करे, पश्चात् पूर्व दिशा की ओर मुख करके पद्मासन लगाकर एक हजार आठ बार पीली माला से ऋद्धि मंत्र जपकर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम- अविवाहित कन्या द्वारा काते हुए कच्चे धागे की बत्तीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र द्वारा इक्कीस बारया एक सौ आठ बार मंत्र कर उस धागे को गले में बाँधने से और यंत्र को पास में रखने से संग्रहणी आदि उदर की सब तरह की पीड़ायें दूर होती हैं।

काव्य 33 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सव्वोसहि-पत्ताणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृां श्रीं क्लीं ब्लूं ध्यान-सिद्धि परम-योगीश्वराय नमे नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर धवल वस्त्र धारण कर पूर्व दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित करे, यंत्र की पूजा-अर्चना करे, पश्चात् सफेद आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठकर सफेद माला द्वारा घृत मिश्रित गुग्गुल की धूप क्षेपण करते हुए एक हजार आठ बारऋद्धि मंत्र का जाप कर सिद्धि प्राप्त करना चाहिए।

फलागम- कुमारी कन्या द्वारा काते हुए कच्चे धागे का गंडा बनाकर और उसे तेंतीसवें काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र द्वारा इक्कीस बार मंत्र कर बाँधने, झाड़ा देने तथा यंत्र पा में रखने से एकांतरा, ताप ज्वर, तिजारी आदि रोगी दूर होते हैं।

काव्य 34 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो खिल्लोसहि-पत्ताणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो हृी श्रीं ऐं हृौं पद्मावत्यैक् देव्यै नमो नमः स्वाहा। ऊँ प च य म हृां हृीं नमः।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर सफेद रेश्मी वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके मंगलकलश तथा यंत्र की स्थापना कर यंत्र पूजा करे, पश्चात सफेद आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके पद्मासन लगाकर स्फटिक मणि की माला द्वारा बारह हजार बार ऋद्धि मंत्र जपकर सिद्धि प्राप्त करना चाहिए।

फलागम- केशरिया रंग से रँगे हुए धागे को एक सौ आठ बार चैंतिसवें काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र से मंत्रित कर गूगल की धूनी देकर गले में या कटि प्रदेश में बाँधने और यंत्र को पास में रखने से गर्भ का स्तम्भन होता, उस समय में गर्भ का पतन नहीं होता।

काव्य 35 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो जल्लोसहि-पत्ताणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो जय विजय अपराजिते महालक्ष्मी अमृतवर्षिणी अमृतस्त्राविणी अमृतं भव भव वषट् सुधायै स्वाहा। ऊँ नमो गजगमने सर्व कल्याणमूर्तें रक्ष रक्ष नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर पीले रंग के वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित करे, यंत्र की पूजा करे, पीले फूल चढ़ावे। द्वीप प्रज्वलित करे, पश्चात् पीले रंग की माला द्वारा चार हजार बार ऋद्धि प्राप्त करना चाहिए। पीछे प्रतिदिन एक सौ आठ बार जप करना चाहिए।

फलागम- यंत्र पास में रखने और पैंतीसवें काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र की आराधना से मरी, मिरगी, चोरी, दुर्भिक्ष, राज्य-भय आदि होते हैं तथा व्यापार में लाभ होता है, राज्य में मन्यता होती है, वचन प्रामाणिक माने जाते हैं।

काव्य 36 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो विप्पोसहि-पत्ताणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रीं कलिकुण्ड-दण्ड-स्वामिन् आगच्छ। आत्ममंत्रान् आकर्षय आकर्षय। आत्ममंत्रान् रक्ष रक्ष। परमंन्नन् छिन्द छिन्द मम समीहितं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान-स्नान करके पीले वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित कर यंत्र की पूजा पीले फूलों से करे, दीपक जलावे, पश्चात् पीले आसन पर पद्मासन लगाकर पीली माला द्वारा हजार जप पूर्ण कर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम- यंत्र पास में रखने तथा प्रतिदिन एक सौ आठ बार छत्तीसवें काव्य-ऋद्धि मंत्र के आराधनसे सुवर्णादिक धातुओं के व्यापार में लक्ष्मी का लाभ होता है। राज्य में मान्यता प्राप्त होती है। पाँच पंच में बात प्रामणिक मानी जाती हैं

काव्य 37 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सव्वोसहि-पत्ताणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो भगवते अप्रतिचक्रे ऐं क्लीं ब्लू ऊँ हृीं मनोवंछित-सिद्धयै नमो नमः अप्रतिचक्रे हृीं ठः टः स्वाहा।’’

विधि-विधान- स्नान करके सफेद वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित कर उसकी पूजा अर्चा कर, पश्चात् धवलासन पर बैठकर गुग्गुल, कपूर, केशर, कस्तूरी मिश्रित एक हजार आठ गोली बनावे और ऋद्धि मंत्र का जाप करते हुए एक-एक गोली अग्नि मेें छोड़ा जाये। इस प्रकार मंत्राराधन कर सिद्धि प्राप्त करना चाहिए।

फलागम-यंत्र पास में रखने तथा सैंतीसवें काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र से इक्कीस बार जल मंत्र कर मुख पर छिडकने से दुष्ट पुरूषों के दुर्वचनों का स्तम्भन होता हैं और दुर्जन पुरूष वश में होता है, कीर्ति तथा यश की वृद्धि होती है।

काव्य 38 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो मणबलीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो भगवते महा-नाग-कुलोच्चाटिनी काल-द्रंष्ट्र मृतकोत्थापिनी पर-मंत्र प्रणशिनी देवि शासन देवते हृीं नमो नमः स्वाहा। ऊँ हृीं शत्रुविजयरणरणाग्रे ग्री ग्रः नमोनमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकरपीले वस्त्र पहनकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित करयंत्र की पूजार्चा करने के पश्चात् पीले आसनपर बैठकर पीली मालाद्वारा एक हजार आठ बार ऋद्धि मंत्र का स्मरण करते हुए मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम-अड़तीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का बारम्बार आराधना करने और यंत्र को पास में रखने से मदोन्मत्त हाथी वश में होता है और अर्थ की प्राप्ति होती है।

काव्य 39 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो वयणलीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नमो एषु वृत्तेषु वर्द्धमान तव ीायहरं वृत्ति वर्णायेषु मंत्राः पुनः स्मर्तव्या अतो ना-परमंत्र-निवेदनाय नमः स्वाहा।

विधि-विधान- पवित्र होकर पीले वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थपित कर उसकी पूजा करे, पश्चात् पीले आसन परउत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठकर पीत वर्ण की माला द्वारा एक हजार आठ बार ऋद्धि मंत्र का शुद्ध मन से आराधना करें तथा प्रत्येक मंत्र के बाद गुग्गुल, केशर, कर्पूर, कस्तूरी, घृत मिश्रित धूप को खेते रहना चाहिए।

फलागम- यंत्र को पास मेंरखने तथा उनतालीसवें काव्य, ऋद्धि ओर मंत्र के स्मरण करने से मार्ग में सर्प, सिंह, बाध आदि जंगली क्रूर हिंसक पशुओं का भय नहीं रहता तथा विस्तृत रस्ता मिल जाता है और आराधक गन्व्य स्थान को बिना किसी कष्ट के प्राप्त कर लेता है।

काव्य 40 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो कायबलीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं हृां हृीं अग्निमुपशमनं शान्ति कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर लाल रंग के वस्त्र पहनकर पूर्वाभिमुख मंगलकलश तथा उत्तराभिमुख यंत्र स्थापित कर यंत्र की पूजा करे, पश्चात् लाल आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर लाल रंग की माला से ऋद्धि मंत्र का बारह हजार बार जप करके मंत्र सिद्ध करना चहिए।

फलागम- यंत्र को पास में रख्ने से तथा चालीसवें काव्य, ऋद्धि एवं मंत्र से इक्कीस बार जल मंत्र कर चारों ओर छिड़कने से अग्नि का भय दूर होता है।

काव्य 41 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो खीरासवीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ हृीं श्रां श्रीं श्रूं श्रौं श्रः जलदेविकमले पद्महद निवासिनी पद्मोपरि-संस्थिते सिद्धिं देहि मनोवांिछित कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ हृीं आदिदेवाय हीं नमः।’’

विधि-विधान- स्नान करके सफेद वस्त्र धारण कर पूर्वाभिमुख यंत्र स्थपित कर उसकी पूजा करे, दीपक जलावे, आरती उतारे, पश्चात् सफेद आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर स्फट कमणि की माला द्वारा ऋद्धि मंत्र का बारह हजार बार आराधना कर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम- यंत्र को पास में रखने से तथा इकतालीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का बार-बार स्मरण करने से राजदरबार में सम्मान मिलता है, प्रतिष्ठा बढ़ती है तथा इसी मंत्र के झाड़ने से विषधर का विष उतरता है। कांस्य-पात्र में जल भरकर एक सौ आठ बार मंत्र कर मंत्रित जल पिलाने से विष का प्रभाव दूर हो जाता है।

काव्य 42 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सप्पिसवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नामो णमिऊण विषधर-विष-प्रणासन-रोग-शोक-दोष ग्रह कप्पदुमच्च जायई सुहनाम ग्रहण सकल सुहृदे। ऊँ नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर धवन वस्त्र पहनकर रक्तचंदन से लिखे यंत्र को पूर्व दिशा की ओर स्थापित करे, यंत्र की पूजा करे, दीपक जलावे, आरती उतारे, पश्चात् रक्त आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर लाल रंग की माला द्वारा बारह हजार पाँच सौ बार ऋद्धि-मंत्र का जाप जपे तथा मंत्र सिद्ध करे।

फलागम- यंत्र को भुजा में बाँधने तथा ऋद्धि मंत्र का स्मरण करते रहने से भयंकर युद्ध में भी भय उत्पन्न नहीं होता। राजा का क्रोध शान्त होता है और वह पीठ दिखाकर भाग जाता है। चन्दा की चाँदनी-सी कीर्ति चारों और फैलती है।

काव्य 43 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो महुरसवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नामो चक्रेश्वरीदेवी चक्रधारिणी जिन-शासन-सेवाकारिणी क्षुद्रोपद्रव-विनाशनी धर्मषान्तिकारिणी नमः शान्ति कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- स्नान करके शुद्ध स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण कर पूर्व दिशा की ओर यंत्र स्थापित कर यंत्र की पूजा करना चाहिए, पश्चत उत्तराभिमुख सफेद आसन पर बैठकर सफेद मालाद्वारा बारह हजार पाँच सौ बार ऋद्धि मंत्र का आराधन कर मंत्र सिद्ध करे।

फलागम- तेतालीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र के स्मरण करने और यंत्र की पूजा करने एवं उसे पास में रखने से सब प्रकार के भय दूर होते है। संग्राम में अस्त्र-शस्त्रें की चोटें नहीं लगती तथा राजा द्वाराधन लाभ होता है।

काव्य 44 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो अमीअसवाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नामो रावणाय विभीषणाय कुम्भकरणाय लंकाधिपये महाबल पराक्रमाय मनश्चिन्तितं कुरू कुरू स्वाहा।’’

विधि-विधान- स्नान के बाद सफेद स्वच्छ वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित करयंत्र की पूजा करे, मंगलकलश रखे, दीपक जलावे, अरती उतारे, पश्चात् धवलासन पर बैठकर स्फटिकमणि की माला द्वाराएक हजार आठ बार ऋद्धि मंत्र का आराधन कर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम-चवालीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र की आराधना से तथा यंत्र के अपने पास रखने से आपत्तियाँ दूर होती है। समुद में तूफान का भय नहीं होता। आसानी से समुद्र पार कर लिया जाता है।

काव्य 45 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो अक्खीणमहाणसाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नामो भगवतीक्षुद्रोपद्रव-शान्तिकारिणी रोगकष्ट ज्वरोपशमनं शान्ति कुरू कुरू स्वाहा। ऊँ हृीं भगवते भयभीषणहराय नमः।’’

विधि-विधान- पवित्र होकर पीले रंग के वस्त्र पहनकर दक्षिण दिशा की ओर यंत्र स्थापित कर यंत्र की पूजा करे, पश्चात् पीले आसन पर बैठकर पीले रंग की माला द्वारा एक हजार आठ बार ऋद्धि का स्मरण कर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम- पैंतालीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा यंत्र जपने और यंत्र को पास में रखने से तथा उसकी त्रिकाल पूजा करनेसे अनेक प्रकार की व्याथियों की पीड़ा शान्त होती है और महाभयानक मरण-भय-जलोदर, भगन्दर, गलित कोढ आदि शान्त होते हैं तथा उपसर्ग दूर होते है।

काव्य 46 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो वड्ढमाणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नामो हृां हृीं श्रीं हृूं हृौं हृः ठः ठः जः जः क्षां क्षीं क्षूँ क्षः क्षयः स्वाहा।’’

विधि-विधान- स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित कर पीले फूलों से यंत्र की पूजा करना चाहिए। मंगलकलश की स्थापना भी करे, दीपक जलाकर आरती उतारे, पश्चात् पीले आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर माला द्वारा ऋद्धि मंत्र का बारह हजार बार जप पूरा करे तो मंत्र सिद्ध होवे।

फलागम-संकट आनें पर निरन्तर छियालीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र को जपने और यंत्र को रखने तथाउसकी त्रिकाल पूजा करने से कारागार में लौह-श्रृंखलाओं से बँधा हुआ शरीर बन्धन-मुक्त हो जाता है और कैद से छुटकारा होता है। राजा आदि का भय नहीं रहता।

काव्य 47 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सिद्धायदणाणं वड्ढमाणाणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नामो हृां हृीं हृः य क्ष श्रीं हृीं फट् स्वाहा।’’

विधि-विधान- स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित कर उसकी पूजा-अर्चा करना चाहिए, पश्चात् धवल आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर सफेद माला द्वारा नौ हजार बार ऋद्धि मंत्र का आराधना कर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम-यंत्र को पास में रखने, यंत्र का अभिषेक कर उसकी पूजा-अर्चा करके सैंतालीसवाँ काव्य, ऋद्धि तथा मंत्र का एक सौ आठ बार पवित्र भावों के साथ स्मरण करने से विपक्षी शत्रु पर चढ़ाई करने वाले को विजयलक्ष्मी प्राप्त होती है, शत्रु कानाश और उसके सभी हथियार मोथरे हो जाते है, बन्दूर की गोली, बरछी आदि के घाव नहीं होते। इसके अतिरिक्त मदोन्मत्त हस्ती, सिंह, दावानल, भयंकर सर्प, समुद्र महान् रोग तथा अनेक तरह के बन्धनों से छुटकारा हो जाता है।

काव्य 48 .

ऋद्धि- ‘‘ऊँ हृीं अर्हं णमो सव्व साहूणं ऊँ णमो भयवं महति महावीर वड्ढमाणाणं बुद्धिरिसीणं।’’

मंत्र - ‘‘ऊँ नामो हृां हृीं हृूं हृौं हृः अ सि आ उ सा झ्रौं झ्रौं स्वाहा।
ऊँ नमो बंभचारिणे अट्ठारह सहस्त्र सीलांगरथधारिणे नमः स्वाहा।’’

विधि-विधान- स्नान करके पीले रंग के वस़्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुख करके यंत्र स्थापित कर पीले पुष्पों से मंत्र की पूजा करके पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर पीले रंग की माला द्वारा चार हजार पाँच सौ बार अथवा एक लाख बार ऋद्धि मंत्र का आराधन सात महीने में पूर्ण कर मंत्र सिद्ध करना चाहिए।

फलागम-प्रतिदिन एक सौ आठ बार इक्कीस दिन तक अथवा उनचास दिन तक ऋद्धि मंत्र तथा उ़तालीसवाँ काव्य का स्मरण करने और मंत्र को पास में रखने से मनोवांछित कार्य की सिद्धि होती है। जिसको अपने अधीन करना होउस व्यक्ति का नाम चिन्तन करने से वह व्यक्ति अपने वश में होता है। लक्ष्मी प्राप्त होती है।

भक्तामर स्तोत्र की महिमा महनीय है। जो स्त्री-पुरूष श्रद्धा के साथ नित्य इस महान् स्तोत्र का पाठ-पारायण करता है, उसके हृदय का कमल खिल जाता है। उसमें अनुस्यूत दिव्य प्रकाश विकीर्ण हो जाता है, जिससे वह आध्यात्मिक विकास की ओर अग्रसर होता है। आशय यह है कि भक्तामर स्तोत्र के नित्य पाठ से असाधारण आराधक को मोक्ष मिलता है तो साधारण आराधक अपने को धन्य समझने लगता है। इस प्रकार भक्तामर स्तोत्र के नित्य नियमित पाठ-पारायण करने से मुक्ति और भुक्ति दोनों प्रकार के सुख मिलते हैं अतएव विज्ञजनों को इस ओर विशेष ध्यान देने की अपेक्षा है। कितने ही व्यक्ति यह स्तोत्र बाँधकर, पढ़कर उसका पाठ करते हैं, परन्तु कंठस्थ श्लोकों से पाठ करते समय जो भावोल्लास उमड़ता है, आनन्द आता है, वह पढकर पाठ करने से नहीं आता। आचार्य मानतुंग ने अपने इस स्तोत्र के अंतिम छन्द में ‘धत्ते जनो य इह कण्ठगतामजस्त्रं’ कहकर कंठस्थ करने का संकेत दिया है। भावों की अभिवृद्धि और विशुद्धि में यह स्तोत्र सहायक है।

इसस्तोत्र का पाठ चैत्र, ज्येष्ठ तथा आषाढ मास में नहीं करना चाहिए, शेष में इसका पारायण शुभकर होता है।

उक्त महीनों में शुल्क पक्ष और पूर्णा तिथि को पाठ आरम्भ करने का निर्देश दिया गया है, अर्थात सुदी पाँचमी, दसमी, पूर्णिमा के दिन आरम्भ करना चाहिए। इस स्तोत्र का पाठ दिन में बारह बजे के पूर्व कर लेना चाहिए। सूर्योदय से पूर्व पाठ किया जावे तो वह सर्वोत्तम है। पाठ करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन लगाकर बैठना चाहिए, मन में भगवान ऋषीदेव का ध्यान करें या सामने चित्र आदि ऊँचे स्थान पर विराजमान कर लेना चाहिए। अकस्मात् महान् उपद्रवों केप्रसंग में शान्ति, तोष-संतोष हेतु इस स्तोत्र का अखण्ड पाठ भी किया जाता है। अखण्ड पाठ का क्रम व विधि-विधान परम्पराओं में भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रचलित है।

कार्यसिद्धि या अन्याय उपायों के लिए मंत्र की साधना एक प्रयोग है जिसके द्वारा देवी-देवताओं को वश में किया जा सकता है। जो कार्य असम्भव हो वह मंत्राराधना द्वारा सिद्ध-संभव हो जाता है। मंत्र की साधना से साधक मन-वच-काय की शक्ति विकास कर सकता है। जब शुभ कर्मों का उदय हो तब यंत्र-तंत्र-मंत्र लाभदायक सिद्ध होते है। अस्तु में साधकों को दान, दया, परोपकार, सदाचार आदि शुभ कार्यों द्वारा शुभ कर्मों का संचय करते रहना चाहिए। साधक का अभीष्ट यह होना चाहिए कि सांसारिक विषय-वासनाओं को छोड़ने तथा कर्मबन्धन से मुक्त होने के लिए मंत्राराधन करे, परन्तु यदि इस भूमिका को प्राप्त न कर सके और मात्र सांसारिक मुसीबतों से छुटकारे के लिये, इष्ट मनोरथ सिद्धि के लिए ही मंत्राराधन का आश्रय ले तो उसे इतना लक्ष्य अपने सामने अवश्य रखना चाहिए कि हमारे कृत्य से किसी के प्राणों का हनन न हो, कोई दुःखी न हो। मंत्र सिद्ध करने का मूल उपाय श्रद्धा है। जो साधक मंत्र देवता, मंत्र तथा मंत्र दाता गुरू के प्रति पूर्ण आस्थावान् होता है, उसी की मंत्र साधना सफल होती है। मंत्र साधना एक विज्ञान है अस्तु मंत्र साधक को इस विज्ञान से भलीभाँति परिचित होना चाहिए ताकि वह अपनी साधना में सफलता अर्जित कर सके।